बिजनेस स्टैंडर्ड - क्षमता की कीमत!
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क्षमता की कीमत!

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  March 22, 2019

निवेश की मांग में लगातार कमी ने आर्थिक वृद्घि पर बुरा असर डाला है। क्या कुछ हद तक इसका जवाब विफलता के बजाय सफलता से मिल सकता है? मिसाल के तौर पर भारी ट्रकों की मांग हाल के महीनों में 22 फीसदी गिरी है। इसकी मुख्य वजह गत जुलाई में घोषित नए नियम हो सकते हैं जिनके तहत ट्रकों को अतिरिक्त भार वहन करने की सुविधा दी गई। ऐसा शायद इसलिए किया गया क्योंकि राजमार्गों की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। वही ट्रक अब अधिक माल ढो सकते हैं इसलिए नए ट्रकों की मांग में कमी आई है। इस बीच विनिर्माता अपने वाहनों को नए एक्सल लोड के स्तर के मुताबिक परिवर्तित करने में लगे हुए हैं। 

 
इसी तरह डीजल जनरेटर (डीजी) सेट की बात करें तो उनकी तादाद आज एक दशक पहले की तुलना में कम हो चुकी है। इनकी मांग 2010-11 से 2015-16 के बीच 40 फीसदी गिर गई थी लेकिन उसके बाद इसमें थोड़ा सुधार हुआ। इसकी मुख्य वजह यह है कि दूरसंचार टावरों की संख्या में परिपूर्णता आ गई। नए टावर नहीं लगने के कारण इन टावरों में विद्युत आपूर्ति के लिए प्रयोग किए जाने वाले डीजी सेट की मांग 70 फीसदी तक गिर गई। उसके बाद मांग बढ़ी क्योंकि कुछ अन्य क्षेत्रों में इसकी जरूरत थी। परंतु देश के अधिकांश हिस्सों में बिजली की कमी न होने के कारण 90 फीसदी मामलों में डीजी सेट का इस्तेमाल वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में हो रहा है। अगर बिजली की आपूर्ति भविष्य में और बेहतर हुई तो डीजी सेट की मांग में और अधिक कमी आएगी। 
 
देश में बिजली उत्पादन की क्षमता में पर्याप्त से अधिक सुधार से भी इसे समझा जा सकता है। नवीकरणीय ऊर्जा के अलावा पारंपरिक माध्यम से विद्युत उत्पादन क्षमता में कोई इजाफा नहीं हो रहा है। आंकड़े चौंकाने वाले हैं: वर्ष 2017-18 में 17.8 गीगावॉट की नई बिजली उत्पादन क्षमता तैयार हुई। दो वर्ष बाद यह बढ़कर 23.9 गीगावॉट हो गई। चालू वर्ष के शुरुआती 11 महीनों में यह 2.3 गीगावॉट है, यानी पुरानी क्षमता का बमुश्किल 10 फीसदी। वास्तविक उत्पादन नहीं बढऩे के बावजूद स्थगित क्षमता के रूप में गुंजाइश है। बिजली क्षेत्र के अन्य हिस्सों में भी बिजली पारेषण और ट्रांसफॉर्मर क्षमता पहले अपने उच्चतम स्तर पर पहुंची और उसके बाद इसमें गिरावट आई। हालांकि यह सब उतने नाटकीय अंदाज में नहीं हुआ जितना कि उत्पादन क्षमता में। 
 
रेलवे जैसे कई अन्य क्षेत्र भी हैं जहां ऐसे रुझान साफ नजर आ रहे हैं। नई रेल क्षमताओं में और सुविधाओं का विस्तार करने में बहुत बड़ी मात्रा में निवेश किया गया है लेकिन इसके बावजूद माल और यात्री वहन के मामले में रेलवे ने कोई खास वृद्घि नहीं दर्ज की है। ऐसे में शुद्घ रूप से प्रति किलोमीटर प्रति टन माल ढुलाई बीते पांच साल में बमुश्किल 3.6 फीसदी की दर से बढ़ी है। जबकि 2016-17 तक के तीन वर्षों में प्रति किलोमीटर यात्रियों की तादाद में वृद्घि बमुश्किल एक प्रतिशत रही। राजस्व के मोर्चे पर प्रदर्शन जरूर बेहतर रहा क्योंकि शुल्क दरों में इजाफा किया गया है, लेकिन उसके लिए बहुत बड़े निवेश की जरूरत नहीं है। संभव है कि दो रैपिड फ्रेट कॉरिडोर का काम पूरा होने के बाद ट्रैफिक में इजाफा हो और मौजूदा मार्गों पर गति में इजाफा होगा। उस वक्त रेलवे में भी पहले निवेश में इजाफा होगा और फिर मंदी आएगी। यह लगभग उस वक्त होगा जब ट्रैफिक में इजाफा होगा।
 
अंतिम उदाहरण दूरसंचार क्षेत्र का है जहां रिलायंस एवं अन्य कंपनियों ने हाल के वर्षों में बुनियादी ढांचे में जबरदस्त निवेश किया। रिलायंस के अलावा सभी दूरसंचार कंपनियां भारी कर्ज में डूबी हैं और वे पहले की तरह निवेश नहीं कर सकतीं। रिलायंस द्वारा शुल्क दरों में भारी कमी किए जाने के कारण मोबाइल फोन के डेटा ट्रैफिक में भारी इजाफा हुआ है लेकिन दरें इतनी कम हैं कि यह भी निश्चित नहीं है कि राष्टï्रीय लेखा में इसका आकलन कैसे होगा। सार यह है कि प्रमुख बुनियादी क्षेत्रों में, बेहतर क्षमताओं और कम पहुंच वाले बाजारों में संपूर्णता की स्थिति ने पूंजीगत निवेश में उसी पैमाने पर कमी हुई जैसी कि पहले। इसका कुछ प्रभाव तो आर्थिक मंदी के रूप में दर्ज किया जाएगा। उबर और ओला भी कारों की मांग में कमी के लिए आंशिक जिम्मेदार हो सकती हैं। विमानन क्षेत्र में अगर दो विमानों के उड़ान भरने और उतरने के बीच के अंतर को आधा कर दिया जाए तो हवाई पट्टïी की क्षमता दोगुनी हो सकती है। ये सारे उदाहरण उत्पादकता में सुधार के हैं जिन्हें सकल घरेलू उत्पाद का आकलन करते समय ध्यान में रखा जाना चाहिए। परंतु क्या वाकई ऐसा होगा?
Keyword: IIP, WPI, economy, telecom, power,,
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