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स्वयंसेवी संगठन की तरह चुनाव मैदान में कांग्रेस

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  March 24, 2019

पहले चरण के मतदान में दो सप्ताह से भी कम वक्त बचा है। ऐसे में प्रश्न यह है कि कांग्रेस इस चुनौती के लिए कितनी तैयार है? कांग्रेस के बड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं का उत्साह कैसा है? ये बड़े नेता या नेतृत्वकर्ता कौन हैं? कांग्रेस काफी समय से कह रही है कि मोदी सरकार इतिहास की सबसे भ्रष्ट, अक्षम, विभाजनकारी और विनाशकारी सरकार है। परंतु कांग्रेस हमें यह नहीं बता रही है कि उसके पास इससे निपटने की क्या योजना है। मतदाताओं के लिए महत्त्वपूर्ण मुद्दों मसलन रोजगार और अर्थव्यवस्था, राष्ट्रवाद और सामाजिक समरसता आदि को लेकर उसका क्या रुख है? यहां मैं एक और प्रश्न करना चाहता हूं। आपको क्या लगता है कि आज कांग्रेस कैसी है? क्या वह ऐसा राजनीतिक दल है जो अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है? या फिर वह एक स्वयंसेवी संगठन (एनजीओ) की भांति है जिसका मानना है कि वह अपने काम से दुनिया बदल देगा?

 
इससे कांग्रेस समर्थक नाराज हो सकते हैं लेकिन यह बात आवश्यक है। बीते पांच वर्ष में अधिकांश वक्त आपके प्रतिद्वंद्वी ने आपको ठिकाने से लगाए रखा और अब वह अंतिम प्रहार की तैयारी में है। यदि पुन: कांग्रेस का प्रदर्शन कमजोर रहा तो पार्टी के कई हताश और व्यग्र सदस्य बाहर की राह लेंगे। इस बात की भी काफी आशंका है कि हार के बाद कर्नाटक और मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार गिर जाए। राजस्थान में भी अगर सरकार बच गई तो यह खुशकिस्मती होगी। तब कांग्रेस के पास बचेगा क्या? संभव है कि तब भी यह उन्हीं पुराने या शायद नए स्वयंभू चाणक्यों और मैकियावेलियों और स्वयंभू बौद्धिकों की पार्टी बनी रहेगी जिनमें एक साझा बात यह होगी कि वे कोई चुनाव न लड़े हैं और न ही जीते हैं। जहां उनको प्रभार सौंपा गया वहां भी बाजी हाथ से निकल गई। राजनीतिक दलों का एक ही लक्ष्य होता है-चुनावी जीत। इसके लिए कड़ी मेहनत और प्रतिबद्धता की आवश्यकता होती है। सफलता के साथ इनाम आता है और विफलता की कीमत चुकानी पड़ती है। संक्षेप में कहें तो इसका संबंध जवाबदेही से है। आप बताइए कि क्या कांग्रेस में भी हाल के दिनों में ऐसा ही कुछ होता रहा है? अगर इसका उत्तर ना है तो मैं आपको बताता हूं कि क्यों पार्टी एक स्वयंसेवी संगठन जैसी दिखती है। स्वयंसेवी संगठन भी कड़ी मेहनत करते हैं लेकिन उनके लक्ष्य और उनका ध्यान बदलता रहता है। उनकी प्रतिस्पर्धा सरकार से होती है। वे तुलनात्मक रूप से हमेशा सक्षम नजर आते हैं। वहां जवाबदेही दानदाता या लोगों की आत्मचेतना की होती है। वहां भी सत्ता विरोधी भावना होती है।
 
बीते वर्षों के दौरान कांग्रेस सामंती होती गई और काबिलियत का मान घटता गया। नई प्रतिभाएं बहुत कम सामने आईं। गांधी परिवार समेत पार्टी के पुराने नेता अपनी पकड़ बचाए रखने में लगे रहे। वे पार्टी का अपने क्षेत्रों में विस्तार तक नहीं कर सकते, वे नए लोगों के लिए जगह भी नहीं खाली करते। युवा प्रवक्ता काफी अच्छे हैं लेकिन वे चुनाव नहीं लड़ते। उन्हें अपनी प्रतिष्ठा और संपत्ति की चिंता रहती है। देश भर में कांग्रेस के शीर्ष 50 लोगों की सूची बनाएं तो आपको इस विरोधाभास का अंदाजा लग जाएगा।
 
इसके विपरीत दरबार में या जवाबदेही मुक्त स्वयंसेवी संगठन अथवा पारिवारिक कारोबारों में चापलूस प्राय: बचे रहते हैं। आपको शायद मोहन प्रकाश का नाम भी याद न हो। यह पुराने समाजवादी राहुल गांधी की पसंद थे। उन्हें एक के बाद एक महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश समेत कई प्रमुख राज्य सौंपे गए। वह राहुल गांधी को कांग्रेस का जयप्रकाश नारायण बताकर प्रसिद्ध हुए और राहुल के करीबी बने। उनकी नाकामियों में निरंतरता साफ नजर आती थी। कांग्रेस के लोगों से उनके बारे में पूछिए तो वे आपको आमिर खान की फिल्म 3ईडियट्स का गाना सुना देंगे- कहां से आया था वो, कहां गया उसे ढूंढ़ो...।
 
वह इकलौते नहीं हैं। सीपी जोशी भी लंबे समय तक राहुल गांधी के करीबी पसंदीदा रहे। उन्होंने भी जिस चीज को हाथ लगाया उसे नष्ट कर दिया। इसका ताजा उदाहरण है पूर्वोत्तर। क्या उन्हें जवाबदेह ठहराया गया, कतई नहीं। बशर्ते कि आप यह न सोचते हों कि राजस्थान विधानसभा का अध्यक्ष बनाया जाना कोई दंड है। मेरे सहकर्मी और दी प्रिंट के राजनीतिक संपादक डी के सिंह ने मुझे राहुल गांधी की 'ए' टीम का ब्योरा दिया। वह नाकाम लोगों की फेहरिस्त है। अशोक तंवर जो एक समय राहुल के युवा दलित सितारा थे, वह अपना लोकसभा चुनाव हारने और विधानसभा चुनाव में पार्टी के सफाये के बाद भी हरियाणा कांग्रेस के प्रमुख बने हुए हैं। 
 
हरियाणा में एक और वंशवादी चेहरा हैं पार्टी के मीडिया प्रमुख रणदीप सिंह सुरजेवाला। वह हालिया जींद लोकसभा उपचुनाव में बमुश्किल तीसरे स्थान पर रहे। महासचिवों में अंबिका सोनी और मुकुल वासनिक चुकी हुई ताकत होने के बावजूद क्रमश: जम्मू कश्मीर तथा केरल और तमिलनाडु के प्रभारी बने हुए हैं। दीपक बाबरिया मध्य प्रदेश के प्रभारी बने हुए हैं जबकि उन्होंने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा। विदेश प्रभाग के प्रमुख आनंद शर्मा और पार्टी के शक्तिशाली कोर ग्रुप के समन्वयक जयराम रमेश पर भी यह बात लागू होती है। कोर समूह में ए के एंटनी 2001 के बाद से चुनाव नहीं लड़े हैं। केसी वेणुगोपाल निवर्तमान सांसद हैं लेकिन पार्टी के कामकाज के कारण वह इस बार शायद ही चुनाव लड़ें। क्या आप सोच सकते हैं कि अमित शाह इस बार पार्टी पर ध्यान नहीं दे पाएंगे क्योंकि वह गांधीनगर से लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं।
 
राहुल के इर्दगिर्द मौजूद सलाहकार स्मार्ट और पढ़े लिखे लोग हैं। उनके विश्वसनीय सहयोगी कनिष्क सिंह, बेहतरीन ट्वीट लेखक निखिल अल्वा, पूर्व अफसरशाह के राजू, डेटा वैज्ञानिक प्रवीण चकवर्ती, प्रमुख वैचारिक प्रशिक्षक सचिन राव, पूर्व बैंकर अलंकार सवाई और सोशल मीडिया प्रमुख दिव्या स्पंदना। क्या आपको इनके बीच कुछ समानता दिखती है? स्पंदना को छोड़कर कोई भी राजनेता नहीं है। इनमें सबसे अधिक नजर आने वाले हैं संदीप सिंह। वह जेएनयू में आइसा के नेता रहे हैं और राहुल के भाषण लिखते हैं। महासचिवों, कोर ग्रुप और राहुल के प्रमुख सलाहकारों पर नजर डालें तो केवल चंद लोगों के पास राजनीतिक दिमाग है। इनमें सबसे तीक्ष्ण हैं अहमद पटेल लेकिन अब वह केंद्रीय भूमिका में नहीं हैं। याद रहे वह ऐसे पुराने कांग्रेसी हैं जिसने अमित शाह से उनके गृह राज्य में लड़ाई लड़ी और चुनाव आयोग से लड़भिड़ कर राज्य सभा सीट हथियाई।  हमने ऊपर जिन तीन मुद्दों के बारे में बात की अगर उन्हें लेकर कांग्रेस की सोच का पता लग जाता तो ये बातें मायने नहीं रखतीं। वह रोजगार, अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र की निराशा के मुद्दे पर नरेंद्र  मोदी पर हमले जारी रख सकती है। परंतु इससे ये समस्याएं हल कैसे होंगी यह हमें नहीं बताया जाता। इन दिनों राहुल जिन एक्टिविस्टों पर मोहित हैं, उनकी आइसा की शैली की वामपंथी राजनीति कुछ लोगों को लुभा सकती है। परंतु जब हमें दायित्व मिलेगा तब हम उत्तर देंगे वाली शैली सही नहीं है।
 
राष्ट्रवाद, सुरक्षा, आतंक के खिलाफ जंग, विदेश नीति आदि के मोर्चे पर कांग्रेस जड़ नजर आती है लेकिन तभी कोई सैम पित्रोदा आकर उसे झटका दे देते हैं। कांग्रेस का कोई नेता यह नहीं कहता कि मिराज और सुखोई समेत जिन विमानों और हथियारों से जंग लड़ी जा रही है, उन्हें कांग्रेस की सरकारों ने खरीदा था। दूसरी ओर राहुल से ऐसे झूठ बुलवाए जाते हैं जिन्हें आसानी से पकड़ा जा सकता है। उदाहरण के लिए यह कहना कि मिराज एचएएल ने बनाए। एचएएल ने न कभी मिराज बनाया, न बनाएगा। यह विमान दसॉ ने बनाया है और इसका ऑर्डर सन 1982 में उनकी दादी इंदिरा गांधी ने दिया था। तीसरा मुद्दा है सामाजिक समरसता का। यहां प्रेम और सहिष्णुता की बातें करना अच्छा है लेकिन सबरीमला, तीन तलाक और राम मंदिर के मुद्दे पर आप भाजपा से अलग कैसे हैं?
 
पिछले दिनों टी एन नाइनन ने अपने स्तंभ साप्ताहिक मंथन में संप्रग सरकार की उपलब्धियां गिनाई थीं। इनमें लोगों की गरीबी दूर करने से लेकर कृषि विकास, बुनियादी व्यय, आधार की सुविधा आदि का जिक्र था। मैं इसमें नाभिकीय समझौते को शामिल करना चाहूंगा। उन्होंने सवाल किया था कि कांग्रेस अपनी उपलब्धियों का जिक्र क्यों नहीं कर रही और मोदी को यह माहौल बनाने दे रही है कि देश में जो कुछ हुआ वह पिछले पांच साल में ही हुआ? कांग्रेस को ये मुद्दे उठाने चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता तो आप ही तय कीजिए कि यह राजनीतिक दल है या स्वयंसेवी संगठन। स्वयंसेवी संगठन भी सत्ता विरोधी होते हैं, भले ही वे दशक भर सत्ता का हिस्सा रहे हों।
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