बिजनेस स्टैंडर्ड - शीत भंडारण विस्तार की राह पर
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शीत भंडारण विस्तार की राह पर

वीरेंद्र सिंह रावत / लखनऊ March 24, 2019

शीघ्र खराब होने वाली जिंसों की भंडारण संबंधी दिक्कत से निपटने की खातिर कोल्ड स्टोरों में सुधार या उनकी स्थापना के लिए अगले 4-5 वर्षों में 21,000 करोड़ रुपये का निवेश किया जा रहा है। मौजूदा कोल्ड स्टोरों में तत्काल सुधार की आवश्यकता है जिसमें संयंत्र, मशीनरी और प्रौद्योगिकी भी शामिल है। अविकसित खाद्य प्रसंस्करण मूल्य शृंखला एक अन्य ऐसा मसला है जिसका हल किया जाना है। फिलहाल कोल्ड स्टोरों की 68 फीसदी क्षमता का इस्तेमाल आलू भंडारण के लिए किया जाता है और इसके बावजूद किसानों को इसके सही दाम नहीं मिल पा रहे हैं। अन्य जिंसों की स्थिति भी ज्यादा अच्छी नहीं है। क्रिसिल रिसर्च ने अनुमान लगाया है कि कटाई के बाद मूल्य शृंखला में सुधार करने और तैयार खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की मांग पूरी करने के लिए 2019-23 के दौरान इस क्षेत्र में 16,000-21,000 करोड़ रुपये का निवेश किया जा रहा है। क्रिसिल रिसर्च की निदेशक हेतल गांधी के अनुसार ताजा निवेश निजी कंपनियों की ओर से किए जाने की उम्मीद की जा रही थी जबकि सरकार ने प्राय: सब्सिडी के जरिये इस क्षेत्र की मदद की। उदाहरण के लिए केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय ने 10 करोड़ रुपये की अधिकतम सीमा के साथ परियोजना लागत के 50 प्रतिशत की दर से अनुदान दिया। 10,000 टन क्षमता वाले विविध जिंसों के कोल्ड स्टोर स्थापित करने के लिए लगभग 20 करोड़ रुपये के निवेश की आवश्यकता होती है जिसकी वसूली छह-सात वर्ष में होती है।

 
बागवानी क्षेत्र की फसल कटाई के बाद तैयार खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की मूल्य शृंखला में निस्संदेह कोल्ड स्टोर बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं। फिलहाल भारत में कोल्ड स्टोर क्षमता 3.7-3.9 करोड़ टन है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग 7,645 कोल्ड स्टोर हैं जिसमें से 68 प्रतिशत क्षमता आलू भंडारण के लिए इस्तेमाल की जाती है जबकि 30 प्रतिशत कोल्ड स्टोर विविध जिंस वाले हैं। घरेलू कोल्ड स्टोर की कुल क्षमता में 55-60 प्रतिशत योगदान उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के प्रमुख आलू उत्पादकों का रहता है। आलू के अलावा विविध जिंसों वाले कोल्ड स्टोर मांस और पोल्ट्री, समुद्री खाद्य, डेरी उत्पाद, फल-सब्जी और दवाओं के लिए मांग पूरी करते हैं। उन्होंने बताया कि सामान्य रूप से एक्जिम केंद्रित जिंसों ने देश के 65-70 प्रतिशत कोल्ड स्टोरों पर कब्जा जमाया हुआ है। ऐसा इसलिए है क्योंकि जिन देशों को निर्यात करना होता है, उनके कड़े गुणवत्ता मानक पूरे करने होते हैं। इसके लिए पूरी मूल्य शृंखला में तापमान नियंत्रित भंडारण की आवश्यकता रहती है। कोल्ड स्टोरों पर जिंसों का कब्जा मौसम और स्थान के अनुसार अलग-अलग रहता है।
 
क्रिसिल को यह भी उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2019-23 के दौरान कोल्ड स्टोर उद्योग 13-15 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) की दर से बढ़ेगा जो मुख्य रूप से प्रसंस्कृत खाद्य, ताजे फल और सब्जियों, समुद्री खाद्य तथा बायो-फार्मास्युटिकल के निर्यात बाजारों में बढ़ती मांग से प्रेरित रहेगा। मौजूदा 2018-19 सीजन में ही आलू उत्पादन 5.2 करोड़ टन से अधिक रहने के अनुमान को ध्यान में रखें तो भी कोल्ड स्टोर की क्षमता में विस्तार किए जाने की जरूरत है। बहुत जल्द खराब होने वाली एक अन्य बागवानी जिंस-टमाटर का उत्पादन इस सीजन में लगभग दो करोड़ टन के स्तर तक पहुंचने का अनुमान है। इससे कोल्ड स्टोर क्षमता में और कमी आ सकती है।
 
वर्तमान में 95 प्रतिशत कोल्ड स्टोर निजी क्षेत्र, तीन प्रतिशत सहकारी समितियों और शेष दो प्रतिशत सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के पास हैं। चूंकि इस क्षमता का बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र के पास है इसलिए उद्योग को सरकारों की ओर से मदद की दरकार है। कोलकाता के आलू व्यापारी और कोल्ड स्टोर के मालिक पतित पावन दे ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा कि घरेलू क्षमता बढ़ाने की तत्काल आवश्यकता है। सरकार को कोल्ड स्टोर की स्थापना और उनके सुधार के लिए पूंजीगत सब्सिडी जैसी मदद प्रदान करनी चाहिए जो फिलहाल आर्थिक कठिनाई का सामना कर रहेे हैं।
 
उत्तर प्रदेश में करीब 2,000 कोल्ड स्टोर हैं जिनकी संयुक्त क्षमता तकरीबन 1.5 करोड़ टन है। इसके बाद मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा आदि का स्थान आता है। पिछले कई वर्षों के दौरान बागवानी फसलों सहित बढ़ते कृषि उत्पादन ने सरकारों पर न केवल यह दबाव बनाए रखा कि किसानों के लिए दाम आकर्षक रहें बल्कि यह दबाव भी रहा कि खुदरा मुद्रास्फीति भी संतुलित रहे।
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