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नई वित्तीय व्यवस्था बना रहा है चीन

श्याम सरन /  March 26, 2019

चीन अपने वित्तीय बाजारों को चरणबद्घ तरीके से खोल रहा है। इससे अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग और वित्तीय कंपनियों के लिए मुनाफे के अनेक अवसर तैयार हुए हैं। विस्तार से बता रहे हैं श्याम सरन

 
चीन अपनी मुद्रा रेनमिनबी (आरएमबी) के पूर्ण अंतरराष्ट्रीयकरण के लिए प्रतिबद्घ है लेकिन वह अपने वित्तीय बाजार को उदार नहीं बनाना चाहता क्योंकि उसके साथ विनिमय दर की अस्थिरता और पूंजी के संभावित बहिर्गमन जैसी बातें जुड़ी हुई हैं। अब तक उसके प्रयास व्यापार समझौतों, निवेश उत्पादों और आरक्षित मुद्रा के रूप में आरएमबी का प्रयोग करके उसके अंतरराष्ट्रीय प्रोफाइल को मजबूत करने के रहे हैं। बेल्ट और रोड पहल (बीआरआई) भी चीन को यह अवसर देती है कि वह साझेदार देशों की परियोजनाओं को दी जाने वाली वित्तीय सहायता में आरएमबी का प्रयोग करे।
 
इस संबंध में बड़ी पहल मार्च 2018 में की गई जब पेट्रो-डॉलर के समक्ष पेट्रो-युआन के बाजार को मजबूत करने के लिए शांघाई इंटरनैशनल एनर्जी एक्सचेंज की स्थापना की गई। चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है। वह तेल के सौदों का निपटान अपनी मुद्रा में करने को बढ़ावा दे रहा है। शांघाई एक्सचेंज तेल वायदा कारोबार में न्यूयॉर्क और लंदन का मुकाबला करता है और एशिया के लिए मानक दरें तय करने में सक्षम है। एक वर्ष के कारोबार में वह वायदा बाजार के 6 फीसदी हिस्से में कारोबार कर रहा है। वायदा बाजार का 15 फीसदी हिस्सा विदेशी कारोबारियों के पास है। पेट्रो-युआन बाजार को अमेरिका द्वारा रूस और ईरान पर प्रतिबंध लगने का भी फायदा मिला। जैसे-जैसे इस एक्सचेंज के कामकाज में परिपक्वता आएगी, वह तेल कीमतों के लिए वेस्ट टैक्सस इंटरनैशनल और ब्रेंट का विकल्प बनेगा।
 
सन 2018 की एक अन्य अहम घटना है चीन के बॉन्ड बाजार में विदेशी पहुंच को अनुमति। फिलहाल इस बाजार का आकार 12.7 लाख करोड़ डॉलर का है और अगले चार वर्ष में यह दोगुना हो सकता है। अमेरिका और यूरोप के बाद यह दुनिया का तीसरा बड़ा बॉन्ड बाजार है। सन 2017 में चीन ने बॉन्ड कनेक्ट की स्थापना की जो विदेशी बैंकों, सॉवरिन वेल्थ फंड और केंद्रीय बैंकों को हॉन्गकॉन्ग में प्राधिकृत संस्थानों के माध्यम से चीनी बॉन्ड में निवेश की इजाजत देता है। बहरहाल, चीनी बॉन्ड की विदेशी होल्डिंग अभी केवल 2 फीसदी है लेकिन इसमें तेजी से इजाफा हो रहा है। नवंबर 2018 में चीन ने घोषणा की कि बॉन्ड बाजार में अगले तीन वर्ष तक विदेशी निवेश को कॉर्पोरेट इनकम टैक्स और मूल्यवर्धित कर से राहत दी जाएगी। बॉन्ड कनेक्ट का इस्तेमाल करने वाले विदेशी निवेशकों का कोटा इस वर्ष 30,000 करोड़ डॉलर तक बढ़ा दिया गया है। ध्यान रहे कि चीन के घरेलू निवेशकों को विदेशी बॉन्ड में निवेश की इजाजत नहीं है। यह बात उसे सही मायनों में अंतरराष्ट्रीय और खुला बॉन्ड बाजार बनने से रोकती है।
 
गत वर्ष चीन की एक उपलब्धि यह भी रही कि शांघाई शेयर बाजार में कारोबार करने वाले चीन के एक श्रेणी के शेयरों को एमएससीआई इमर्जिंग मार्केट इंडेक्स में शामिल किया गया। अभी सूचकांक में इनकी हिस्सेदारी 0.7 फीसदी है लेकिन एमएससीआई ने घोषणा की है कि इस वर्ष नवंबर तक यह हिस्सेदारी चार गुना हो जाएगी। स्टैंडर्ड ऐंड पुअर (एसऐंडपी) और फाइनैंशियल टाइम्स सिक्युरिटी एक्सचेंज (एफटीएसई) ने भी चीन के शेयरों को अपने उभरते बाजार के बेंचमार्क में स्थान दिया है।
 
बॉन्ड बाजार के उदारीकरण के साथ ही चीन इन सूचकांकों पर दबाव डाल रहा है कि इनमें सरकारी बॉन्डों को शामिल किया जाए। हाल ही में ब्लूमबर्ग बार्कले एग्रीगेटर ने कहा है कि 20 माह की अवधि में वह 363 चीनी प्रतिभूतियों को मानक सूचकांक में शामिल करेगा। इनकी हिस्सेदारी 6 फीसदी होगी। अन्य सूचकांक मसलन जेपी मॉर्गन गवर्नमेंट बॉन्ड इंडेक्स और सिटी वल्र्ड गवर्नमेंट बॉन्ड इंडेक्स भी इसका अनुकरण करेंगे। इन अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों में चीन के शेयर और बॉन्ड को शामिल किए जाने से फंड स्वत: चीनी वित्तीय बाजारों में आएगा। अनुमान है कि पहले वर्ष में 8,000 करोड़ डॉलर की आवक चीनी शेयर बाजार में हो सकती है। चीनी बॉन्ड की खरीद 25,000 से 30,000 करोड़ डॉलर तक की हो सकती है। इसका परिणाम भारत जैसे देशों को होने वाले वित्तीय प्रवाह के अवरुद्ध होने के रूप में नजर आ सकता है।
 
चीन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आरएमबी के इस्तेमाल को लेकर जो प्रयास कर रहा है, उसे देखते हुए यह भी ध्यान रखना होगा यूनियन पे दुनिया की सबसे बड़ी क्रेडिट कार्ड कंपनी बन चुकी है। इसकी स्थापना 2002 में हुई थी और वह 700 करोड़ कार्ड जारी कर चुकी है। दुनिया के 56 फीसदी बाजार पर उसका कब्जा है। इसका उपयोग प्रमुख तौर पर बाहर जाने वाले चीनी पर्यटक करते हैं लेकिन फिलहाल चीन के बाहर भी इसके 10 करोड़ उपभोक्ता हैं। कार्ड का प्रयोग दुनिया के 150 देशों में किया जा सकता है। बीआरई के साझेदार देशों में इसका प्रयोग बढ़ाने के लिए बाकायदा नीति बनी है। चीन के बैंकों को विदेशों में अपनी पहुंच मजबूत करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। फिलहाल उनके पास 2 लाख करोड़ डॉलर मूल्य की विदेशी परिसंपत्ति है। बैंक ऑफ चाइना को 10 शीर्ष अंतरराष्ट्रीय बैंकों में छठा स्थान प्राप्त है।
 
चीन 12 वित्तीय मुक्त व्यापार क्षेत्र विकसित कर रहा है ताकि वित्तीय क्षेत्र सुधारों और उदारीकरण के साथ प्रयोग किया जा सके। इसमें शांघाई का अहम स्थान है। हालांकि इन पहलों का सकारात्मक प्रतिफल सामने नहीं आया है। इन क्षेत्रों में पूरा ध्यान वित्तीय क्षेत्र के बजाय व्यापक आर्थिक सुधार के एजेंडे की ओर स्थानांतरित हो गया है। इन तमाम बातों और वित्तीय सुधार के एजेंडे को मिलाकर देखें तो चीन दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की अपनी हैसियत का लाभ ले रहा है और अपने व्यापक बाजार तथा अंतरराष्ट्रीय कारोबारी समूहों की सहायता से आगे बढ़ रहा है। यह व्यापार और तकनीक के मोर्चे पर देश को मिल रही चुनौतियों के एकदम विपरीत है। वित्तीय बाजार में चीन को जो बढ़त मिल रही है, उसे तब झटका लग सकता है जबकि अर्थव्यवस्था गंभीर मंदी की शिकार हो जाए। अमेरिका और चीन के बीच के हालिया व्यापारिक विवाद के बाद ऐसा हो भी सकता है। परंतु समग्र प्रभाव में बदलाव आता नहीं दिखता। बड़ी अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग और वित्तीय कंपनियों के लिए चीन के प्रतिभूति और बॉन्ड बाजार का खुलना मुनाफे के अप्रत्याशित अवसर लिए हुए है। चीन इस लक्ष्य को हासिल कर वैश्विक वित्तीय केंद्र बन सकता है। वैश्विक वित्तीय तंत्र में ऐसे बदलाव आ रहे हैं जिन्हें अभी ठीक से समझा नहीं जा रहा है। 
 
(लेखक पूर्व विदेश सचिव और वर्तमान में सीपीआर के वरिष्ठ फेलो हैं।)
Keyword: india, china, economy, RMB,,
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