बिजनेस स्टैंडर्ड - डिजिटल के प्रसार पर टिका मीडिया वृद्धि का भ्रम
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Saturday, August 24, 2019 05:46 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

डिजिटल के प्रसार पर टिका मीडिया वृद्धि का भ्रम

वनिता कोहली-खांडेकर /  March 30, 2019

क्या केवल कुछ उपभोक्ता ही मायने रखते हैं? यह एक ऐसा सवाल है जो मैं अक्सर शोधकर्ताओं, मीडिया संस्थानों, मार्केटिंग विशेषज्ञों और विश्लेषकों से अक्सर पूछती हूं। मसलन, वर्ष 2014 में 31 फीसदी भारतीय मतदाताओं ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को सत्ताधारी दल के तौर पर चुना था। ऐसे में समाचार संस्थानों की 90 फीसदी से भी अधिक तादाद केवल इस 31 फीसदी मतदाताओं से ही संवाद क्यों कर रहे हैं? इसी तरह वर्ष 2018 में 83.6 करोड़ भारतीयों ने टेलीविजन देखा, 38.5 करोड़ लोगों ने अखबार पढ़ा और एक अरब से अधिक लोगों ने सिनेमाघरों के टिकट खरीदे थे लेकिन आज के समय मीडिया के बारे में होने वाली तमाम चर्चाएं और शोध के केंद्र में मुख्यत: डिजिटल पाठक ही होते हैं।

रॉयटर्स पत्रकारिता अध्ययन संस्थान (आरआईएसजे) की भारत में डिजिटल न्यूज की स्थिति को लेकर पिछले हफ्ते एक रिपोर्ट जारी की गई। इसके मुताबिक 35 साल से कम उम्र के उपभोक्ताओं के बीच खबरें जानने के लिए ऑनलाइन समाचार मंच (56 फीसदी) और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म (28 फीसदी) ने प्रिंट (16 फीसदी) को काफी पीछे छोड़ दिया है। यह अलग बात है कि प्रिंट की तुलना में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से मिलने वाली खबरों के स्रोत बहुत भरोसेमंद नहीं होते हैं। इनमें से कई पोर्टल तो किस्सागोई की शक्ल में साक्ष्य रखते हैं। जनवरी की शुरुआत में यूगव ने एक ऑनलाइन प्रश्नावली का इस्तेमाल कर एक सर्वे किया था। हालांकि उसके सैंपल का आकार नहीं बताया गया।

उस सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, 'इसका सैंपल भारत में अंग्रेजी बोलने वाली जनसंख्या और इंटरनेट उपभोक्ताओं का प्रतिनिधित्व करता है। इस वजह से यह मुख्यत: पुरुष आबादी, संपन्न और शिक्षित लोगों की राय ही दिखाता है। एक ऑनलाइन सर्वे के तौर पर इसके नतीजे उन लोगों की आदतों के बारे में नहीं बताएंगे जो ऑनलाइन माध्यम का इस्तेमाल बहुत कम करते हैं।' ऐसे लोगों में बुजुर्ग, कम साधन-संपन्न और सीमित औपचारिक शिक्षा वाले लोग आते हैं। 

साफ तौर पर कहें तो भले ही इसका नाम 'डिजिटल न्यूज रिपोर्ट' हो लेकिन आरआईएसजे ने इसमें हर जगह भाषा और इंटरनेट पहुंच का सवाल बरकरार रखा है। यह एक ईमानदार प्रयास है। इसी तरह फिक्की-फ्रेम्स की पिछली दो वर्षों की रिपोर्ट भी ऑनलाइन मीडिया को लेकर वही आख्यान पेश करती हैं कि यह टीवी, प्रिंट और दूसरे मीडिया माध्यमों को खत्म करने वाली सर्वव्यापी एवं सर्वशक्तिमान ताकत बनती जा रही है। हालांकि ऐसा है नहीं। 

कॉमस्कोर कहता है कि भारत के 48 करोड़ ब्रॉडबैंड उपभोक्ताओं में से 27.9 करोड़ लोग खबरों और सूचनाओं के लिए ऑनलाइन मंचों का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि 'टाइम्स ऑफ इंडिया' जैसे अखबार को अगर कोई व्यक्ति ऑनलाइन एवं ऑफलाइन दोनों तरह पढ़ता है तो आंकड़ों में दोहराव हो सकता है और कॉमस्कोर जैसी एजेंसियों ने काफी हद तक इस आंकड़े को दुरूस्त भी किया है। अभी तक अंग्रेजी को छोड़कर बाकी भाषाओं के पाठकों की संख्या पर इस माध्यम का खास असर नहीं पड़ा है।

टीवी भी इसी तरह के नकारात्मक विमर्श का सामना कर रहा है। लगता है कि नेटफ्लिक्स, एमएक्स प्लेयर और वूट जैसे ओटीटी प्लेटफॉर्म टीवी को खत्म कर देंगे। जबकि सच यह है कि भारतीय रोजाना 3.45 घंटे टीवी देख रहे हैं और हर साल यह समय बढ़ता जा रहा है। इसकी तुलना में स्ट्रीमिंग वीडियो देखने पर वे एक दिन में 50 मिनट व्यतीत करते हैं। फिल्म उद्योग के लिए वर्ष 2018 बेहतरीन साल रहा है और टिकटों की बिक्री में भी बढ़त देखी गई है।

मुद्दा यह है कि सभी तरह के मीडिया माध्यम एक साथ बने हुए हैं। अमेरिका को ही देखिए। वहां पर 1940 के दशक में यह आशंका जताई जाने लगी थी कि विनाइल रिकॉड्र्स आने से लाइव कंसर्ट कारोबार ही खत्म हो जाएगा। परेशान संगीतकारों ने हड़ताल तक कर दी थी। इसी तरह वर्ष 1970 के दौर में एनालॉग टेप, 1980 में ब्लैंक सीडी, 1990 में नैपस्टर जैसी संगीत कम्प्रेशन तकनीक के खिलाफ आवाज बुलंद होती रही। लाइव संगीत का दौर फिर से लौट आया और डिजिटल तकनीक आने के बाद संगीत उद्योग के दिन सुनहरे हो गए हैं। रेडियो और पॉडकास्टिंग भी जारी है। जब भी कोई नई तकनीक आती है तो नई तरह से चीजें घटती हैं और फिर सह-अस्तित्व के हालात बन जाते हैं। आने वाले कल को अगर डिजिटल से इतर भी कोई बेहतर चीज आती है तो वह भी खुद की जगह बना लेगी।

अमेरिका में अखबार, रेडियो, टीवी- हरेक मीडिया का अपना दौर रहा, वह परिपक्व हुआ, उपभोक्ताओं ने उसका इस्तेमाल किया और फिर कुछ समय बाद नई तकनीक की ओर बढ़ गए। तकनीकी तौर पर 1980 के दशक के मध्य तक भारतीय मीडिया एक बंद बाजार ही था। उस समय पाइरेटेड वीडियो फिल्में दिखाने वाले केबल चैनल पहली बार सामने आए थे। सही मायने में भारतीय मीडिया बाजार 1991 में खुला जब निजी सैटेलाइट चैनल आए और आर्थिक उदारीकरण की भी शुरुआत हुई। लेकिन 1990 के दशक के अंतिम वर्षों में निजी टीवी चैनल, रेडियो और समाचारपत्र हरेक मीडिया माध्यम का जबरदस्त विस्तार होने लगा। यह बताता है कि प्रिंट एवं टीवी उपभोग में वृद्धि क्यों जारी है?

पूरे भारत में ऐसे बहुतेरे लोग हैं जो अखबार पढ़ते हैं, फिल्में एवं टीवी देखते हैं और तमिल, मलयालम या मराठी भाषा में रेडियो कार्यक्रम सुनते हैं लेकिन उनमें से कई लोग ऑनलाइन मंच का इस्तेमाल नहीं करते हैं। यह समूह डिजिटल को भी पूरे उत्साह के साथ गले लगा रहा है। जहां तक राजस्व, मुनाफा और बाकी सभी मानकों का सवाल है तो डिजिटल मीडिया अब भी रफ्तार पकड़ रहा है। अगर यह प्रिंट या टीवी या किसी अन्य माध्यम को पीछे भी छोड़ देता है तो भी साथ में वजूद बना रहेगा। क्या हम इस बारे में एक संतुलित एवं सच्चाई के करीब नजरिया अपना सकते हैं?

Keyword: Film, TV, Digital, Media, Revenue, Profit, Radio, Digital Media, Tamil, Malyalam, Print, Newspaper, Radio Programme,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या वित्त मंत्री की घोषणा से आर्थिक विकास को मिलेगी गति?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.