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स्टार्टअप के लिए राहत

संपादकीय /  March 24, 2019

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) का डिफरेंशियल वोटिंग राइट्स (डीवीआर) वाले शेयर जारी करने के बारे में मशविरा पत्र लाना गैर सूचीबद्ध कंपनियों के प्रवर्तकों के लिए खुशी की एक वजह तो है। उच्च मताधिकार के साथ जारी किए जाने वाले शेयरों पर सन 2009 में ही प्रतिबंध लगा दिया गया था। नया कदम दर्शाता है कि सेबी का ध्यान उस समस्या पर है जिसका सामना कई गैर सूचीबद्ध स्टार्टअप के प्रवर्तकों को करना पड़ रहा है। यानी बिना अपनी फर्म पर नियंत्रण गंवाए वृद्धि को गति देने के लिए निरंतर फंड की जरूरत। सेबी ने ऐसी कंपनियों को सूचीबद्ध करने का प्रस्ताव भी रखा है, बशर्ते कि मसौदा विवरणिका फाइल करने के पहले एक वर्ष से अधिक समय तक प्रवर्तक सुपीरियर वोटिंग राइट अपने पास रखे। गत वर्ष हॉन्गकॉन्ग और सिंगापुर स्टॉक एक्सचेंजों ने दोहरी श्रेणी के शेयरों वाली कंपनियों को सूचीबद्ध करने की अनुमति दी थी।

 
सूचीबद्धता की प्रक्रिया में सहायता के लिए सेबी ने प्रस्ताव रखा है कि डीवीआर जारी करने के पहले लगातार तीन वर्ष तक मुनाफे की जरूरत जैसे प्रावधान शिथिल किए जाएंगे। प्रवर्तकों को सूचीबद्धता के बाद 'सुपीरियर' शेयर रखने और अधिग्रहण संहिता में बदलाव की अनुमति दी जाएगी। हालांकि ये शेयर सूचीबद्धता के बाद नहीं जारी किए जा सकते, न ही इनका कारोबार किया जा सकता है। गूगल की प्रवर्तक अल्फाबेट, फेसबुक और अलीबाबा जैसी वैश्विक कंपनियों के प्रवर्तकों ने अपनी कंपनियों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए यह तरीका अपनाया है। मशविरा पत्र में सेबी ने प्रति शेयर वोट के मामले में इन कंपनियों का अनुसरण किया है। सुपीरियर वोटिंग राइट के मामले में एक शेयर पर अधिकतम 10 वोट हो सकते हैं। आंशिक मताधिकार के मामले में 10 शेयरों पर एक वोट हो सकता है।
 
फेसबुक इसे समझने के लिए अच्छा उदाहरण है। एक ओर उसकी काफी आलोचना हुई क्योंकि जकरबर्ग और अन्य प्रवर्तकों के पास 70 फीसदी मताधिकार हैं। उसी समय जकरबर्ग ने 2012 में इंस्टाग्राम को 100 करोड़ डॉलर में खरीदने के लिए अपने उच्च वोटिंग अधिकार का इस्तेमाल किया और उच्च लाभांश का भुगतान किया। 2018 में इंस्टाग्राम का मूल्यांकन बढ़कर 10,000 करोड़ डॉलर हो गया। इस तरह कंपनी के संस्थापक की दूरदर्शिता से सभी अंशधारकों का मूल्यवर्धन हुआ। सेबी ने यह कदम ऐसे वक्त उठाया है जब एक शेयर, एक वोट बनाम सुपीरियर शेयर की बहस दुनिया भर में चल रही है। प्रमुख फंड प्रबंधक और कंपनी प्रशासन के विशेषज्ञों ने यह चेतावनी जारी की है कि दोहरी श्रेणी के शेयरों से सार्वजनिक निगरानी में कमी आएगी और अंशधारकों के प्रति प्रबंधन की जवाबदेही भी घटेगी। ऐसे ढांचे निदेशक मंडल के कर्तव्य निर्वहन की क्षमता को भी प्रभावित करते हैं। आलोचक कहते हैं कि मताधिकार को इस प्रकार आर्थिक स्वामित्व से अलग करना अंशधारकों के लिए नुकसानदेह है। खासतौर पर लंबी अवधि में इसका नुकसान हो सकता है। ऐसे ढांचे के खिलाफ अन्य दलीलों में पारिवारिक स्वामित्व वाली कंपनियों द्वारा किया जाने वाला दुरुपयोग शामिल है। कुछ गलत होने पर अंशधारक ज्यादा कुछ कर नहीं सकते और मताधिकार हस्तांतरणीय होता है। इस संबंध में सेबी ने रूढि़वादी रुख अपनाकर समझदारी दिखाई है। उसने सूचीबद्धता के पांच वर्ष बाद सनसेट क्लॉज लागू करने का प्रस्ताव रखा है। अगर बहुलांश अंशधारक सहमत हों तो इसे पांच साल के लिए बढ़ाया जा सकता है। कई अन्य प्रतिबंध भी हैं। आईपीओ के बाद स्वतंत्र निदेशक या अंकेक्षक की नियुक्ति या निष्कासन के वक्त, कंपनी के स्वामित्व में बदलाव के वक्त, स्वैच्छिक रूप से उसे बंद करते वक्त सुपीरियर शेयर को सामान्य माना जाएगा। इससे पर्याप्त जांच-परख सुनिश्चित होगी और व्यवस्था का दुरुपयोग कम से कम होगा। 
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