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एकमुश्त निपटान का विकल्प चुन रहे बैंक

देव चटर्जी और अभिजित लेले / मुंबई 03 22, 2019

दिवालिया मामलों में बढ़ती कानूनी कार्यवाही को देखते हुए बैंक दिवालिया संहिता की धारा 12 ए के तहत डिफॉल्ट करने वाली फर्मों से कर्ज निपटान की पेशकश को चुन रहे हैं। इस धारा के तहत लेनदारों के पास प्रवर्तकों से ऐसी पेशकश स्वीकार करने का विकल्प होता है। लेनदारों ने कहा कि मार्च तिमाही में इस तरह का निपटान 100 खातों के पार निकल जाएगा। वित्त वर्ष समाप्त होने को है, लिहाजा प्रवर्तक एकमुश्त भुगतान पर बातचीत कर रहे हैं। एक संपत्ति पुनर्गठन कंपनी (एआरसी) के प्रमुख ने कहा, डिफॉल्टरों के बीच इस बात को लेकर बेचैनी है कि वे अपनी कंपनियों से नियंत्रण गंवा देंगे, लिहाजा वे पेशकश के साथ सामने आ रहे हैं।
 
भारतीय ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवाला बोर्ड (आईबीबीआई) के आंकड़ों के मुताबिक, लेनदारों ने दिसंबर तिमाही में 36 प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए जबकि जून तिमाही में महज एक प्रस्ताव पर हस्ताक्षर हुए थे। कुल मिलाकर वित्त वर्ष 2019 में लेनदारों ने 63 प्रस्ताव स्वीकार किए। आईबीसी की प्रक्रिया के तहत औसतन 50 फीसदी की कटौती हो रही है, ऐसे में बैंक एकमुश्त भुगतान योजना में इतनी ही कटौती स्वीकार कर रहे हैं और कुछ मामलों में से तो इससे भी ज्यादा। उदाहरण के लिए स्टर्लिंग बायोटेक के मामले में बैंक 65 फीसदी की कटौती झेलने के लिए तैयार हो गए, वहीं आलोक इंडस्ट्रीज के लेनदारों ने रिलायंस इंडस्ट्रीज की पेशकश स्वीकार करते हुए 85 फीसदी की कटौती झेली। 
 
लॉ फर्म एमडीपी पार्टनर्स के मैनेजिंग पार्टनर निश्ीाथ ध्रुव ने कहा, निपटान पेशकश के साथ कई प्रवर्तक प्रतीक्षा कर रहे हैं। लेनदार नए प्रस्ताव पर विचार कर रहे हैं और आगामी तिमाहियों में हमें कई नए खाते के निपटान की उम्मीद है। जून 2018 में सरकार ने अध्यादेश के जरिये आईबीसी में बदलाव किया और इसके तहत धारा 12ए जोड़ दी। यह धारा एनसीएलटी को दिवालिया प्रक्रिया वापस लेने की अनुमति देता है, लेकिन इसके लिए जरूरी यह है कि लेनदारों की समिति के 90 फीसदी सदस्य इससे सहमत हों।
 
लेनदारों ने कहा कि आईबीसी प्रक्रिया के तहत सबसे बड़ी समस्या कानूनी संघर्ष की रही, इसके बाद कुछ अगंभीर बोलीदाता आ गए और कुछ मामलों में पर्याप्त नकदी के बिना भी बोलीदाता आ गए। एक बैंकर ने कहा, कानूनी संघर्ष ने 40 अग्रणी कंपनियों का समाधान 180 दिन की तय समयावधि से आगे खींच लिया। इसके अलावा जब कुछ मामले एनसीएलटी भेजे गए तो कानून में बार-बार हुए बदलाव हुए, इसने भी देरी में योगदान किया। विश्लेषकों ने कहा, चूंकि बैंकों के पास फंसे कर्ज का पहाड़ है, लिहाजा एकमुश्त भुगतान की पेशकश स्वीकार करने और फिर इसे एआरसी को बेचने का मतलब बनता है। इससे उनकी फंसी पूंजी बाहर आ जाएगी और वह भी आईबीसी की प्रक्रिया पूरी होने से काफी पहले। एडलवाइस समूह के चेयरमैन राशेश शाह ने कहा, एआरसी की प्रक्रिया के चलते बैंकों को अन्य जरियों के मुकाबले 10-15 फीसदी ज्यादा मिल रहा है और वह भी कर्ज समाधान की अन्य प्रक्रिया के मुकाबले कम से कम 1-2 साल पहले। एनसीएलटी को डिफॉल्टरों की तरफ से अनावश्यक देरी की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि ये परिसंपत्तियां देश की है।
 
अन्य मामला खरीदारों की फंडिंग का है। जहां छोटी इकाइयां दिवालिया प्रक्रिया का सामना कर रही होती हैं वहां नए खरीदार की तलाश करना चुनौतीपूर्ण होता है। इंडियन बैंक एसोसिएशन के मुख्य कार्याधिकारी वी जी कन्नन ने कहा कि कॉरपोरेट खाते का एकमुश्त भुगतान छोटे आकार वाली दबावग्रस्त परिसंपत्ति में हो रहा है। नए प्रवर्तकों के आने की संभावना दूर की कौड़ी है।
Keyword: bank, loan, debt, RBI, NPA,,
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