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नई जीएसटी योजना से डेवलपरों में नहीं है उत्साह

करण चौधरी और राघवेंद्र कामत / नई दिल्ली March 22, 2019

वस्तु एवं सेवा कर (जीसटी) परिषद की ओर से डेवलवपरों को जीएसटी के पुराने या नए नियम में से किसी एक का चयन करने का विकल्प दिए जाने के बाद भी उनमें उत्साह नजर नहीं आ रहा है। ये बातें उद्योग के विशेषज्ञों के हवाले से सामने आई है। बहुत से डेवलपरों का कहना है कि उन्होंने जीएसटी परिषद से जो मांगें रखी थी उनको मंजूरी नहीं दी गई है। ज्यादातर डेवलपरों का दावा है कि सरकार ने विकल्प चुनने का रास्ता देकर अपनी जिम्मेदारी से छुटकारा पा लिया है और सरकार के इस कदम से समूची कर प्रक्रिया जटिल और उलझन भरी हो गई है। एएमआरजी ऐंड एसोसिएट्स के पार्टनर रजत मोहन ने कहा, 'रियल्टी क्षेत्र पहले से ही विभिन्न विधायी प्रतिबंधों से दबा पड़ा है। कर कटौती के नाम पर जीएसटी के नियमों से यह क्षेत्र और अधिक आर्थिक दुष्चक्र में फंस सकता है।' वहीं अन्य मानते हैं कि इससे संभावित घर खरीदार की योजना जटिल हो सकती है। मुंबई स्थित वाधवा समूह के वित्त उपाध्यक्ष परेश वर्मा ने कहा, 'डेवलपरों के लिए ये विकल्प भ्रामक होने के साथ ही चालाकी भरे हैं। इससे उद्योग में और अधिक अव्यवस्था पैदा होने की आशंका है, हालांकि ग्राहक इस स्थिति का लाभ लेने को इच्छुक हो सकते हैं। यदि कोई डेवलपर 5 फीसदी जीएसटी वसूलता है और हम 12 फीसदी जीएसटी वसूलते हैं तो खरीदार अपना मन बदल सकते हैं। जबकि ग्राहक को दोनों ही स्थिति में करीब करीब बराबर राशि का ही भुगतान करना होगा।'  
 
सोमवार को कई डेवलपरों ने वित्त मंत्री अरुण जेटली से मुलाकात कर उन्हें अपना मांग पत्र दिया, जिसे जीएसटी परिषद को दिया जाएगा। सूत्रों के मुताबिक उद्योग ने कहा था कि वे चाहते हैं कि सस्ते मकान के कीमत दायरे को मौजूदा 45 लाख रुपये से बढ़ाकर लगभग 1 करोड़ रुपये कर दिया जाए। इस बैठक का हिस्सा रहे एक सूत्र ने कहा, 'मुंबई और दिल्ली-एनसीआर के क्षेत्रों में एक घर की कीमत करीब 55 लाख रुपये से 90 लाख रुपये के बीच है। कीमत दायरे में वृद्घि होने पर बड़ी संख्या में परियोजनाओं को किफायती आवास योजना के तहत लाने में मदद मिलेगी। यदि सरकार सभी को घर देना चाहती है तो यह उन क्षेत्रों में होना चाहिए जहां जायदाद पहले से ही महंगी है।'  
 
डेवलपरों ने कहा कि यदि किफायती आवास योजना के कीमत दायरे का विस्तार किया गया होता और सीमेंट पर लगने वाले 28 फीसदी जीएसटी दर को घटाया गया होता तो इसका आवासीय क्षेत्र पर बहुत बड़ा असर दिखाई पड़ता। पैराडाइम रियल्टी के प्रबंध निदेशक पार्थ मेहता ने कहा, 'यदि डेवपलर इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) का लाभ लेना चाहते हैं और निर्माणाधीन परियोजनाओं के लिए पुरानी जीएसटी दर को जारी रखना चाहते हैं तो इससे मांग को चोट पहुंचेगी। इसकी वजह है कि उस स्थिति में ग्राहक कम जीएसटी दर वाले नए मकानों का इंतजार करने को तरजीह देंगे या फिर नई जीएसटी दर देने वाली परियोजनाओं का चुनाव करेंगे। यदि जीएसटी परिषद केवल नई परियोजनाओं के लिए नई दर की घोषणा करती तो यह तर्कसंगत होता। इससे खरीदारों और डेवलपरों के बीच तनाव को दूर करने में मदद मिलती।'
 
उद्योग के विशेषज्ञों ने कहा कि डेवलपरों के लिए पहले वाली व्यवस्था ही लाभकारी थी क्योंकि तब वे खरीदारों से लिए गए जीएसटी के बदले इनपुट पर भुगतान किए गए कर का मुआवजा ले सकते थे। नाइट फ्रैंक इंडिया के शोध कार्यकारी निदेशक अरविंद नंदन ने कहा, 'आईटीसी नही देने से सीधे सीधे उनकी लागत बढ़ जाती है लिहाजा मार्जिन दबाव पड़ता है। उपभोक्ता नई कर व्यवस्था को ही तरजीह देंगे क्योंकि पहले उन्हें मिलने वाले आईटीसी की सीमा को लेकर उनमें मुश्किल से ही कोई स्पष्टता थी। फिर, आईटीसी का औसत परियोजना दर परियोजना और डेवलपर दर डेवलपर बदल जाता है। खरीदारों को आईटीसी मिला है यह सुनिश्चित करने को कोई रास्ता नहीं था।'
 
हालांकि रियल स्टेट निकाय नारेडको ने कहा कि अब डेवलपर अपने मुताबिक विकल्प चुन सकते हैं। नारेडको के उपाध्यक्ष और ट्यूलिप इन्फ्राटेक के सीएमडी प्रवीण जैन ने कहा, 'यह परियोजना के निर्माण के चरणों और निर्माण से जुड़े भुगतान पर निर्भर करेगा। इसका मतलब है कि कुछ परियोजनाओं में पहले की जीएसटी व्यवस्था लाभकारी हो सकती है जबकि कुछ दूसरी परियोजनाओं में नई जीएसटी व्यवस्था से लाभ मिलेगा।'
Keyword: real estate, property, GST,,
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