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राहुल गांधी का चुनावी वादा और लोकलुभावन राजनीति

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  March 27, 2019

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने देश के 5 करोड़ गरीब परिवारों में से प्रत्येक को सालाना 72,000 रुपये आय समर्थन राशि के रूप में देने का वादा किया है। इसका आम चुनाव के नतीजों पर चाहे जो असर हो लेकिन देश की चुनावी राजनीति में यह एक बड़े बदलाव का क्षण है। इसे लेकर किसी तरह की चूक मत कीजिए। फरवरी 2006 में कांग्रेस ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के साथ पात्रता योजनाओं की राजनीति शुरू की थी। उसके बाद से यह सिलसिला बढ़ता गया और अब तो इसके चलते देश की राजकोषीय स्थिति के लिए ही संकट तैयार हो गया है। हालांकि तब से अब तक वक्त काफी बदल चुका है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत रोजगार गारंटी योजना लागू करते वक्त कांग्रेस सत्ता में थी। अब पार्टी ने मतदाताओं को लुभाने के लिए गरीबों के खाते में धनराशि डालने की बात कही है।

 
रोजगार गारंटी योजना की तर्ज पर कुछ और पात्रता योजनाएं शुरू की गईं। इनमें भोजन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार आदि प्रमुख हैं। हालांकि इनका वित्तीय प्रभाव उतना ज्यादा नहीं रहा। अब सबसे गरीब 20 फीसदी लोगों को नकद सहायता देने की बात कही गई है। यह वादा राजकोष पर 3.6 लाख करोड़ रुपये या कहें जीडीपी के 1.9 फीसदी के बराबर बोझ डाल सकता है। परंतु 2014 में भाजपा की सरकार बनने के बाद भी इन पात्रता योजनाओं को बंद करने पर विचार नहीं किया गया, बल्कि इनका आवंटन बढ़ा दिया गया। ऐसे में पूरी संभावना है कि राहुल गांधी की आय समर्थन योजना अगर किसी ने भी किसी भी रूप में लागू की तो अन्य दल भी इसे जारी रखेंगे। लोकलुभावन राजनीति ऐसी ही है।
 
यह होड़ भाजपानीत मोदी सरकार ने शुरू की। इस वर्ष अपने बजट में मोदी सरकार ने कहा कि वह दो हेक्टेयर से कम रकबे वाले किसानों को सालाना 6,000 रुपये का आय समर्थन दे रही है। इससे राजकोष पर सालाना 75,000 करोड़ रुपये का बोझ पड़ा। वह वादा भी चुनाव में वोट जुटाने के लिए किया गया था। अब कांग्रेस ने उसी का विस्तार किया है। यह अर्थव्यवस्था के लिए बुरी खबर है। आप कह सकते हैं कि देश के सबसे गरीब 20 फीसदी लोगों की जरूरतों को पूरा करके बढ़ती असमानता पर काबू पाया जा सकता है। आखिरकार, सरकार को आजादी के 70 साल बाद भी समाज में व्याप्त भीषण गरीबी को दूर करने के लिए कुछ तो करना चाहिए। इसका सीधा जवाब यह है कि आय की असमानता या गरीबी से इस तरह नहीं निपटा जा सकता। इसके लिए स्वास्थ्य, सफाई, शिक्षा, जल, आवास और खाने के क्षेत्र में सुविधाएं देनी चाहिए।
 
बीते सात दशक में देश की सरकार ये सारी सुविधाएं जुटाने में नाकाम रही हैं। परंतु इसकी पूर्ति आय समर्थन से नहीं की जा सकती है और इस मोड़ पर इन्हें लागू करने से होने वाली दिक्कतों की दो वजह हैं। पहला, इससे मूलभूत सामाजिक कार्य और कल्याण करने की राज्य की क्षमता पर बुरा असर होगा और दूसरा इससे राज्य यह सोच सकता है कि पैसे देकर उसकी जवाबदेही समाप्त हो जाती है। आय समर्थन योजनाएं सही हैं लेकिन बिना बुनियादी सुविधाओं को लागू किए आय समर्थन देना एक गंभीर गड़बड़ी पैदा कर देगा। कई विकसित देशों में सामाजिक और आर्थिक बुनियादी ढांचा तैयार करने के बाद आय समर्थन योजना लागू की गई ताकि अपेक्षाकृत कमजोर वर्ग की सहायता की जा सके। 
 
देश के आर्थिक विकास के इस मोड़ पर आय समर्थन जैसा राजनीतिक तोहफा देने के दो अन्य विपरीत प्रभाव हो सकते हैं। यह मानना कतई समझदारी नहीं है कि कांग्रेस द्वारा घोषित आय समर्थन योजना जैसी कोई योजना चुनावी संभावनाओं में सुधार करेगी। यह अन्य राजनीतिक दलों को भी उत्साहित कर सकता है। सत्ताधारी भाजपा भी ऐसी कोई योजना ला सकती है जो शायद कहीं ज्यादा आकर्षक हो। अगर ऐसी होड़ शुरू हो गई तो देश के विकास लक्ष्यों पर बहुत बुरा असर होगा। इससे राजस्व संसाधनों में कमी उत्पन्न होगी। इसकी भरपाई के लिए सरकार ऐसे कदम उठा सकती है जो देश में एक नए तरह का कराधान लागू कर सकते हैं। 3.6 लाख करोड़ रुपये के अतिरिक्त आर्थिक बोझ को पूरा करने के लिए सरकार की अन्य सब्सिडी को कम किया जा सकता है। सब्सिडी पर सरकार का पूरा बिल करीब 3 लाख करोड़ रुपये यानी जीडीपी का 1.6 फीसदी है। अतीत में अधिकांश सरकारें सब्सिडी कम करने की अनिच्छुक रही हैं या बहुत धीमी गति से यह काम किया है। भाजपा सरकार ने भी कमजोर किसानों के लिए आय समर्थन योजना लागू करते समय उर्वरक सब्सिडी कम करने का जिक्र नहीं किया। ऐसी कोई आशा नहीं है कि भविष्य की सरकारें आय समर्थन योजनाओं की घोषणा के बाद मौजूदा सब्सिडी को खत्म करेंगी। 
 
प्रश्न यह उठता है कि इसके लिए संसाधन कहां से आएंगे? बेहतर अनुपालन और दायरा बढ़ाने से कर संग्रह बढ़ सकता है और यह वांछित भी है लेकिन आय समर्थन योजना से होने वाले राजस्व व्यय से पडऩे वाले भारी भरकम वित्तीय बोझ की भरपाई के लिए दबाव में काम कर रही सरकारें कर दरों में इजाफा भी कर सकती हैं। वे कर में इजाफा करके संसाधन जुटाने का प्रयास कर सकती हैं। यहां असल खतरा यह है कि सरकार ऐसी योजनाओं के लिए अधिक राजस्व जुटाने के लिए जल्दबाजी में ऐसा कर सकती है।
 
यह राह खतरनाक हो सकती है। अगर देश को इस राह पर धकेला गया तो उसका आरोप भाजपा और कांग्रेस दोनों को ही झेलना होगा। आय समर्थन योजनाओं को अधिक परिपक्व  राजनीति तथा आर्थिक विकास के कहीं अधिक मजबूत दौर की आवश्यकता होती है। ऐसी योजनाएं केवल तभी लागू की जानी चाहिए जबकि सामाजिक और आर्थिक बुनियादी ढांचे का लक्ष्य पहले ही हासिल किया जा चुका हो। हमारा देश अभी इन दोनों लक्ष्यों से दूर है। 
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