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चंद्रशेखर होंगे वाराणसी में मोदी के खिलाफ विपक्ष का साझा चेहरा!

आदिति फडणीस /  March 18, 2019

क्या वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ चंद्रशेखर आजाद (रावण, उन्होंने अपना यह नाम खुद से घोषित किया है) हो सकते हैं विपक्ष के उम्मीदवार? हाल ही में कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने उनसे मुलाकात की थी और उसके बाद से ही इस मुलाकात की चर्चा हर किसी के जबान पर है। वाराणसी में मोदी के खिलाफ चुनाव लडऩे के लिए किसी साधारण नहीं बल्कि अत्यंत मजबूत शख्सियत की जरूरत है जो कि निश्चित तौर पर रावण हो सकते हैं। सहारनपुर के घडकौली ग्राम के एक दलित परिवार में जन्मे रावण ने छुटमलपुर के समीप ठाकुर जाति के स्वामित्व वाले कॉलेज से अपनी पढ़ाई पूरी की। यहां उन्हें दलित छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव से दो चार होना पड़ा जिसके खिलाफ उन्होंने लड़ाई लड़ी। खुद को आंबेडकरवादी बताने वाले रावण कांशी राम के तो प्रशंसक हैं लेकिन मायावती के विचारों से इत्तफाक नहीं रखते। शिक्षा, अफसरशाही और आत्म रक्षा के रास्तों को अपनाकर दलितों को संगठित करने का उन्होंने वही तरीका चुना जो कांशी राम का था। उन्होंने भीम आर्मी की नींव रखी और सहारनपुर जिले में 400 भीम आर्मी स्कूलों की स्थापना की जहां पर नि:शुल्क प्राथमिक शिक्षा दी जाती है। उन्होंने आत्मरक्षा की कक्षाएं लगाई और अपना दबदबा दिखाने के लिए गांव-गांव घूमकर बाइक रैली निकाली। इन गांवों में ऊंची जाति वर्ग में आने वाले ठाकुरों के गांव भी थे।

 
दिलचस्प है कि लोध जाति से आने वाली उमा भारती जिन्होंने साध्वी से लेकर केंद्रीय मंत्री बनने तक का सफर तय किया है, एक वाकये का जिक्र करती हुई कहती हैं कि उनके अपने गांव टीकमपुर में उनकी जाति के लोग ठाकुरों के घर के सामने से साइकिल चलाकर नहीं निकल सकते थे। उन्हें साइकिल से उतरकर पैदल ही जाना पड़ता था क्योंकि दलितों के साइकिल पर चढ़कर ठाकुर अपने घर के सामने से निकलने को अपना तिरस्कार समझते थे। यह वाकया उन्होंने 25 साल पहले सुनाया था और आज भी इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है।
 
भीम आर्मी 18 वर्ष से अधिक के दलित युवाओं को अपने साथ जोड़ता है। इसके सदस्यों में ज्यादातर चमड़े का काम करने वाले या उसकी उपजाति जाटव हैं। लेकिन भीम आर्मी अपने संगठन में मुस्लिमों का भी स्वागत करता है। इसके पास न तो औपचारिक ढांचा हैं और न ही यह पंजीकृत है, लेकिन इसका दावा है कि सहारनपुर और आस पास के क्षेत्रों में उसके 20,000 से अधिक सदस्य हैं। संगठन दलितों के सम्मान की रक्षा और उसे बनाए रखने के लिए सीधी कार्रवाई पर जोर देता है। रावण ने हाल में दिए एक साक्षात्कार में कहा, 'भीम आर्मी के माध्यम से दलित युवा इस बात को लेकर जागरूक हुए हैं कि वे अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर सकते हैं और उत्पीडऩ को वे अब और अधिक नहीं सहेंगे। भीम आर्मी किसी को डराने के लिए नहीं है बल्कि दलितों की सुरक्षा के लिए है।'
 
रावण की मुश्किलों की शुुरुआत 2015 से होती है जब उन्होंने गांव के बाहर एक बोर्ड लगाया जिस पर लिखा था, 'द ग्रेट चमार घडकौली आपका हार्दिक अभिनंदन करता है।' एक ऐसे गांव जहां ठाकुरों के भी घर हैं वहां इस तरह की घटना को कैसे सहन किया जा सकता था? जाहिर है, ठाकुरों ने इसका विरोध किया। जब भाजपा ने सहारनपुर के सामुदायिक तौर पर संवेदनशील रास्तों से इजाजत लिए बिना ही शोभा यात्रा निकाली तब एक चरण के रूप में शुरू हुआ यह संघर्ष अपने चरम पर पहुंच गया। उसके कुछ हफ्तों बाद ही राजपूत राजा महाराणा प्रताप की जयंती के मौके पर दलितों और ठाकुरों के बीच हिंसक झड़पें हुईं। राज्य सरकार ने हिंसा भड़काने के लिए भीम आर्मी को उत्तरदायी ठहराया हालांकि रावण से इस आरोप को खारिज कर दिया। रावण को गिरफ्तार किया गया लेकिन उच्च न्यायालय से वह बरी हो गए। लेकिन बात तब भी नहीं बनी, योगी आदित्यनाथ की सरकार ने कुछ ही घंटों बाद राष्टï्रीय सुरक्षा कानून के तहत दोबारा से उनकी गिरफ्तारी का आदेश दे दिया। मानवाधिकार समूहों की ओर से इसका जबरदस्त विरोध किए जाने के बावजूद उन्हें रिहा नहीं किया गया और अब वह हाल ही में कैद से बाहर निकले हैं।
 
सहारनपुर दलित लामबंदी और मुस्लिमों व दलितों के बीच की एकता के लिए काफी चर्चित रहा है। इस परियोजना पर कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने काम किया है। प्रख्यात लेखक और दलित चिंतक चंद्र भान प्रसाद के मुताबिक, 'देश में करीब 400 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां दलित-मुस्लिम को मिलाकर 30 फीसदी मतदाता हैं। साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि करीब 90-95 फीसदी दलित और मुस्लिम वोट डालने के लिए निकलते हैं। ऐसे में यदि वे एकसाथ आते हैं तो चुनावी तौर पर बहुत ही महत्त्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।' रावण इस एकता का चेहरा बनकर उभरे हैं भले ही देश के बाकी हिस्सों में वे इतने चर्चित नहीं हैं।
 
कांग्रेस यदि रावण से संपर्क साधती है तो उसमें बहुत अधिक आश्चर्य की बात नहीं है। उनकी पार्टी पंजीकृत नहीं है। ऐसे में कांग्रेस उनमें उसी तरह की राजनीतिक संभावनाएं तलाश रही है जैसा कि आदिवासी राजनीतिक समूह जय आदिवासी शक्ति के संयोजक हीरालाल अलावा ने मध्य प्रदेश में अपने आदिवासी मतों को कांग्रेस के पक्ष में मोड़ दिया था। क्या चंद्रशेखर आजाद 'रावण' वैसा ही प्रभाव छोड़ पाएंगे?  
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