बिजनेस स्टैंडर्ड - मुद्रास्फीति के नए अनुमान से बेहतर होगी बुनियाद
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मुद्रास्फीति के नए अनुमान से बेहतर होगी बुनियाद

अजय शाह /  March 22, 2019

अगर हम कम मुद्रास्फीति के नए माहौल को आधार मानकर विश्लेषण करेंगे तो कारोबारी जगत को अपनी बुनियाद बेहतर करने का अवसर मिलेगा। विस्तार से बता रहे हैं अजय शाह 

 
वर्ष 2015 के बाद से भारतीय रिजर्व बैंक सालाना आधार पर 4 फीसदी की खुदरा महंगाई दर को लेकर प्रतिबद्ध है। मुद्रास्फीति को लक्षित करने से संबंधित तमाम तर्क इस बात पर जोर देते हैं कि कितनी कम और अनुमान लायक मुद्रास्फीति दर वृहद अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने का काम कर सकती है। मुद्रास्फीति की 4 फीसदी की स्थिर दर का अनुमान भविष्य को लेकर हमारी योजनाओं में कई तरह के बदलाव लाता है। इस आलेख में हम वेतन भत्तों में वृद्धि, उधारी, सार्वजनिक वित्त, रुपये के अवमूल्यन, कॉर्पोरेट निवेश और फंड प्रबंधन आदि को लेकर चर्चा करेंगे।
 
कम मुद्रास्फीति का नया दौर: मुद्रास्फीति का लंबा संकट फरवरी 2006 में शुरू हुआ। नीतिगत समुदाय का मानना था कि मौद्रिक नीति में संस्थागत सुधार की आवश्यकता है। इसके बाद ही 20 फरवरी, 2016 को मॉनिटरी पॉलिसी फ्रेमवर्क एग्रीमेंट (एमपीएफए) पर हस्ताक्षर किए गए। आरबीआई मुद्रास्फीति के पारदर्शी और एकल 4 फीसदी के लक्ष्य को पूरा करने के लिए स्वयं में बदलाव ला रहा है। फिलहाल ऐसा लग रहा है कि आरबीआई 20 फरवरी, 2020 तक मुद्रास्फीति की दर को 4 फीसदी तक रखने में कामयाब रहेगी। इस प्रकार वृहद अािर्थक स्थिरता का पूरा पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा होगा। एमपीएफए के गठन के पहले भविष्य की मुद्रास्फीति के लिए 8 फीसदी की दर मान्य थी। अब हम 4 फीसदी की स्थिर मुद्रास्फीति दर की बात कर रहे हैं। इस बात का निजी और सार्वजनिक नीतियों की निर्णय प्रक्रिया के तमाम क्षेत्रों पर गहरा प्रभाव पड़ेगा।
 
वेतन भत्तों की वृद्धि पर असर: वेतन-भत्तों में इजाफे को लेकर बुनियादी कायदा ही बदल जाता है। पहले वेतन वृद्धि 10 फीसदी के इर्दगिर्द होती थी। यही आधारभूत कायदा था। यह 2 फीसदी वास्तविक वृद्धि थी और कुछ कर्मचारियों को 10 फीसदी से भी अधिक बढ़ोतरी मिलती थी। अब हमें खुद को 5 फीसदी वेतन वृद्धि के लिए तैयार करना होगा। मुद्रास्फीति के हिसाब से 5 फीसदी की वृद्धि होगी और कुछ कर्मचारियों को 5 फीसदी से अधिक वृद्धि हासिल होगी। जब कुछ समय के लिए मुद्रास्फीति कम होती है तो अर्थव्यवस्था उसे लेकर पुराने अनुमानों के मुताबिक काम करती है। हाल के वर्षों में शायद कंपनियों द्वारा रोजगार देने की गति हाल के कुछ वर्षों की तुलना में कम हुई है क्योंकि उनके राजस्व यानी कुल वृद्धि की तुलना में उनके वेतन भत्ते काफी तेजी से बढ़े हैं। एक बार जब कंपनियां कम वेतन वृद्धि के साथ सामंजस्य स्थापित कर लेंगी तो श्रम बाजार का माहौल कहीं अधिक सहज होगा। 
 
ऋण पर प्रभाव: मुद्रास्फीति की कम दर ऋण के बारे में हमारी सोच में भी बदलाव लाती है। उच्च असमायोजित (नॉमिनल) वृद्धि में एक तरीका पुराने ऋण को समाप्त करने का भी होता है। हमारे देश में हम हर वर्ष बैलेंस शीट में 15 फीसदी की वृद्धि के अनुमान के आदी हो चले हैं। इसमें 4.6 वर्ष में दोगुनी वृद्धि होती है। यानी ऐसा ऋण जो आज परेशानी भरा नजर आता है, 4.6 वर्ष में उससे जुड़ी चिंता आधी हो जाती है। दोनों पक्षों को केवल शुरुआती 4.6 वर्ष के लिए जूझना होता है। यह बैंकों और बैंकिंग नियमन को लेकर काफी महत्त्वपूर्ण था। बैंक फंसे हुए कर्ज को इकठ्ठा करने और उन्हें बढ़ते देने के आदी थे। उदाहरण के लिए बैंकों द्वारा कर्ज दिए जाने वाले हर 100 रुपये में से 20 रुपये फंस जाते थे। अंकेक्षण और नियामकीय उपायों का इस्तेमाल करके बुरी खबर को टाला जाता है ताकि फंसे हुए कर्ज का सामना 4.6 वर्ष बाद किया जा सके। इस मोड़ पर 20 में से 5 रुपये की वसूली होती और 15 रुपये का नुकसान हो जाता। कुल 200 में 15 के नुकसान को बचाव के काबिल ठहराया जा सकता है।
 
बैलेंस शीट में तेज वृद्धि का पुराना माहौल बदल चुका है। कम मुद्रास्फीति वाले माहौल में जब बैलेंस शीट वृद्धि सालाना 11 फीसदी तक गिर जाती है तो यह हर 6.3 वर्ष में दोगुनी होती है। इसके अलावा बुरी खबर को छिपाने का पुराना तरीका भी हर स्तर पर कमजोर पड़ चुका है। डीएफएस, आरबीआई, बॉन्ड बाजार और कॉर्पोरेट बोर्ड हर जगह ऐसा हुआ है। इन दोनों कारकों ने डेट बाजार के व्यवहार में अहम बदलाव उत्पन्न किया। ऋण की प्रक्रिया को और अधिक विश्लेषणपरक बनाना होगा।
 
सार्वजनिक वित्त पर प्रभाव: बजट प्रक्रिया को आगे ले जाने वाला प्रमुख कारक भविष्य की नॉमिनल वृद्धि दर को लेकर जताया गया अनुमान है। पारंपरिक तौर पर 6 फीसदी वृद्धि और 8 फीसदी की उच्च मुद्रास्फीति के साथ 14 फीसदी नॉमिनल वृद्धि हासिल होती थी। परंतु अब हमें अधिक सतर्क रहना होगा क्योंकि 6 फीसदी और 4 फीसदी की ब्याज दर के साथ 10 फीसदी की नॉमिनल वृद्धि दर हासिल होती है। रुपये के अवमूल्यन पर प्रभाव: जब देश की मुद्रास्फीति 8 फीसदी और दुनिया की 2 फीसदी थी, तब रुपये पर हर वर्ष 4 फीसदी अवमूल्यन का निरंतर दबाव था। अब मुद्रास्फीति के 4 फीसदी के लक्ष्य के साथ यह दबाव समाप्त हो चुका है। विनिमय दर में अवश्य अस्थिरता आएगी। जब उभरते बाजार विनिमय दर को संचालित करते हैं तो 12 फीसदी तक अस्थिरता आती है। जब हम पूरी तरह आधुनिक मौद्रिक नीति क्षमता हासिल कर लेंगे तब यह अस्थिरता भी अधिक होगी। परंतु रुपये में गिरावट का कोई व्यवस्थित रुझान नहीं होगा।
 
प्रतिफल की दर पर प्रभाव: देश में प्रतिफल की दरों का अनुमान बहुत अधिक रहता है। हम सन 1979 से 1990 तक के बीएसई सेंसेक्स और सन 1990 के बाद के निफ्टी के प्रदर्शन पर गौर करने का रुख रखते हैं। इससे प्रतिफल को लेकर बहुत सकारात्मक भावना तैयार होती है। इन अनुमानों को बदलना होगा क्योंकि मुद्रास्फीति में 4 फीसदी तक की कमी आई है और देश में आर्थिक उदारीकरण के वक्त सूचकांकों में एकबारगी तेजी आई थी। अगर आप यह मानते रहे हैं कि लंबी अवधि में निफ्टी का प्रतिफल औसतन 16 फीसदी रहेगा। कम मुद्रास्फीति में इस अनुमान को घटाकर 12 फीसदी करना होगा। 4 फीसदी मुद्रास्फीति के अनुमान के साथ अल्पावधि की जोखिम रहित दर औसतन 6 फीसदी रह सकती है। शेयर प्रीमियम 5 से 6 फीसदी हो सकता है। कॉर्पोरेट वित्त, निजी इक्विटी फंड के ढांचे आदि पर इसका असर होता है। अगर हम वित्तीय अनुमानों को नए सिरे से आंकें तो कारोबार खड़ा करने की प्रक्रिया की बुनियाद बेहतर होगी। जब मुद्रास्फीति कुछ समय के लिए कम होती है तो अर्थव्यवस्था पुराने अनुमानों से ही संचालित होती है। शायद कंपनियों का निवेश हाल के वर्षों में सामान्य से कम रहा हो क्योंकि व्यवहार्य परियोजनाएं ही नजर नहीं आ रही थीं। प्रतिफल की दरों के समायोजन के बाद शायद हमें निवेश के क्षेत्र में कहीं अधिक सामान्य हालात नजर आएं।
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