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नई पीढ़ी की सेहत और खुशहाली से तय हो प्रगति

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  March 25, 2019

स्वीडन की 16 वर्षीय स्कूली छात्रा ग्रेटा थनबर्ग जलवायु परिवर्तन पर जरूरी कदम नहीं उठाने के विरोध के लिए चर्चा में हैं। अगस्त 2018 में ग्रेटा ने यह तय किया कि वह स्कूल नहीं जाएंगी। उन्होंने स्कूल जाने के बजाय जलवायु परिवर्तन के खतरों के प्रति संघर्ष का फैसला किया। शुरू में वह इस संघर्ष में अकेले थीं लेकिन धुन की पक्की ग्रेटा अभियान में जुटी रहीं और धीरे-धीरे उनकी आवाज बुलंद होती गई। अब वह अपने स्कूल के बाहर हरेक शुक्रवार को जलवायु परिवर्तन के खिलाफ तख्तियां लेकर बैठती हैं। फर्क बस यह है कि अब वह अकेली नहीं होती हैं, पिछले शुक्रवार को 100 से अधिक देशों में इस मुद्दे पर 1,650 जगहों पर धरना-प्रदर्शन हुए।

 
ग्रेटा और उनका साथ दे रहे युवा बहुत सीधा सवाल पूछ रहे हैं, 'अगर अनुमानों के मुताबिक जलवायु परिवर्तन की स्थितियां घटित होती हैं तो फिर हमारा भविष्य क्या है?' यह एक तथ्य है। अगली पीढ़ी सवाल पूछ रहे हैं कि हम उनके लिए क्या छोड़कर जाएंगे? हम इस मामले में क्या कदम उठा रहे हैं? मुझे नहीं पता कि ग्रेटा का यह आंदोलन कितना आगे जाएगा? क्या यह अपनी रफ्तार गंवा बैठेगा, अप्रासंगिक हो जाएगा या गुम हो जाएगा क्योंकि समय के साथ इन युवाओं की उम्र बढ़ेगी और आजीविका कमाने की हकीकत से उन्हें दो-चार होना पड़ेगा। लेकिन मुझे उम्मीद है कि ऐसा नहीं होगा। मुझे लगता है कि पूरी दुनिया में इसका प्रसार हो जाएगा। उम्मीद है कि यह युवा कल्पनाओं का सबब, उनकी आकांक्षाओं का केंद्र बनेगा और इसके चलते उनके माता-पिता की कंपनियों और सरकारी विभागों के दफ्तरों में भी यह मुद्दा अपनी दस्तक दर्ज करा लेगा। मुझे उम्मीद है कि यह आंदोलन धीमा नहीं होगा और हमारे समय के आंदोलन जैसा नहीं होगा। इस उम्मीद की वजह यह है कि इसे सफल बनाने के लिए हमारे पास एक और मौका है। सच है कि अगर हम अपनी प्रगति के मापदंड को इस तरह बनाने लगें कि वे अपने बच्चों की बेहतरी के मापदंड पर निर्धारित हों तो फिर हमारी धरती बची रह सकती है। हम आज यह जानते हैं कि बच्चे न केवल भविष्य में अधिक गर्म दुनिया में सांस लेंगे बल्कि उन्हें पर्यावरण-जनित विनाश एवं जहर का भी गहरा प्रभाव झेलना पड़ेगा। लिहाजा हमें बच्चों को ही विकास के समूचे ब्रह्मांड का केंद्र बनाना होगा और उनकी खुशहाली के ही नजरिये से प्रगति को आंका जाए। 
 
हम जानते हैं कि स्वच्छता साधनों तक पहुंच नहीं होने से न केवल बच्चों की खुशहाली बल्कि उनकी जिंदगी पर भी बुरा असर पड़ता है। इसके चलते उन्हें कुपोषण, वृद्धि में रुकावट और बीमारियों का सामना करना पड़ता है। हमें स्वच्छता स्तर में सुधार को केवल शौचालयों की गिनती तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए। ऐसा होने पर हमें यह अहसास हो जाएगा कि शौचालय की उपलब्धता ही काफी नहीं है, इंसानी मलमूत्र को शोधित कर दोबारा इस्तेमाल के लायक भी बनाना होगा। ऐसा नहीं होने पर मल-मूत्र भूजल को दूषित करेगा और कई तरह की बीमारियां फैलेंगी। ऐसे में प्रदूषण स्तर को मापने के लिए हमें मलेरिया या डायरिया की चपेट में आने वाले लोगों की संख्या को आधार बनाना चाहिए। इसी तरह, घरों में स्वच्छ ऊर्जा की कमी भी एक और गंभीर समस्या है। खाना बनाने में जैव-ईंधन का इस्तेमाल करने वाली औरतों को सांस की जानलेवा बीमारियां घेर लेती हैं। श्वसन प्रणाली में होने वाला संक्रमण दुनिया भर में बच्चों और किशोरों की मौत की बड़ी वजह है। भले ही दुनिया को जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के लिए नई ऊर्जा प्रणाली ईजाद करने की जरूरत है लेकिन निर्धनतम लोगों तक ऊर्जा पहुंचाना ज्यादा जरूरी है। इसके अलावा शहरों में खराब होती हवा के चलते दम घुटने की चुनौती भी बढ़ रही है। खासकर बच्चे अधिक शिकार हो रहे हैं। लिहाजा अब हमें स्वच्छ ऊर्जा या स्वच्छ वायु की दिशा में प्रगति का आकलन बच्चों के स्वास्थ्य के माध्यम से करना चाहिए।
 
इनके अलावा युवाओं में बढ़ता मोटापा भी बड़ी समस्या बन चुका है। सबसे ज्यादा मोटापा युवाओं में देखा जा रहा है। जंक फूड के लिए प्रोत्साहित करने वाले विज्ञापनों के निशाने पर यही तबका होता है। यह भी सच है कि औद्योगीकृत एवं रसायनों से भरपूर खाद्य पदार्थ मौजूदा कृषि व्यवस्था की जड़ में हैं। इस व्यवस्था में बहुत लोग भूखे रह जा रहे हैं तो बाकी लोगों के लिए भोजन की भरमार है। इस तरह हमें कृषि में होने वाले बदलावों की प्रगति को इस तरह मापना होगा कि बच्चे क्या खा रहे हैं और उनकी सेहत कैसी है, न कि कम-पोषित या अधिक-पोषित होने के आधार पर।
 
इसमें कोई संदेह नहीं है कि अच्छी एवं सार्थक शिक्षा से जिंदगी बदल जाती है। इसके भी पुख्ता सबूत हैं कि बालिकाओं को शिक्षित करने से प्रजनन एवं जनसंख्या वृद्धि की प्रवृत्ति में बदलाव की शुरुआत होती है। लेकिन उनका सशक्तीकरण होना ही असली ताकत है क्योंकि एक शिक्षित युवती का अपने शरीर एवं मस्तिष्क पर सबसे पहले अधिकार होता है। यह भी साफ है कि शिक्षा हासिल करने से व्यक्ति अधिक जागरूक उपभोक्ता बनता है। उत्तराधिकारी पुरानी जीवनशैली को ही अपनाकर धरती बचाने की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। यह भी साफ है कि आजीविका का सवाल भी अहम है। तेजी से ऑटोमेटेड होती जा रही दुनिया में नौकरियां न होने से युवाओं की असुरक्षा बढ़ रही है। ऐसे में वे क्या करेंगे? वे कौन सी दक्षताएं हैं जो नई दुनिया बनाएंगी जिनसे जलवायु परिवर्तन का संकट भी न बढ़े? क्या हमने हरित अर्थव्यवस्था के लायक रोजगार पैदा किए हैं? यह सवाल न केवल भविष्य संवारने में मददगार होगा बल्कि मौजूदा वर्तमान को भी दुरुस्त करेगा। इस तरह हम अपने युवाओं एवं किशोरों के स्वास्थ्य और खुशहाली के सहारे अपने ग्रह की सेहत भी माप सकेंगे। हम उम्मीद करेंगे कि हम उस नए भविष्य के लिए काम कर रहे हैं जिसका सपना ग्रेटा थनबर्ग और उनके लाखों समर्थक देख रहे हैं। यह कल नहीं, आज ही करना है। 
Keyword: environment, world, india, health, population,,
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