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बैलेंस्ड एडवांटेज फंडों से भावनाओं को निवेश फैसलों से रखें बाहर

सरबजीत के सेन /  March 24, 2019

अगर आप शेयरों में रकम लगाना चाहते हैं, लेकिन बाजार में चलने वाले उतार-चढ़ाव का आपको डर लगा रहता है तो आप बैलेंस्ड एडवांटेज फंड में निवेश करने पर विचार कर सकते हैं। ये फंड शेयर यानी इक्विटी और डेट में रकम लगाते हैं और बाजार की चाल तथा मूल्यांकन के हिसाब से दोनों में आवंटन बदलते रहते हैं। जब बाजार गोता खाता है तो ये फंड इक्विटी में निवेश बढ़ा देते हैं और जब बाजार चढ़ता है तथा शेयर महंगे हो जाते हैं तो  इनका निवेश डेट की तरफ मुड़ जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि बैलेंस्ड एडवांटेज फंड उन निवेशकों के लिए कारगर विकल्प हैं, जो दोनों हाथों में लड्डïू चाहते हैं यानी जो इक्विटी के जरिये संपत्ति तैयार करने के मौके भी लपकना चाहते हैं और डेट में मिलने वाले स्थायित्व का फायदा भी उठाना चाहते हैं। प्रभुदास लीलाधर में सहायक उपाध्यक्ष (म्युचुअल फंड रिसर्च ऐंड कंटेंट) जेसन मोंटीरो बताते हैं, 'ये फंड पोर्टफोलियो में विविधता की सुविधा देते हैं और इसमें फंड प्रबंधक ही तय करता है कि कितना निवेश इक्विटी में जाएगा और कितना डेट में। ये फंड लंबी अवधि में निवेश की मंशा रखने वाले ऐसे लोगों के लिए उपयुक्त हैं, जो सक्रिय संपत्ति आवंटन के जरिये बाजार के जोखिमों से बचना चाहते हैं।'

 
ये फंड नए निवेेशकों के लिए भी उपयुक्त हैं। रिलायंस म्युचुअल फंड के मुख्य निवेेश अधिकारी (इक्विटी निवेश) मनीष गुनवानी समझाते हैं, 'ये फंड उन लोगों के लिए खास तौर पर कारगर हैं, जो उतार-चढ़ाव से बचना चाहते हैं और पहली बार शेयरों में निवेश कर रहे हैं।' बैलेंस्ड एडवांटेज फंड इक्विटी और डेट में आवंटन का फैसला अपने पास पहले से मौजूद मूल्यांकन मॉडल के आधार पर करते हैं। हालांकि हरेक फंड मूल्यांकन के अपने तरीके जैसे प्राइस-टु-अर्निंग्स, प्राइस-टु-बुक, अर्निंग यील्ड, बॉन्ड यील्ड आदि का इस्तेमाल करता है, लेकिन सभी का जोर इसी बात पर रहता है कि शेयरों को कम कीमत में खरीदा जाए और ऊंचे भाव पर बेच दिया जाए। महीने के अंत में वे देखते हैं कि मूल्यांकन में कितना अंतर आया और उसी के आधार पर आवंटन में संतुलन बना लेते हैं। आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल एएमसी के कार्यकारी निदेशक एवं सीआईओ एस नरेन कहते हैं, 'आवंटन की ऐसी व्यवस्था से सुनिश्चित होता है कि निवेशकों को बाजार में उस समय रकम लगाने का मौका मिले, जब उसमें उछाल आ रही हो। लेकिन जब बाजार में गिरावट आती है तो डेट वाले अंश के कारण सुनिश्चित होता है कि निवेश में सेंध कम से कम लगे।'
 
इन फंडों का सबसे बड़ा फायदा यह है कि फैसला लेते समय भावनाओं को बिल्कुल अलग रख दिया जाता है। गुनवानी कहते हैं, 'अच्छा यही होता है कि जब बाजार गिरें, उस समय इक्विटी में आवंटन बढ़ा दिया जाए। लेकिन उदाहरणों से यही पता चलता है कि फंडों में निवेश उस समय बढ़ जाता है, जब बाजार चढ़ रहे होते हैं। बाजार मूल्यांकन कम और आकर्षक होने यानी शेयरों में गिरावट के समय निवेश लगभग थम जाता है। इसकी वजह यह है कि बाजार बहुत नीचे जाने पर निवेशकों को डर लगने लगता है और बाजार चोटी पर जाए तो उनका लालच बढ़ जाता है। ऐसी प्रवृत्ति को और उसके कारण गलत आवंटन की आशंका को दूर रखने के लिए इसमें एक नियम पर काम किया जाता है। नियम यह है कि आवंटन तय करने के लिए मूल्यांकन को ही सबसे पहला तरीका माना जाए क्योंकि लंबी अवधि में यही फायदेमंद होता है।' ऐसे फंडों से उस निवेशक को भी फायदा होता है, जो इक्विटी में निवेश तो करना चाहता है, लेकिन जिसे यह नहीं पता कि अपने संपत्ति आवंटन में फेरबदल कब करना है। नरेन कहते हैं, 'बाजार पर लगातार नजर रखने और अपने संपत्ति आवंटन में जरूरी फेरबदल करने में निवेशकों का जो समय और ऊर्जा लगते, उन्हें ये फंड बचा देते हैं।' ये फंड निवेशकों को लंबी अवधि में जोखिम निकालने के बाद अच्छा खासा प्रतिफल मुहैया कराने की क्षमता रखते हैं। 
 
इक्विटी फंडों की बात करें तो बैलेंस्ड एडवांटेज फंड कर के मामले में भी किफायती हैं। जब वे इक्विटी में निवेश घटाते हैं तो उनका निवेश डेरिवेटिव में जाता है और इस तरह इक्विटी और डेरिवेटिव में उनका कुल आंवटन हमेशा 65 फीसदी से अधिक रहता है। इक्विटी फंडों में 1 साल से अधिक समय तक निवेश बरकरार रखा जाए तो वित्त वर्ष के दौरान 1 लाख रुपये से अधिक का मुनाफा होने पर केवल 10 फीसदी कर देना पड़ेगा। अगर निवेश कम अवधि के लिए रखा जाता है तो 15 फीसदी की दर से अल्पावधि पूंजीगत लाभ कर देना पड़ता है। 
 
बैलेंस्ड एडवांटेज फंडों में पैसा लगाने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखें। चूंकि ये इक्विटी से जुड़े होते हैं, इसलिए उनके प्रतिफल में भी उतार-चढ़ाव आ सकता है। अगर बाजार के हालत प्रतिकूल हुए तो इनमें प्रतिफल ऋणात्मक भी हो सकता है यानी निवेशक को नुकसान भी हो सकता है। इसलिए इनमें कम से कम सात साल की अवधि के लिए निवेश करें ताकि बाजार में उतार-चढ़ाव के चक्र का आप पर कोई असर नहीं हो। जो निवेशक ऋणात्मक प्रतिफल के लिए तैयार नहीं हैं, उन्हें इन फंडों से दूर रहना चाहिए। मोंटीरो कहते हैं कि जिन लोगों के भीतर जोखिम लेने की कुव्वत है और जो लंबे अरसे के लिए निवेश करना चाहते हैं, उन्हें डाइवर्सिफाईड इक्विटी फंडों का रुख करना चाहिए और 90 फीसदी से अधिक निवेश आवंटन इक्विटी में ही रखना चाहए।
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