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आर्थिक विकास में अहम नवाचार और उपभोक्ता

अजित बालकृष्णन /  March 25, 2019

अर्थव्यवस्था को आगे ले जाने के लिए जरूरी है कि हमारे उत्पाद और सेवाएं तकनीकी नवाचार का परिणाम हों। इस प्रक्रिया में आगे आने वाले उपभोक्ता ही अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करेंगे। बता रहे हैं अजित बालकृष्णन

 
देश में व्याप्त बेरोजगारी, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को हो रहे नुकसान, बैंकिंग और बुनियादी विकास कंपनियों के पतन तथा कृषि क्षेत्र के संकट जैसी आर्थिक दिक्कतों के लिए अर्थशास्त्रियों, राजनेताओं, अफसरशाहों पर दोषारोपण करने का कोई फायदा नहीं। यह विलाप करने का भी कोई तुक नहीं है कि हमारी आर्थिक दिक्कतें इसलिए हैं क्योंकि हमारा देश ऐसे कारोबारियों के दुष्चक्र में फंस गया है जो तकनीकी नवाचार के बजाय कारोबार, अचल संपत्ति, स्पेक्ट्रम और श्रम आदि पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं। अर्थशास्त्रियों और वित्तीय नीति निर्माताओं को दोष देने का भी कोई अर्थ नहीं है। विदेशों में शिक्षित ये लोग वहीं पूर्णकालिक नौकरी करते हैं और अपना रिज्यूमे मजबूत करने के लिए छोटे कार्यकाल की खातिर देश आते हैं। जब तक यहां रहते हैं, एफडीआई, एफडीआई का जाप करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे हमारे पुरखे कठिन समय में राम-राम जपा करते थे। 
 
सच यह है कि एक बार अगर हम उपरोक्त ड्रामे के परदे के पीछे झांककर देखें तो एक नया सच सामने आता है: देश के घरेलू उपभोक्ता और संस्थागत बाजार बहुत छोटे हैं और बेहतर आर्थिक स्थिति वाले उपभोक्ता और निर्णय लेने वाला तबका तकनीक से दूरी बनाए हुए हैं जिसकी वजह से नवाचार आधारित कारोबार के लिए आगे बढऩा तकरीबन असंभव हो गया था। एनसीएईआर के अध्ययन हाऊ इंडिया अन्र्स स्पेंड्स ऐंड सेव्स के मुताबिक केवल 8 करोड़ भारतीय परिवार इतना पैसा कमाते हैं कि वे अपनी मूलभूत जरूरतों से इतर खर्च कर सकें। एनसीएईआर का कहना है कि इस समूह में प्रबंधन, तकनीकविद, पेशेवर वर्ग के लोग आते हैं जिनकी मासिक आय तकरीबन 13,000 रुपये प्रति माह है। देश के शेष लोग किसान, मछुआरे, परिवहन क्षेत्र में काम करने वाले, असंगठित जगहों पर काम करने वाले, हॉकर, फेरीवालों आदि से बनता है जिनकी मासिक आय बमुश्किल 4,000 रुपये से 5,000 रुपये के बीच है। उनके पास यह गुंजाइश ही नहीं होती कि वे अपनी विशिष्ट जरूरतों से इतर कुछ भी खर्च कर पाएं। 
 
ऐसा नहीं है कि देश में उत्पादों के लिए बाजार नहीं है, लेकिन इसका यह अर्थ अवश्य है कि उद्यमियों को अपने संभावित ग्राहकों को संतुष्ट करने के लिए उत्पादों को तकनीकी नवाचार के जरिये बेहतर बनाना होगा। देश में विकसित होने से इन चीजों की कीमत भी वैश्विक कीमतों से आधी या एक तिहाई होगी।  अब बात करते हैं देश की जन नीति से जुड़ी अगली बड़ी चुनौती की। यह है तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देने के लिए सैन्य खरीद पर बल देना। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की प्रोफेसर मैरियाना मज्जुकाटो ने हमारा ध्यान इस दिशा में दिलाया कि तकनीकी नवाचार सैन्य खरीद पर किस हद तक निर्भर है। 
 
अपनी किताब दी एंटरप्रेन्योरियल स्टेट: डीबंकिंग पब्लिक वर्सेज प्राइवेट सेक्टर मिथ्स  में वह आईफोन का उदाहरण देती हैं। सबको लगता है कि यह हमारे दौर के एक जीनियस स्टीव जॉब्स और उनकी कंपनी ऐपल का उत्पाद है। वह बताती हैं कि सेल्युलर तकनीक अपने आप में अमेरिकी सेना द्वारा किए गए निवेश से सामने आई।  आज हम सब जिस टच स्क्रीन मोबाइल फोन के दीवाने हैं वह, हमारी तस्वीरें-संगीत और फाइलें एकत्रित करने के काम आने वाली हार्ड ड्राइव, फोन में लगने वाली लिथियम इयॉन बैटरी और मोबाइल फोन के मैप में काम आने वाला जीपीएस, सब अमेरिकी सेना के निवेश की बदौलत हैं। वह बताती हैं कि विमानन और अंतरिक्ष, औषधि एवं जैव प्रौद्योगिकी तथा नैनोटेक्रॉलजी आदि सभी क्षेत्रों में अमेरिकी बढ़त के पीछे सेना की अहम भूमिका रही है। सेना की यह भूूमिका कतई नई नहीं है। उदाहरण के लिए आठवीं सदी के आरंभ में इस्पात की मांग में इजाफा तलवारों की मांग के कारण हुआ था। 
 
भारत के मोबाइल उद्योग ने एक जबरदस्त अवसर गंवाया है। सरकार की नीतियों की बदौलत भारतीय मोबाइल फोन सेवा प्रदाता मोबाइल नेटवर्क तकनीक और प्रबंधन के लिए आईबीएम जैसी विदेशी कंपनियों पर निर्भर हो गए। इन कंपनियों ने भारतीय कंपनियों के लिए किसी तरह का अवसर तैयार नहीं किया। अब भारत 8,000 करोड़ डॉलर मूल्य के मोबाइल फोन आयात करता है।  इस मांग की बदौलत देश में जीवंत और विश्वस्तरीय मोबाइल विनिर्माण क्षमता तैयार की जा सकती थी। पर्सनल कंप्यूटर के दौर में भी कई भारतीय कंपनियों ने पीसी हार्डवेयर और संबंधित सॉफ्टवेयर को लेकर काफी नवाचारी उत्पाद तैयार किए थे। लेकिन देश के रक्षा खरीद क्षेत्र से इसे समर्थन नहीं मिला और यह पहल पिछड़ कर रह गई। 
 
देश इन क्षेत्रों में आगे क्यों नहीं बढ़ सका, इसकी कई गहन राजनीतिक-आर्थिक वजहें हैं। डॉ. रघुनाथ माशेलकर और रवि पंडित ने अपनी हालिया पुस्तक लीपफ्रॉगिंग टु पोल वाल्टिंग, क्रिएटिंग दी मैजिक ऑफ रैडिकल येट सस्टेनेबल ट्रांसफॉर्मेशन नामक पुस्तक में कुछ उम्मीद दिखाई है।  'पोल वॉल्टिंग' से उनका तात्पर्य चार लीवर वाली व्यवस्था से है जो अन्य लीवरों के साथ मिलकर काम करती है। पहला लीवर तकनीक है और वे कहते हैं कि तकनीक का इस्तेमाल करते समय यह बात ध्यान में रहनी चाहिए कि तकनीक के लिए कुछ भी असंभव नहीं है। दूसरा लीवर है जन नीति लेकिन वे चेतावनी देते हैं कि सरकार को बहुत सावधानी से यह तय करना चाहिए कि उसे कब हस्तक्षेप करना है और कब नहीं करना है।
 
तीसरा लीवर है सामाजिक संबद्घता, यह तभी हासिल होती है जबकि उत्पाद या सेवाएं कुछ इस प्रकार तैयार की जाएं कि वे बड़ी आबादी के लिए उपयोगी साबित हों। खासतौर पर उन लोगों के लिए जो हाशिये पर हैं। अंतिम लीवर वह आर्थिक मॉडल है जो इस प्रयास को रेखांकित करता हो। यहां वे कहते हैं कि उत्पाद या सेवा का मूल्य कुछ ऐसा होना चाहिए कि वह सबको उचित प्रतीत हो। किताब में ऐसे कई उदाहरण दिए गए हैं जो प्रेरित करते हैं और यह उम्मीद जगाते हैं बड़ा बदलाव संभव है। अगर हम ऐसा कर सके तो जीवंत भारतीय उपभोक्ता बाजार देश की अर्थव्यवस्था को आगे ले जाने वाला इंजन बनेगा। 
Keyword: india, economy, technique,,
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