बिजनेस स्टैंडर्ड - रिजर्व बैंक के नए गवर्नर का समझदारी वाला कदम
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रिजर्व बैंक के नए गवर्नर का समझदारी वाला कदम

तमाल बंद्योपाध्याय /  March 20, 2019

5 अरब डॉलर का स्वैप केंद्रीय बैंक के नकदी प्रबंधन उपायों का एक स्थायी हिस्सा हो सकता है, लेकिन इसके इस्तेमाल की आवृत्ति डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल पर निर्भर करेगी। बता रहे हैं तमाल बंद्योपाध्याय

 
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने तीन साल के अमेरिकी डॉलर एवं भारतीय रुपये की खरीद/बिक्री से जुड़ा स्वैप ऑक्शन 26 मार्च को आयोजित करने का निर्णय लिया है। केंद्रीय बैंक के इस निर्णय से फॉरवर्ड प्रीमियम (ऐसी स्थिति जिसमें किसी मुद्रा की भविष्य में अनुमानित कीमत हाजिर भाव से अधिक होती है) नीचे जा रहा है, जिससे कंपनियों को विदेशी में ली गई उनकी उधारी पर हेजिंग खर्च कम करने में मदद मिल रही है। हाल में आरबीआई ने वित्तीय प्रणाली में नकदी डालने के लिए कई अनूठे उपाय किए हैं और 'करेंसी स्वैप' इन्हीं में एक है। वैसे आरबीआई पहले भी इस रास्ते नकदी मुहैया करा चुका है, लेकिन ऐसा उन मुश्किल परिस्थितियों में किया गया था जब स्थानीय मुद्रा पर दबाव खासा बढ़ गया था। 
 
करेंसी स्वैप से आरबीआई के मुद्रा प्रबंधन से जुड़े उपायों में विविधता आती है। परंपरागत तौर पर नकद आरक्षित अनुपात (केंद्रीय बैंक के पास बैंकों द्वारा रखी जाने वाली नकदी, जिस पर बैंकों को कोई ब्याज भी नहीं मिलता है) में कटौती लंबे समय तक नकदी बहाल करने का एक परंपरागत साधन रहा है। इन दिनों केंद्रीय बैंक खुला बाजार परिचालन (ओपन मार्केट ऑपरेशन) के जरिये नकदी प्रवाहित करने को अधिक तरजीह देता रहा है। ओएमओ के जरिये आरबीआई बैंकों से बॉन्ड खरीदता है और इसके एवज में रकम निर्गत करता है। 
 
करेंसी स्वैप नीलामी के तहत आरबीआई बैंकों से डॉलर खरीदेगा और इसके समतुल्य रकम जारी करेगा। इस कवायद के तहत तीन साल के लिए वित्तीय प्रणाली में 35,000 करोड़ रुपये नकदी आएगी, जिसके बाद बैंक आरबीआई से दोबारा डॉलर खरीदेंगे। इस अवधि में रुपये में संभावित गिरावट से निपटने के लिए बैंक नीलामी के समय तय होने वाले स्वैप खर्च का भुगतान करेंगे। स्थानीय मुद्रा में गिरावट अधिक आई तो बैंक की देनदारी निश्चित होगी और आरबीआई पर भी विनिमय जोखिम का दबाव नहीं होगा, क्योंकि इसके पास खासी मात्रा में डॉलर हैं। केंद्रीय बैंक को तीन साल बाद बाजार से डॉलर खरीदने की कोई जरूरत नहीं होगी।
 
वर्ष 2013 में जब रुपया डॉलर के मुकाबले तेजी से गिर रहा था उस समय भारत के सामने सबसे विकट चालू खाते का घाटा मुंह बाए खड़ा था। उस समय बैंकिंग प्रणाली ने फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट बैंक अकाउंट (एफसीएनआर-बी) के जरिये 26 अरब डॉलर रकम जुटाई थी, जिससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी हुई। ऐसी रकम जुटाने (और इनके बदले रुपये लेने) के लिए आरबीआई ने भी बैंकों को खासा प्रोत्साहित किया। इसके लिए केंद्रीय बैंक ने बैंकों को तत्कालीन डॉलर/रुपये की स्वैप रेट पर काफी छूट मुहैया कराई। ये जमा रकम नवंबर 2017 में परिपक्व हुई थी। 
 
नीलामी में अंतिम स्वैप रेट जानने के लिए हमें 26 मार्च तक इंतजार करना होगा। चूंकि, स्थानीय मुद्रा अच्छा प्रदर्शन कर रही है और विदेशी मुद्रा भंडार जमा करने की भी कोई जल्दबाजी नहीं है, इसलिए आरबीआई शायद ही इस बार बैंकों को छूट की पेशकश करेगा। 2013 में परिस्थितियां प्रतिकूल थीं और देश को विदेशी मुद्रा भंडार की जरूरत थी, इस वजह से इसने स्वैप लागत में कमी की थी। मौजूदा वित्त वर्ष में आरबीआई ने अब तक ओएमओ से 3 लाख करोड़ रुपये रकम डाली है। आखिर इसने यह नया उपाय क्यों चुना है और इसके क्या फायदे हैं? आरबीआई लागातार बॉन्ड खरीदकर नकदी का प्रवाह बनाए रख रहा है, लेकिन देश में आम चुनाव के कारण वित्तीय प्रणाली में अधिक से अधिक नकदी आएगी और उसी गति से इससे बाहर निकलेगी। इसके अलावा कंपनियां भी मार्च तिमाही के लिए अग्रिम कर का भुगतान कर रही हैं। जनवरी में मुद्रा प्रसार 19.87 लाख करोड़ रुपये था, जो एक साल पहले के 16.6 लाख करोड़ रुपये से अधिक है। बैंकिंग प्रणाली में साख-जमा अनुपात (क्र्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो) कई महीनों से करीब 78 प्रतिशत रहा है। यह अधिक है, लेकिन इससे भी अधिक इन्क्रीमेंट क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो है, जो पिछले कुछ समय से 100 प्रतिशत से अधिक रहा है। 
 
प्रत्येक 100 रुपये जमा के लिए बैंकों को सरकारी बॉन्ड में 19.5 रुपये निवेश करना है और 4 रुपये सीआरआर के रूप में आरबीआई के पास रखना है। चूंकि, जमा रकम उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही है, इसलिए बैंक अपनी पूरी नई जमा रकम और पूंजी उधार देने में इस्तेमाल कर रहे हैं। यह सिलसिला लगातार चला तो आरबीआई द्वारा दरों में कटौती के बाद भी रकम पर आई लागत नीचे नहीं आ सकती है। इस नए प्रयोग के लिए मौजूदा समय उचित है, क्योंकि हाल में ही चलन में आए वॉलंटरी रिटेंशन रूट (वीआरआर) के जरिये विदेशी मुद्रा प्रवाह शुरू हो गया है। आरबीआई ने अक्टूबर 2018 में भारतीय बॉन्ड बाजार में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश को बढ़ावा देने के लिए इस योजना की घोषणा की थी, लेकिन इसे मार्च के शुरू में अंतिम रूप दिया गया और अब यह बड़े पैमाने पर नकदी आकर्षित कर रहा है। इसके अलावा राष्टï्रीय कंपनी कानून अपील न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) कर्ज से लदी एस्सार स्टील के लिए आर्सेलरमित्तल की 42,000 करोड़ रुपये बोली को हरी झंडी दे चुका है, जिससे 6 अरब डॉलर का प्रवाह और बढ़ेगा। इससे आरबीआई का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर 402 अरब डॉलर हो जाएगा। इस नए उपाय से वित्तीय प्रणाली में नकदी तो बढ़ेगी ही, साथ ही विदेश में रकम जुटाने वाली भारतीय कंपनियों के हेजिंग खर्च में भी कमी आएगी। 
 
दूसरे शब्दों में कहें तो नकदी सृजन के अलावा इस नई युक्ति से धन के लिए लालायित भारतीय कंपनियों के लिए पूंजी का वैकल्पिक स्रोत भी खुल जाएगा। खासकर इससे उन कंपनियों को लाभ मिलेगा, जो नई परियोजनाओं में निवेश करना चाहते हैं, लेकिन स्थानीय बैंकिंग प्रणाली से उन्हें नकदी नहीं मिल रही है। हालांकि इससे सरकारी बॉन्ड पर प्राप्तियां बढ़ सक ती हैं। आरबीआई द्वारा लगातार बॉन्ड खरीदारी से लंबी अवधि के बॉन्ड पर प्राप्तियां कम रही हैं। आरबीआई विदेशी मुद्रा बाजार में अनिश्चितता पर अंकुश लगाने के लिए जब डॉलर बेचता है तब प्रणाली से नकदी निकल जाती है (प्रत्येक डॉलर की बिक्री से इतनी ही समतुल्य रकम प्रणाली से बाहर हो जाती है)। जब यह ओएमओ के जरिये बॉन्ड खरीदकर नकदी बढ़ाता है तो प्राप्तियां कम हो जाती हैं। ऐसा क्यों होता है? विशुद्ध रूप से यह मांग-आपूर्ति का खेल होता है। जब बॉन्ड की मांग आरबीआई की तरफ से आती है तब कीमतें बढ़ती हैं और प्राप्तियां कम होती हैं। ओएमओ से बैंक को मदद मिलती है, क्योंकि इससे वे गैर-तरल प्रतिभूतियों के लिए कीमत का भुगतान कर इनसे छुटकारा पा लेते हैं और लाभ कमाते हैं। 
 
इस बीच, बैंकों के पास सरकारी बॉन्ड की तादाद कम हुई है और इनमें कई के पास ओएमओ में भाग लेने के लिए पर्याप्त प्रतिभूतियां नहीं हैं। 19.5 प्रतिशत नियामकीय शर्त के मुकाबले बैंक कुल देनदारी का 26 प्रतिशत बॉन्ड में रखते हैं, लेकिन तथाकथित लिक्विडिटी कवरेज अनुपात का पालन करने के लिए उन्हें अधिक सुरक्षा की जरूरत होती है। इससे आरबीआई को बेचने के लिए उनके पास काफी कम रकम बच जाती है। मौजूदा समय में उपलब्ध विकल्पों के मद्देनजर आरबीआई के नकदी प्रबंधन उपायों में यह नया हथियार एक स्थायी जरिया होगा। इसका इस्तेमाल कितनी बार होगा यह रुपये का स्तर तय करेगा। अक्टूबर 2018 के 74.48 के मुकाबले भारतीय रुपया इस समय कहीं मजबूत स्थिति में दिखाई दे रहा है। वास्तविक प्रभावी विनिमय दर पर इसका मूल्यांकन अधिक है, जिससे यह उपाय करने की यह एक आदर्श स्थिति है। मेरी समझ में जब से शक्तिकांत दास ने आरबीआई की कमान संभाली है तब से यह उनका यह एक बेहतरीन कदम है।
 
(लेखक बिजनेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक हैं। वह जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड के वरिष्ठï सलाहकार भी हैं।)  
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