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कांग्रेस को लाभ मगर भाजपा को बढ़त

संदीप कुमार /  March 30, 2019

गत वर्ष विधानसभा चुनाव में अत्यंत करीबी मुकाबले के बाद कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) आगामी लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश में एक और कड़े मुकाबले के लिए तैयार हैं। माना जा रहा था कि 15 वर्ष बाद सत्ता में लौटी कांग्रेस लोकसभा चुनाव में अपनी स्थिति मजबूत करेगी लेकिन पार्टी में एक बार फिर गुटबाजी के लक्षण नजर आने लगे हैं। प्रदेश सरकार का प्रदर्शन कमजोर होने की भावना और आचार संहिता लागू होने के बाद कृषि ऋण माफी योजना पर रोक का भी बुरा असर पड़ सकता है।

वर्ष 2014 के आम चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस को छिंदवाड़ा (कमलनाथ) और गुना-शिवपुरी (ज्योतिरादित्य सिंधिया) के रूप में 29 में से दो सीटों पर जीत मिली थी। बाद में रतलाम-झाबुआ उपचुनाव में पार्टी को एक और सीट पर जीत मिली। शेष सारी सीटें भाजपा के खाते में गई थीं। इस बार कांग्रेस को कम से कम 10 सीटों पर जीत के आसार नजर आ रहे हैं। इनमें मौजूदा तीन सीटों के अलावा ग्वालियर, मुरैना, सतना, सीधी, खरगोन आदि शामिल हैं। पार्टी का प्रदर्शन सुधर भी सकता है लेकिन काफी कुछ प्रत्याशी चयन पर निर्भर करेगा।

राजनीतिक टीकाकार गिरिजा शंकर कहते हैं, 'इस चुनाव में कोई बड़ा कारक नहीं है इसलिए नतीजे भी विधानसभा चुनाव की तरह हो सकते हैं। हालांकि भाजपा को मामूली बढ़त मिलती दिख रही है।' कांग्रेस के बड़े नेताओं में टकराव उसके लिए मुश्किल बन सकता है। यह बात तब सार्वजनिक हुई जब मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में से एक दिग्विजय को किसी कठिन सीट से चुनाव लडऩा चाहिए। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इसका समर्थन करते हुए कहा कि वह भी किसी भी कठिन सीट से चुनाव लडऩे को तैयार हैं।

हालांकि दिग्विजय सिंह ने जवाब में कहा कि उन्हें चुनौती शिकार है लेकिन वह वहीं से चुनाव लड़ेंगे जहां से पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी तय करेंगे। बहरहाल, कांग्रेस ने उन्हें भोपाल से प्रत्याशी बनाने की घोषणा कर दी है। कांग्रेस सन 1984 के बाद कभी भोपाल संसदीय क्षेत्र से चुनाव नहीं जीत सकी है। हालांकि कांग्रेस प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी किसी भी तरह के मतभेद से इनकार करते हुए कहते हैं कि पार्टी एकजुट है और भाजपा को हराने के लिए पूरी तरह तैयार भी है। यह बात अलग है कि प्रदेश कांग्रेस के नेताओं के बयान और गतिविधियां इसके उलट हैं।

अटकलें यह भी हैं कि सिंधिया इस बार ग्वालियर से चुनाव लड़ सकते हैं जबकि उनकी पत्नी प्रियदर्शिनी राजे गुना-शिवपुरी में उनकी जगह ले सकती हैं। प्रदेश के जनजातीय नेताओं का असंतोष भी कांग्रेस के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। जय आदिवासी युवा शक्ति संगठन (जयस) ने विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए अहम समर्थन जुटाया था। संगठन हालिया घटनाक्रम से प्रसन्न नहीं है। संगठन के नेता हीरालाल अलावा को कांग्रेस ने विधानसभा का टिकट दिया था। वह चुनाव जीत गए लेकिन मंत्री नहीं बनाए जाने से नाराज हैं। अलावा ने धमकी दी है कि अगर आदिवासी अंचलों में उनकी पसंद के प्रत्याशियों को टिकट नहीं देती तो वह अपने प्रत्याशी उतारेंगे।

वहीं भाजपा के सूत्र आशंका जता रहे हैं कि पार्टी को कुछ अतिरिक्त सीटें गंवानी पड़ सकती हैं। केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ग्वालियर के बजाय इस बार मुरैना से चुनाव लड़ रहे हैं। तोमर हार की आशंका के चलते काफी समय से सीट बदलने की मांग कर रहे थे। जानकारी के मुताबिक सागर, रीवा, सीधी, शहडोल और खंडवा में भी लोग भाजपा सांसदों से प्रसन्न नहीं हैं। 

शहडोल में भाजपा ने मौजूदा सांसद ज्ञान सिंह के स्थान पर हिमाद्री सिंह को टिकट दिया है। हिमाद्री सिंह के पिता दलबीर सिंह और मां राजेशनंदिनी सिंह, दोनों कांग्रेस के सांसद रहे हैं। हिमाद्री खुद शहडोल उपचुनाव में कांग्रेस की प्रत्याशी रही हैं लेकिन उन्होंने भाजपा नेता नरेंद्र सिंह मरावी के साथ विवाह के बाद भाजपा का दामन थाम लिया है। इन तमाम बातों से तस्वीर साफ होती है। कांग्रेस की सीटों में इजाफा होगा लेकिन अभी भी बढ़त भाजपा के हाथ रहेगी।
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