बिजनेस स्टैंडर्ड - रीपो दर से जमा ब्याज दरों का जुड़ाव छोटा सा कदम
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रीपो दर से जमा ब्याज दरों का जुड़ाव छोटा सा कदम

देवाशिष बसु /  March 30, 2019

भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) ने गत 8 मार्च को यह ऐलान किया कि आगामी 1 मई से बचत खातों में जमा और कम अवधि वाले 1 लाख रुपये से अधिक के कर्जों पर लगने वाली ब्याज दर को रीपो दर के आधार पर तय किया जाएगा। भारतीय रिजर्व बैंक रीपो दर पर ही नकदी की कमी से जूझ रहे बैंकों को कर्ज देता है। इस कदम की लगभग हरेक टिप्पणीकार ने प्रशंसा की है। रिजर्व बैंक ने गत दिसंबर में ही बैंकों से कहा था कि आवासीय ऋण जैसे परिवर्तनीय (फ्लोटिंग) दरों वाले सभी नए कर्जों को 1 अप्रैल, 2019 से एक बाहरी बेंचमार्क से जोड़ दें। ऐसे में कोई भी सजग पर्यवेक्षक फौरन इस बात को समझ लेगा कि आरबीआई क्या चाहता था और एसबीआई ने अब तक क्या किया है?

एसबीआई ने जमाओं पर ब्याज दरों को रीपो दर से जोडऩे का फैसला किया है। इसका मतलब है कि रीपो दर के घटने-बढऩे पर जमाओं की ब्याज दर में भी बदलाव आ जाएगा। लेकिन उसने कारोबारियों को दिए जाने वाले लंबी अवधि के कर्ज और आवासीय ऋण, व्यक्तिगत ऋण और वाहन ऋण पर ब्याज दरों को रीपो दर से जोडऩे की घोषणा नहीं की है। इसका मतलब है कि बैंकों की मनमानी के शिकार कर्जदारों को लूटने का सिलसिला जारी रहेगा।

ध्यान रखें कि ऊर्जित पटेल के गवर्नर रहते समय आरबीआई ने कहा था कि बैंकों को अपने कर्ज देने की दरों को बाहरी बेंचमार्क से जोडऩा होगा। लेकिन मौजूदा गवर्नर शक्ति कांत दास के समय आरबीआई इस दिशा में बहुत तेजी नहीं दिखा रहा है। अब यह लगभग तय लग रहा है कि 1 अप्रैल आकर चला भी जाएगा लेकिन बैंकों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। यह आरबीआई की पुरानी नाकामी का ही नया दौर होगा जिसमें आरबीआई की तरफ से दरों में कमी करने के बावजूद बैंक ग्राहकों को उनका लाभ हस्तांतरित नहीं करते हैं।  ऐसे में सवाल उठता है कि एसबीआई का यह कदम लाभ हस्तांतरण में सुधार के आरबीआई के मकसद को पूरा कर पाएगा? इन तथ्यों पर गौर करते हैं:

1. बैंक यह दावा करते रहे हैं कि जमा के बड़ा हिस्सा सावधि के रूप में होने से उनके पास हस्तांतरण की नमनीयता नहीं होती है। बैंकों में जमा राशि का कितना हिस्सा बचत खातों में होता है? एसबीआई के मामले में बचत खातों में जमा राशि का अनुपात करीब 38 फीसदी है। उसमें से भी 20 फीसदी जमा तो 1 लाख रुपये से कम ही है। इसका मतलब है कि 38 फीसदी बचत जमा का 80 फीसदी यानी कुल जमा का 30 फीसदी हिस्सा ही फ्लोटिंग दर के दायरे में आएगा। इस तरह कुल जमा का 70 फीसदी हिस्सा अब भी फिक्स्ड ही रहेगा जिसके चलते बैंकों के लिए सही मायने में फ्लोटिंग दर वाली ब्याज व्यवस्था लागू कर पाना मुश्किल होगा।

2. बैंकों की तरफ से कर्ज दर की लागत (एमसीएलआर) पर इस कदम का क्या असर होगा? इन जमाओं पर ब्याज दर में 25 आधार अंकों की कटौती होने पर भी इस फैसले से बैंकों के सीएलआर में केवल 7 आधार अंकों की कमी आएगी। हालांकि यह कदम 'देर आए दुरुस्त आए' की कहावत को चरितार्थ करता है लेकिन यह बहुत छोटा कदम ही है। 

3. किसी भी सूरत में एसबीआई का आधा-अधूरा कदम तब तक समूची व्यवस्था के लिए अधिक मायने नहीं रखेगा जब तक कि बाकी बैंक भी एसबीआई का अनुसरण करें। मीडिया रिपोर्ट की मानें तो अधिकांश बैंक इसके लिए तैयार नहीं हैं।

4. एक व्याख्या के मुताबिक, बचत खातों को रीपो दर से जोडऩे के बाद इन जमाओं का कुछ हिस्सा फिक्स्ड डिपॉजिट में तब्दील हो जाएगा। फिर भी, जमाओं का अगर छोटा हिस्सा भी रीपो से जुड़ता है तो हस्तांतरण में और कमी आएगी।

जमा : गलत बोझ

इस पूरी बहस में दो अहम कारकों पर गौर नहीं किया गया। पहला, भले ही बैंक अपनी जवाबदेही नहीं बढऩे के दावे कर रहे हैं लेकिन असली मुद्दा कुछ और है। हस्तांतरण पर विमर्श में आश्चर्यजनक तौर पर इस बात पर कोई चर्चा नहीं होती है कि बाकी कारक कौन हैं जो इस प्रसार को तय करते हैं। एमसीएलआर के लिए आरबीआई जमा एवं फंड की लागत से इतर तीन अन्य कारकों को भी ध्यान में रखता है। नकद साख अनुपात और सांविधिक तरलता अनुपात पर नकारात्मक लागत, वितरण-अयोग्य मद और नेटवर्थ पर औसत रिटर्न। विश्लेषक भी जमाओं पर अनमनीय लागत को हस्तांतरण पर इकलौते गतिरोध के तौर पर देखते हैं। एमसीएलआर तय करने वाले तीन अन्य कारकों की कोई समीक्षा नहीं हुई है। आरबीआई भी इसी धारणा पर चला है।

दूसरा, सार्वजनिक बैंकों के कर्ज दरों को पूरी तरह फ्लोटिंग नहीं बना पाने की राह में सबसे बड़ी बाधा गैरजिम्मेदार एवं मनमाने ढंग से कर्ज का आवंटन है जिसके चलते फंसे कर्जों का बोझ बढ़ता जाता है। यह समस्या बैंकों को दिवालिया होने के कगार पर पहुंचाती है और फिर उन्हें खुद को जिंदा रखने के लिए सार्वजनिक पूंजी की जरूरत पड़ती है। बिना जवाबदेही वाले बैंकरों ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की कर्ज बांटने की क्षमता कम की है जिससे कर्ज की दरें ऊंची बनी हुई हैं। ब्याज दरों का हस्तांतरण करीब 20 वर्षों से नहीं हो पाया है जिसके लिए काफी हद तक खराब ढंग से बनाई गई नीतियां और कुछ हद तक आरबीआई की लापरवाही भी जिम्मेदार रही हैं। हस्तांतरण बैंकों का मुनाफा कम कर देता है लिहाजा यह उनके लिए चिंता का सबब नहीं होता है। 

एसबीआई जमाओं पर ब्याज दर को कभी भी फ्लोटिंग बना सकता था लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। हालांकि अब उसने आरबीआई के निर्देशों के तहत यह काम दबाव में उठाया है। अगर हस्तांतरण को सफल बनाना है तो हमें स्पष्ट दिशानिर्देशों की जरूरत है।
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