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आखिरकार, लोकपाल

संपादकीय /  March 19, 2019

संसद में पहली बार प्रस्ताव लाए जाने के 56 साल और लोकपाल कानून बनने के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के 5 साल बाद जाकर देश को पहला लोकपाल मिलने जा रहा है। राजग सरकार ने देश के पहले लोकपाल की नियुक्ति प्रक्रिया पूरी कर ली है। उच्च पदों पर भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष में इस कदम को मील का पत्थर माना जाना चाहिए। लेकिन वर्ष 2014 के चुनाव में भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम का वादा कर सत्ता में आने वाली सरकार के कार्यकाल के एकदम अंत में लोकपाल की नियुक्ति होना काफी अजीब है। इस विलंब का यह कारण बताया जाता रहा कि लोकपाल चयन समिति में विपक्ष के एक सदस्य की भी उपस्थिति अनिवार्य है लेकिन इसके लिए जरूरी 10 फीसदी सीटें किसी भी विपक्षी दल को नहीं मिली थीं। हालांकि सरकार सीबीआई अधिनियम को भी नजीर के तौर पर देख सकती थी जिसमें जांच एजेंसी के प्रमुख का चयन करने वाली समिति में बड़े विपक्षी दल के नेता को आमंत्रित करने का प्रावधान है। सबसे बड़े विपक्षी दल कांग्रेस के नेता को लोकपाल चयन समिति की बैठक में विशेष आमंत्रित सदस्य के तौर पर बुलाने से गतिरोध दूर नहीं हुआ क्योंकि उसे निर्णय-निर्माण में कोई शक्ति नहीं दी गई थी। शायद इसीलिए कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े ने बैठक से बाहर रहना ही ठीक समझा। यह फैसला नई सरकार के आते ही कई समस्याएं पैदा कर सकता है।

 
बहरहाल लोकपाल के रूप में न्यायमूर्ति पी सी घोष का चयन एक निरपवाद पसंद है। उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश रहते समय न्यायमूर्ति घोष ने सभी दलों के नेताओं से संबंधित मामलों में निष्पक्ष निर्णय सुनाए थे। न्यायमूर्ति घोष उस पीठ में शामिल थे जिसने जयललिता और उनकी सहयोगी शशिकला को सार्वजनिक पद का दुरुपयोग कर धन जमा करने का दोषी ठहराया था। वह उस पीठ में भी शामिल थे जिसने बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में भाजपा के कई दिग्गज नेताओं के खिलाफ आरोप तय करने का निर्देश दिया था। 
 
हालांकि लोकपाल से संबंधित दो अहम मुद्दे सामने आ रहे हैं। पहला, नियुक्त करने वाले सदस्य भी उसी तरह नियुक्त किए जाएंगे जिस प्रक्रिया के तहत लोकपाल नियुक्त किया जाएगा। कानून में अधिकतम 8 सदस्य नियुक्त करने का प्रावधान है जिनमें से आधे सदस्य न्यायिक पृष्ठभूमि से होने चाहिए। बाकी सदस्य अनूसूचित जाति-जनजाति, अन्य पिछड़ी जाति, अल्पसंख्यक और महिला वर्ग से होने चाहिए। अगर ये शर्तें चुनौतीपूर्ण हैं तो इससे मुश्किल और बढ़ जाती है कि इन सदस्यों के बारे में सुझाव देने वाली समिति के लिए भी समान नियम-शर्तें लागू होंगी। ऐसे पदों की विवादास्पद प्रकृति और लोकसभा चुनावों से उथल-पुथल की आशंका के चलते इसकी संभावना कम ही है कि लोकपाल फिलहाल काम शुरू कर पाएगा। दूसरी चुनौती संस्थागत स्वतंत्रता से जुड़ी हुई है। शीर्ष अदालत से लेकर चुनाव आयोग तक सबके लिए मौजूदा सरकार समेत ज्यादातर सरकारों का नजरिया बहुत आदर वाला नहीं रहा है। सीबीआई को पहले ही 'पिंजरे में कैद तोता' कहा जाता रहा है।
 
लोकपाल और इसके सदस्यों का नैतिक प्राधिकार सबसे अधिक मायने रखता है। मसलन, लोकपाल कानून में प्रधानमंत्री सहित सहित अधिकतर सरकारी अधिकारी शामिल हैं। लेकिन इस कानून में प्रधानमंत्री के उन कार्यों को जांच के दायरे में न रखना भी विवाद का विषय है जो अंतरराष्ट्रीय संबंध, बाहरी एवं आंतरिक सुरक्षा, लोक व्यवस्था, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष से जुड़े हों। इनकी व्याख्या व्यापक या सीमित हो सकती है और यह पूरी तरह से लोकपाल की इच्छा पर निर्भर करेगा। वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की बढ़ती भागीदारी को देखते हुए लोकपाल को एक उच्च मानक स्थापित करना चाहिए और राजनीतिक दबाव से स्वतंत्र रहते हुए एक ऐसे संस्थान के तौर पर अपनी पहचान स्थापित करनी होगी जो सबके सम्मान का विषय हो।
Keyword: parliament, election, ECI, BJP, congress, lokpal,,
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