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राजनीतिक नहीं बल्कि अफसरशाही पर काबू पाने की सावंत की चुनौती

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  March 22, 2019

गोवा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के साथ लंबे समय तक काम कर चुके एक समर्थक राज्य के नए मुख्यमंत्री के बारे में कहते हैं, 'अगर कमरे में 10 लोग मौजूद हैं और उनमें से एक देवेंद्र फडणवीस (महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री) भी हैं तो आप चंद पलों में ही उन्हें पहचान लेंगे। लेकिन प्रमोद सावंत खुद ही अपने विरोधी हैं। वह हमेशा लो-प्रोफाइल रहते हैं और भीड़ में उन्हें तलाश पाना खासा मुश्किल होता है। इसके बावजूद उनमें कुछ स्पष्ट नजर आने वाली खासियत हैं जिनके चलते मनोहर पर्रिकर ने उन्हें पहचाना और भावी चुनौतियों के लिए तैयार किया।'

 
गोवा के ग्रामीण इलाके बिचोलिम से ताल्लुक रखने वाले सावंत कभी भी मंत्री नहीं रहे  और केवल 11 साल पहले ही सक्रिय राजनीति में आए थे। राजनीति में उनका उत्थान काफी जल्दी हुआ। दूसरी बार विधायक बने सावंत को देश का सबसे कम उम्र का विधानसभा अध्यक्ष बनने का भी मौका मिला। गोवा में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक वरिष्ठ नेता का मानना है कि पर्रिकर ने सावंत को इसलिए आगे बढ़ाया कि वह उनके भीतर अपनी छवि भी देखते थे। सावंत एक सहज इंसान हैं और उनकी ख्वाहिशें एवं जरूरतें भी काफी सरल हैं। फिश करी और चावल उनका पसंदीदा भोजन है और बिना किसी बहस में उलझे हुए चुपचाप काम करना उनका शगल है। लेकिन गोवा में आरएसएस और भाजपा के साझा परिवार का हरेक सदस्य इस बात पर सहमत है कि सावंत को बहुत बड़ी खाई भरनी है। पर्रिकर के भीतर नेतृत्व का एक बेहतरीन गुण था। उन्हें बखूबी पता था कि उन्हें राज्य की 38 फीसदी ईसाई अल्पसंख्यक आबादी को भी साथ लेकर चलना है। वह ऐसा केवल राजनीतिक कारणों से नहीं बल्कि इसलिए भी करते थे कि ऐसा करना ही सही है। सावंत भी पर्रिकर की तरह संघ की पृष्ठभूमि से ही आते हैं। उन्होंने पर्रिकर के ही कहने पर भाजपा का दामन थामा था लेकिन उन्हें हमेशा इस बात का ध्यान रहा है कि राष्ट्रवाद या गोमांस को मुद्दा नहीं बनाया जा सकता है क्योंकि ऐसा होने पर कांग्रेस दूसरे विरोधियों के साथ मिलकर सरकार को गिरा देगी।
 
जहां तक सावंत सरकार का सवाल है तो उसके विरोधियों की कमी नहीं है। पर्रिकर के अंतिम संस्कार के कुछ घंटों के भीतर ही सावंत ने रात के 2 बजे मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। इसकी वजह यह है कि मार्च 2017 में हुए पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 17 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी थी जबकि भाजपा 13 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही थी। इसके बावजूद भाजपा अपनी सरकार बना पाने में सफल रही तो उसके लिए कांग्रेस की सुस्ती और नितिन गडकरी एवं पर्रिकर की दूसरों को मनाने की खासियत का भी योगदान रहा था। लेकिन भाजपा के दो विधायकों (पर्रिकर और उससे पहले फ्रांसिस डिसूजा) के निधन के बाद विधानसभा का प्रभावी संख्या बल 36 ही रह गया है। इस स्थिति में भी सहयोगी दल अपनी मांगें मनवाने के लिए कोई कसर नहीं छोडऩे वाले हैं। महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (एमजीपी) के रामकृष्ण सुदीन धवलीकर इनमें सबसे आगे रहने वाले हैं। उन्हें जब अहसास हो गया कि वह अगले मुख्यमंत्री नहीं बनने जा रहे हैं तो उन्होंने पर्रिकर के अंतिम संस्कार में भी शिरकत करना मुनासिब नहीं समझा। गोवा फॉरवर्ड पार्टी (जीएफपी) के संरक्षक विजय सरदेसाई ने भी ऐसी ही बातें कही हैं। लेकिन इन दोनों में से किसी को भी मनचाहा पद नहीं मिला। दरअसल भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने उन्हें साफ शब्दों में यह बता दिया था कि नई सरकार के मुखिया सावंत ही होंगे और अगर यह बात सरदेसाई एवं धवलीकर को मंजूर नहीं है तो वे फिर नए चुनावों का सामना करने को तैयार हो जाएं। कोई चारा न देख दोनों सहयोगी नेता सावंत को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार हो गए लेकिन उन्होंने दोनों को उप मुख्यमंत्री बनाने की शर्त रख दी। इस तरह गोवा की मंत्रिपरिषद में 12 लोग होंगे और उनमें से दो उप मुख्यमंत्री ही होंगे।
 
यह दिलचस्प खेल तो अभी शुरू ही हुआ है। अब सावंत को न केवल अपने सहयोगी मंत्रियों पर नजर रखनी होगी बल्कि उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि गोवा अपनी परंपरागत पहचान पर कोई समझौता किए बगैर ढांचागत एवं औद्योगिक विकास की राह पर आगे बढ़ता रहे। ऐसा होना निहायत ही जरूरी है। वर्ष 2008 में गोवा ने भूमि अधिग्रहण के खिलाफ जनाक्रोश होने के बाद जारी केंद्रीय अधिसूचना को देखते हुए विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) बनाने के आठ प्रस्तावों को निरस्त कर दिया था। एसईजेड के विरोधियों का कहना था कि रोजगार की तलाश में आने वाले बाहरी लोगों की गोवा में संख्या काफी बढ़ जाएगी। यह मामला अपने आप में बेहद खास था। इतिहास में पहली बार किसी जातीय पहचान के मसले के चलते कोई औद्योगिक नीति पलटी गई थी। लेकिन यह भी सच है कि गोवा को ढांचागत एवं औद्योगीकरण की सख्त जरूरत है। लेकिन सरकार को यह काम गोवा की पहचान को बनाए रखते हुए और अपनी शर्तों पर अंजाम देना होगा। 
 
सावंत विधानसभा के अध्यक्ष रहे हैं और गोवा अधोसंरचना विकास प्राधिकरण के चेयरमैन भी रह चुके हैं। उसके पहले वह आयुर्वेद चिकित्सक के तौर पर भी सेवाएं देते रहे हैं। लेकिन अब उन्हें एक गठबंधन सरकार चलानी है और खनन एवं कैसिनो जैसे अवरोधों को पार करते हुए गोवा के विकास की इबारत लिखनी है। इसके साथ ही सरकार के भीतर और बाहर चुनौती देने वाले लोगों को भी काबू में रखना होगा। पर्रिकर को करीब से देखने वाले आरएसएस कार्यकर्ताओं का कहना है कि पर्रिकर के बीमार पडऩे के बाद से अफसरशाही ने अपने तरीके से शासन शुरू कर दिया था। वे कहते हैं, 'अफसरशाही ऐसा घोड़ा है जिसकी लगाम अगर ठीक से नहीं थामी जाए तो वह बेलगाम हो सकता है। ऐसे में सावंत के सामने बड़ी चुनौती राजनीतिक न होकर प्रशासनिक है। सवाल है कि क्या वह अफसरशाही पर काबू पाएंगे और गोवावासियों की प्रमुखता को स्थापित कर पाएंगे?' 
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