बिजनेस स्टैंडर्ड - मोदी का चुनावी मंत्र सुरक्षा के नाम वोट
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Saturday, August 24, 2019 05:27 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

मोदी का चुनावी मंत्र सुरक्षा के नाम वोट

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  March 31, 2019

कोई भी सरकार जो दोबारा निर्वाचन की बाट जोह रही हो, उसे मतदाताओं से एक ही प्रश्न करना चाहिए: क्या आज आपकी स्थिति उस समय से बेहतर है जब आपने पिछली बार हमें चुना था? नरेंद्र  मोदी के लिए यह सवाल अलग हो सकता है। मसलन: क्या आप उस समय से अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं जब आपने पिछली दफा चुना था? अगर आपका उत्तर हां है तो आप असुरक्षा के दम पर दोबारा चुने जाने की आशा कर सकते हैं। परंतु अगर उत्तर नकारात्मक है तो लोग आपको दोबारा क्यों चुनेंगे? जहां तक मोदी की बात है, एक तीसरी संभावना बन सकती है, क्या आप 2008 के 26/11 के हमले के दिनों की तुलना में कम असुरक्षित महसूस कर रहे हैं? पारंपरिक राजनेता मतदाताओं से अपने काम के दम पर संवाद करते हैं। चतुर राजनेता अपने प्रतिद्वंद्वी के काम को लेकर जनता के बीच जाते हैं। मोदी चतुर हैं, इसमें कोई दोराय नहीं है। मोदी सरकार का यह कहना एकदम सही है कि उसके पांच वर्ष के कार्यकाल में कश्मीर के बाहर कोई बड़ी आतंकी घटना नहीं हुई। गुरदासपुर और पठानकोट में दो नाकाम हमले अवश्य हुए। दोनों हमले पंजाब से लगी सीमा के आसपास के इलाकों में हुए, इसके अलावा कहीं कोई बड़ा हमला नहीं हुआ। हालांकि इससे पहले संप्रग के कार्यकाल के पांच वर्ष भी अपेक्षाकृत शांति से गुजरे थे। कश्मीर में भी शांति व्याप्त रही। शायद खुद कांग्रेस भी यह भूल चुकी है तभी तो वह इसका जिक्र भी नहीं करती। मोदी राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर अपनी सरकार की सफलता पर बात करने के बजाय दूसरी असुरक्षाओं का जिक्र करने लगते हैं।

 
वर्ष 2014 में वह उम्मीद के वादे पर जीते थे। पांच वर्ष बाद वह पाकिस्तान के आतंकवादियों का भय दिखाकर दूसरा कार्यकाल चाहते हैं। जो भी उनका विरोध करता है, वह उनका दुश्मन बन जाता है। खासतौर पर कांग्रेस। यही कारण है कि वह कहते हैं कि केवल आतंकवादी और पाकिस्तानी उनकी हार चाहते हैं। इसके साथ ही वह विपक्ष पर यह आरोप भी लगाते हैं कि वह आतंकियों के साथ नरमी बरतता है और सीमापार किए गए सफल हमलों के सबूत मांगकर सेना का अपमान करता है। 2014 से 2019 तक उनके रुख में इस बदलाव का अर्थ क्या है?
 
मोदी-शाह की भाजपा समग्र राजनीति में यकीन करती है। यह वह स्थिति है जहां राजनीति ही आपके लिए सबकुछ हो और सत्ता हासिल करने का संबंध उस भरोसे से हो ही नहीं जो आमतौर पर सार्वजनिक पद के साथ जुड़ा रहता है। यानी येनकेन प्रकारेण सत्ता हासिल करनी है और उसके बाद देखते हैं कि क्या किया जा सकता है। अगर कृत्रिम उन्माद रचा जा सके तो यह उपयोगी राजनीति साबित हो सकती है। वहीं दूसरी ओर, अपने पांच साल के रिकॉर्ड के आधार पर चुनाव लडऩा जोखिमभरा हो सकता है। क्योंकि उस स्थिति में लोग आपके दावों को हकीकत से परखेंगे। आप रोजगार से जुड़े आंकड़ों को छिपा सकते हैं और जीडीपी के आंकड़ों को बदल सकते हैं लेकिन जब आप लोगों से पूछेंगे कि वे कैसा महसूस कर रहे हैं तो हकीकत तुरंत सामने आ जाएगी। चाहे जो भी हो, आपकी शौचालय, मुद्रा ऋण, उज्ज्वला एलपीजी योजना, कृषि समर्थन प्रत्यक्ष हस्तांतरण, बिजली कनेक्शन आदि योजनाओं से कितने भी लोग लाभान्वित हुए हों लेकिन उन लोगों की तादाद हमेशा अधिक रहेगी जिनको इनका लाभ नहीं मिला। अगर आप जानना चाहते हैं कि यह कितना घातक हो सकता है तो आपको लालकृष्ण आडवाणी से 2004 के इंडिया शाइनिंग अभियान के बारे में पूछकर देखिए। 
 
मोदी के शुरुआती भाषणों में यह संकेत मिलने लगा था कि वह आगे चलकर किन मुद्दों पर बात करेंगे: पाकिस्तान, आतंकवाद, भ्रष्टाचार और विपक्षियों तथा आलोचकों में राष्ट्रवाद की कमी। यह भी पता चल गया था कि वह रोजगार, वृद्धि और कृषि क्षेत्र के संकट आदि के बारे में कोई बात नहीं करेंगे। वह चुनाव की तैयारी कुछ इस तरह कर रहे हैं कि उनको विपक्ष के आरोपों के समक्ष अपना बचाव न करना पड़े। इसके उलट वही विपक्ष पर हमलावर रहेंगे। आतंक की बात करें तो उनके पास पाकिस्तान और मुसलमान का विकल्प तो है ही। मोदी और अमित शाह ने 2014 का आम चुनाव मुस्लिमों को किनारे लगाकर ही जीता था। उनकी कैबिनेट, शीर्ष संवैधानिक पदों और प्रशासनिक पदों पर नियुक्तियों के मामले में मुस्लिमों को हाशिये पर रखा गया। उन्हें लोकसभा में बहुमत हासिल हुआ जबकि देश की 14 फीसदी मुस्लिम आबादी में से उन्होंने केवल सात प्रत्याशियों को टिकट दिया था। उत्तर प्रदेश में जहां 20 फीसदी आबादी मुस्लिम है, वहां एक भी मुस्लिम प्रत्याशी उतारे बिना पार्टी को विधानसभा चुनाव में भारी जीत मिली। यह नीति इतनी कारगर है कि कांग्रेस इस मसले पर विरोध तक नहीं कर पाती क्योंकि उसे मुस्लिम पार्टी करार दे दिया जाएगा।
 
आश्चर्य नहीं कि मोदी इस वैचारिक खाई को और बढ़ाने का प्रयास करेंगे। पाकिस्तानी और आतंकवादी मुझे हराना चाहते हैं और विपक्ष भी मुझे हराना चाहता है। विपक्ष का सबसे मजबूत वोट बैंक मुसलमान हैं, जैसी बातें यहीं से निकलती हैं। इसलिए वह दोहराते हैं कि उनकी अनुपस्थिति में आतंकियों, पाकिस्तान और मुसलमान हावी रहेंगे। अगर मुस्लिम उन्हें वोट नहीं देते तो कोई बात नहीं, उनके खिलाफ हिंदू एकजुट रहेंगे। अगर यह अभियान सीधे भारतीय मुस्लिमों के खिलाफ होगा तो कारगर साबित नहीं होगा। यही वजह है कि देश में पूरा खतरा पाकिस्तानी मुस्लिमों और पाकिस्तान समर्थक कश्मीरियों से बताया जाता है। पूर्व में यही खतरा बांग्लादेश से है।
 
मोदी अकेले नहीं हैं। अमेरिका के डॉनल्ड ट्रंप समेत दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों के बड़े नेताओं में केवल अपने मतदाता वर्ग को संबोधित करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। वे बाकियों का डर दिखाकर उन्हें हाशिये पर लगा देते हैं। ट्रंप से लेकर एर्डोगन, नेतन्याहू और मोदी तक सभी बहुसंख्यक समुदाय में भय पैदा करते हैं, मानो वे अपने ही देश में अल्पसंख्यक हों। ट्रंप और मोदी की बात करें तो दोनों के लिए सीमापार अवैध अप्रवासियों के रूप में शत्रु मौजूद हैं तो देश के भीतर वाम-उदारवादियों, अल्पसंख्यकों, विपक्ष और स्वतंत्र मीडिया के रूप में कहीं अधिक बड़ा शत्रु है। ये हर बात का विरोध करते हैं। दोनों कहते हैं कि मैं इस सुविधाभोगी वर्ग को चुनौती देने आया हूं।
 
ट्रंप के लिए जो वॉशिंगटन बेल्टवे है वही मोदी के लिए लुटियन क्षेत्र है। मुझे चुनकर आपने सही मायनों में समझदारी दिखाई है। मुझसे पहले वाला हर व्यक्ति मूर्ख था। इतिहास मुझसे ही शुरु होता है। लेकिन आप ने अब तक कुछ नहीं देखा है। मुझे एक कार्यकाल और दीजिए... आप चाहें तो इन बातों पर हंस सकते हैं लेकिन इससे मोदी पराजित नहीं होंगे क्योंकि अच्छी खासी तादाद में मौजूद उनके प्रशंसकों को यह अच्छा लगता है।  ऐसे में विपक्ष के पास क्या चारा है? अगर मोदी अपने जनाधार को बरकरार रख सकते हैं और बाकी लोग बंटे रहते हैं तो वह आसानी से जीत जाएंगे। कांग्रेस भ्रष्टाचार के मोर्चे पर मोदी से नहीं जीत सकती क्योंकि उसकी अपनी छवि खराब है। राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर मोदी की बातों का मुकाबला मुश्किल है। हालिया घटनाओं ने उनकी छवि और मजबूत की है। जब भी कोई प्रतिष्ठित मोदी आलोचक सैन्य हमलों के दावों पर सवाल उठाता है, कांग्रेस के लिए इस बहस में शामिल होना मुश्किल होता है। यहां दो बाते हैं: मोदी के सामने एक बंटा हुआ विपक्ष है और उसके नेता अपनी शर्तों पर लड़ाई लड़ रहे हैं। कांग्रेस ने न्यूनतम बुनियादी आय की योजना के साथ मुद्दा बदलने की कोशिश की है। उसने प्रति माह 6,000 रुपये देने का वादा किया है जो मोदी द्वारा छोटे किसानों को दी जा रही 500 रुपये की राशि से अधिक है। कांग्रेस को पारंपरिक रूप से अधिक कल्याणकारी पार्टी माना जाता है जैसे भाजपा को अधिक राष्ट्रवादी माना जाता है। बेरोजगारी बढ़ी है, किसान संकट में हैं और तमाम लोग बहुत नाखुश हैं। प्रश्न यह है कि क्या कांग्रेस के पास यह पहुंच, कौशल, संसाधन और समय है कि वह मोदी को इन मुद्दों पर प्रतिक्रिया देने के लिए बाध्य कर सके। अगर ऐसा है भी तो भी देश के सर्वाधिक गरीब इलाकों पश्चिम बंगाल, ओडिशा, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे क्षेत्रों में पार्टी की पकड़ कमजोर हो चुकी है। बहरहाल आय समर्थन योजना एक दिलचस्प विचार है। संभव है कि बचे हुए दिनों में ऐसे गठजोड़ बनें जो मोदी को टक्कर दे सकें।
Keyword: parliament, election, narendra modi, ECI, congress, rahul gandhi,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या वित्त मंत्री की घोषणा से आर्थिक विकास को मिलेगी गति?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.