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कम दाम, आलू किसान हलाकान

वीरेंद्र सिंह रावत / लखनऊ March 17, 2019

आलू की खेती करने वाले किसानों को कीमत संकट का सामना करना पड़ रहा है और इसके लिए कई कारण जिम्मेदार हैं। आगरा स्थित फेडरेशन ऑफ कोल्ड स्टोरेज एसोसिएशन ऑफ इंडिया के कार्यवाहक अध्यक्ष राजेश गोयल बताते हैं कि जब उन्होंने 1998 में कोल्ड स्टोरेज कारोबार की शुरुआत की तो उत्तर प्रदेश में आलू की खुदरा कीमतें लगभग 20 रुपये प्रति किलोग्राम थीं। ये अब भी उसी स्तर के आसपास हैं और कभी-कभार कम भी हो जाती हैं। वह कहते हैं कि इन 20 वर्षों के दौरान आलू की खेती की लागत तीन रुपये प्रति किलोग्राम की तुलना में दोगुनी से भी अधिक बढ़कर 7-8 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है।

 
आलू में साल दर साल रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है लेकिन किसानों की आय में गिरावट आ रही है। इसके अलावा अनुपयुक्त घरेलू किस्मों और खाद्य प्रसंस्करण की अविकसित मूल्य शृंंखला के कारण निर्यात बाजार में भी उत्साह नहीं दिखता है। कोल्ड स्टोरेज में और अधिक स्टोर करने के इच्छुक किसानों को कोई जगह नहीं मिल पाती है। 2017 के बाद से आगरा थोक बाजार में दाम 5-6 किलोग्राम रहे हैं। इसमें अप्रैल से नवंबर तक की अवधि अपवाद है। इस दौरान दाम 10-15 रुपये थे। 2005 के बाद से केवल नवंबर 2014 में ही थोक कीमतें 20 रुपये प्रति किलोग्राम से अधिक रही हैं।
 
 21.8 लाख हेक्टेयर पर आलू की खेती करने वाले इन किसानों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया है। तीन-चौथाई फसल केवल पांच राज्यों - उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, गुजरात और मध्य प्रदेश में ही होती है। दो प्रमुख उत्पादकों - उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में केंद्र सरकार का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 5.5 रुपये प्रति किलोग्राम है। किसानों का कहना है कि इसमें तो उत्पादन लागत भी नहीं निकलती है। कोल्ड स्टोरेज का शुल्क 2.5 रुपये प्रति किलोग्राम है। कई बार तो किसान अपनी जिंस की डिलिवरी लेने के लिए भी कोल्ड स्टोरेज नहीं आते क्योंकि इससे ढुलाई लागत का खर्च थोक बाजार (मंडी) में उपज से होने वाली आमदनी से भी ज्यादा पहुंच जाएगा।
 
किसानों का कहना है कि 2018-19 में उत्पादन 5.2 करोड़ टन और खपत 3.2 करोड़ टन रहने का अनुमान जताया गया है। मौजूदा सीजन में एक बार फिर अधिक उत्पादन होने के आसार हैं। भंडारण सुविधाएं पहले ही भर चुकी हैं और दामों में  भी विभिन्नता है। भारतीय बागवानी निर्यातक संघ के अध्यक्ष अजित शाह कहते हैं कि किसानों की सहायता करने का सबसे आसान तरीका यूरोप और रूस जैसे प्रमुख बाजारों में मांग वाली किस्मों की खेती करके निर्यात बाजार को बढ़ावा देना है। वे कहते हैं कि पहले दिए गए उनके सुझावों पर कोई सरकारी कार्रवाई नहीं हुई है। शाह कहते हैं कि उदाहरण के लिए रूस आलू का बड़ा खरीदार है। हालांकि इसके लिए उत्पादन करने वाले मूल देश से इस प्रमाण-पत्र की आवश्यकता होती है कि वह खेप दूषित नहीं है और इसे दूषण रहित वातावरण में उगाया गया है। ऐसा प्रमाण-पत्र भारतीय अधिकारियों द्वारा प्रदान नहीं किया जा रहा है जबकि हम रूस को प्रति वर्ष 50,000 टन निर्यात कर सकते हैं। कुल उत्पादन में उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल का योगदान क्रमश: लगभग 32 और 23 प्रतिशत रहता है। इसके बाद बिहार और गुजरात का क्रमश: 15 और सात प्रतिशत योगदान रहता है। जनवरी में फसल की आवक बाजार में बढ़ जाती है और मार्च में यह शीर्ष पर होती है। इस समय किसान आने वाले महीनों में बेहतर कीमतों की उम्मीद में कोल्ड स्टोरेज में स्टॉक करने लगते हैं।
 
कोलकाता के आलू कारोबारी और कोल्ड स्टोर के मालिक पतित पावन दे कहते हैं कि दक्षिण भारत में प्रति व्यक्ति खपत बढ़ाने की बहुत जरूरत है। वहां यह राष्ट्रीय औसत 20 किलोग्राम प्रति वर्ष से बहुत कम है। वे खाद्य प्रसंस्करण की निराशाजनक स्थिति की ओर भी इशारा करते हैं। आलू के चिप्स बनाने वालों समेत प्रसंस्करण करने वाले आलू के बड़े खरीदार होते हैं। पिछले साल उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा था कि वह एमएसपी के तहत किसानों से सीधे 1,00,000 टन खरीद करेगी लेकिन वास्तविक खरीद 13,000 टन रही और वहां किसानों द्वारा एमएसपी से कम दामों पर बिक्री की जा रही थी। राज्य की वार्षिक फसल का आकार 1.55 करोड़ टन है।
Keyword: agri, farmer, crop, potato,,
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