बिजनेस स्टैंडर्ड - जल प्रबंधन का अनूठा चीनी तरीका
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जल प्रबंधन का अनूठा चीनी तरीका

विनायक चटर्जी /  March 19, 2019

चीन का नदी संरक्षण कार्यक्रम भारत में नदियों को प्रदूषण-मुक्त करने के लिए एक मिसाल बन सकता है। हालांकि इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति को जरूरी बता रहे हैं विनायक चटर्जी

 
चीन में जल प्रबंधन को लेकर लंबे समय से यह कहा जाता रहा है कि 'पानी को नौ ड्रैगन संभालते हैं'। यह कोई सराहना न होकर एक उपमा है जिसका मतलब है कि चीन के जल संसाधनों को संभालने में जुटी एजेंसियों के दायित्व एवं जिम्मेदारियां एक-दूसरे का आच्छादन करती हैं। आश्चर्यजनक रूप से यह उपमा भारत के जल प्रबंधन के बारे में भी काफी सही है। दोनों ही देशों में जल प्रबंधन केंद्र एवं राज्यों के स्तर पर मंत्रालयों और जल प्रबंधन एवं जल प्रदूषण से जुड़ी विभिन्न एजेंसियों में बंटा हुआ है।
 
जल प्रबंधन की जटिल एवं अस्पष्ट व्यवस्था होने के अलावा तीव्र विकास और पानी के बेलगाम होते इस्तेमाल का नतीजा यह हुआ है कि चीन के सतही जल का एक-तिहाई हिस्सा पीने के लायक नहीं रह गया है (स्रोत: ग्रीनपीस रिपोर्ट)। इस हालात का मुकाबला करने के लिए चीन ने पिछले साल एक गैर-परंपरागत लेकिन महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम 'रिवर चीफ्स' शुरू किया था। इस कार्यक्रम में एक सरकारी अधिकारी को 'नदी का मुखिया' (रिवर चीफ) नियुक्त किया जाता है जो अपने इलाके में मौजूद जलाशय या नदी के खास हिस्से में पानी की गुणवत्ता संकेतकों का प्रबंधन करता है। उनका प्रदर्शन और भावी करियर इस बात पर निर्भर करता है कि उन्होंने अपने कार्यकाल में जल गुणवत्ता संकेतकों को सुधारने में कितनी कामयाबी हासिल की है। स्थानीय समाचारपत्र चाइना डेली में पिछले साल प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक पूरे चीन में नदियों एवं जलाशयों की गुणवत्ता पर नजर रखने के लिए 4 लाख से अधिक रिवर चीफ नियुक्त किए गए। इनके अलावा ग्रामीण स्तर पर 7.6 लाख और लोगों को नदियों की देखरेख का जिम्मा दिया गया। इस तरह समूचे चीन में नदियों के पानी की हालत सुधारने के काम में 10 लाख से अधिक लोग लगाए गए।
 
चीन में जल संरक्षण के काम में लगे संगठन 'चाइना वाटर रिस्क' के मुताबिक, रिवर चीफ कार्यक्रम का हिस्सा बनने का मतलब है कि 'स्थानीय अधिकारियों को अपने-अपने क्षेत्र में दिखाए गए पर्यावरणीय प्रदर्शन के लिए आजीवन जवाबदेही का सामना करना पड़ेगा'। नदी के जिस हिस्से के लिए उस अधिकारी को नियुक्त किया गया है वहां पर उसके नाम केे साथ संपर्क ब्योरा भी अंकित होता है। अगर स्थानीय लोग किसी व्यक्ति या कंपनी को उस नदी खंड में कूड़ा-करकट डालते हुए देख लेते हैं या वहां पर काई जम रही है तो वे उस अधिकारी को फोन पर इसकी जानकारी देते हैं। नदी के अहम एवं बड़े हिस्से का दायित्व अधिक वरिष्ठ अधिकारी को दिया गया है। इससे अधिकारी तमाम विभागों को एक साथ काम करने के लिए जोड़ सकता है।
 
रिवर चीफ प्रणाली की शुरुआत सबसे पहले वर्ष 2007 में च्यांग्सु प्रांत के स्थानीय अधिकारियों ने की थी। उस समय एक जल-क्षेत्र में फैल रही काई से निजात पाने के लिए एक स्थानीय अधिकारी को दायित्व सौंपा गया था। 'साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट' समाचारपत्र के मुताबिक, जल-क्षेत्र को काई से आजाद कराने के बाद समूचे प्रांत में रिवर चीफ व्यवस्था लागू कर दी गई थी जिससे पानी की गुणवत्ता में खासा सुधार देखा गया था। हालत यह हो गई कि च्यांग्सु में इंसानों के पीने लायक सतही जल का अनुपात 35 फीसदी से बढ़कर 63 फीसदी हो गया।
 
भारत में इस तरह की व्यवस्था क्या कारगर हो पाएगी? हमारी समस्याएं भी काफी हद तक ऐसी ही हैं। पानी में प्रदूषण की अधिकता के अलावा जल प्रबंधन से जुड़े कार्यों का जिम्मा कई संगठनों एवं सरकारी विभागों को सौंपा गया है। भारत में प्रदूषण से निपटने के लिए पहले से ही कानून लागू होने के अलावा केंद्र एवं राज्य दोनों स्तरों पर प्रदूषण मानकों के क्रियान्वयन के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बने हुए हैं। चीन के संदर्भ में खास बात यह है कि प्रदूषण के नियंत्रण से संबंधित तमाम जिम्मेदारियां स्थानीय स्तर के अधिकारी को दे दी गई हैं और विभिन्न सरकारी विभागों को प्रदूषण नियंत्रण से संबंधित आदेश देने की शक्ति भी उसके पास ही होती है। इस तरह स्थानीय निवासियों को सिद्धांत रूप में पता होता है कि हालत न सुधरने पर किसकी गरदन पकडऩी है। पर्यावरण के मोर्चे पर दिखाए गए प्रदर्शन को अधिकारियों के लक्ष्यों एवं आकलन का अहम हिस्सा बनाया गया है जिससे वे इन चुनौतियों से निपटने के लिए गंभीर प्रयास करते हैं। जल गुणवत्ता सुधार के लक्ष्य स्पष्टत: तय किए जाने के साथ उनकी निगरानी भी स्वतंत्र रूप से की जा सकती है।
 
हालांकि चीन में रिवर चीफ कार्यक्रम के वास्तविक नतीजों के बारे में कुछ बता पाना संभव नहीं है क्योंकि वहां पर इसे राष्ट्रीय स्तर पर पिछले साल ही लागू किया गया है। फिर भी पहले से संचालित कुछ इलाकों में पानी की गुणवत्ता में सुधार देखा गया है, लेकिन कई इलाकों में हालात जस-के-तस बने हुए हैं या फिर बदतर भी हुआ है। अगर नदी में प्रदूषक कचरा गिराने वाले कारखानों पर जुर्माना लगाने की शक्ति रिवर चीफ के पास नहीं है तो फिर उसे पानी के गुणवत्ता स्तर में सुधार का लक्ष्य देने का कोई मतलब नहीं है। 
 
भारत में राज्यों के स्तर पर गठित प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास तो जुर्माना लगाने की शक्ति पहले से ही है। दरअसल राज्यों में शीर्ष स्तर पर राजनीतिक इच्छाशक्ति होना ज्यादा जरूरी है। आखिर किसी भी योजना के जमीनी क्रियान्वयन में राज्यों की भूमिका अहम होती है। राजनीतिक संपर्क रखने वाले किसी कारखाना मालिक को प्रदूषण मानकों का उल्लंघन करने पर जुर्माना भरने के लिए तभी मजबूर किया जा सकता है जब राज्य सरकार ऐसा करना चाहे, भले ही भारत में इस तरह का कार्यक्रम लागू हो या नहीं।
 
लेकिन रिवर चीफ कार्यक्रम से जुड़े व्यापक सबक तो मौजूं हैं। प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों पर जुर्माना लगाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति सुनिश्चित करने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि स्थानीय समुदायों को इसका जिम्मा दिया जाए और उन्हें पर्यावरण प्रबंधन का प्रभारी बना दिया जाए। लंबे समय से भारत की पर्यावरण नीति टॉप-डाउन परिप्रेक्ष्य से संचालित होती रही है लेकिन उसके नतीजे मिश्रित ही रहे हैं। इसकी जगह बॉटम-अप परिप्रेक्ष्य अपनाने की जरूरत है जिसमें जरूरी सुधारों की पहल सर्वाधिक प्रभावित लोग ही करें। चीन में लागू हुआ रिवर चीफ कार्यक्रम इसी नजरिये की उपज है। 
 
(लेखक ढांचागत सलाहकार फर्म फीडबैक इन्फ्रा के चेयरमैन हैं)
Keyword: water, crisis, india, management,,
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