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पीएसबी में बड़ी पूंजी डालने से भी निवेशक उत्साहित नहीं

श्रीपाद ऑटे /  March 17, 2019

अक्टूबर 2017 से फरवरी 2019 के बीच सरकार द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) के पुनर्पूंजीकरण के लिए 1.9 लाख करोड़ रुपये लगाए जाने के बावजूद निवेशकों में इस क्षेत्र को लेकर उत्साह नहीं दिखा है। यह रकम वित्त वर्ष 2015 से वित्त वर्ष 2017 के दौरान सरकार द्वारा डाली गई रकम की तुलना में चार गुना ज्यादा है। निफ्टी पीएसयू बैंक सूचकांक फिलहाल लगभग उसी स्तर पर है जो पुनर्पूंजीकरण की घोषणा के दिन था। दरअसल, भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) को छोड़कर पुनर्पूंजीकरण से लाभान्वित हुए सभी पीएसबी शेयर इस अवधि के दौरान 16-57 प्रतिशत तक गिरे हैं। समेकित आधार पर भी, 20 पीएसबी का संयुक्त बाजार पूंजीकरण 24 अक्टूबर 2017 से 24 प्रतिशत बढ़कर 15 मार्च 2019 को 5.09 लाख करोड़ रुपये हो गया। एसबीआई के बगैर, अन्य बैंकों के लिए संयुक्त वृद्घि 1.9 लाख करोड़ रुपये के पूंजी निवेश के खिलाफ महज 50,525 करोड़ रुपये है। इंडियन बैंक ऐसा एकमात्र पीएसबी है जिसे सरकार से एक भी पैसा नहीं मिला है। 24 अक्टूबर 2017 को जब कर्ज में डूबे पीएसबी को सरकार द्वारा 2.11 लाख करोड़ रुपये के पुनर्पूंजीकरण की घोषणा से नई जिंदगी मिली थी। निफ्टी पीएसयू सूचकांक में तब एक दिन में 27 प्रतिशत की तेजी आई थी। लेकिन कई कारकों की वजह से उत्साह कायम नहीं रहा। पीएसबी की गुणवत्ता पर कई कारणों से दबाव पड़ा जिससे उन्हें प्रावधान और नुकसान की राह पर बढऩे के लिए बाध्य होना पड़ा। आंकड़ों से पता चलता है कि अप्रैल, 2017-दिसंबर 2018 के दौरान पीएसबी द्वारा फंसे कर्ज के संबंध में किया गया कुल प्रावधान 4.57 लाख करोड़ रुपये या अक्टूबर 2017-नवंबर 2018 के दौरान सरकार द्वारा लगाए गए 1.2 लाख करोड़ रुपये के लगभग चार गुना पर था। 

 
दिसंबर 2018 से फरवरी 2019 तक अन्य बैंकिंग व्यवस्था में 71,364 करोड़ रुपये की रकम डाली गई।  इक्रा में वित्तीय क्षेत्र की रेटिंग के उपाध्यक्ष एवं प्रमुख अनिल गुप्ता का कहना है कि सरकार द्वारा 2.1 लाख करोड़ रुपये के पुनर्पूंजीकरण की घोषणा के साथ निवेशक उम्मीद कर रहे थे कि इससे न केवल फंसे कर्ज के संबंध में प्रावधान में मदद मिलेगी बल्कि बैलेंस शीट मजबूत बनाने में भी मदद मिलेगी। हालांकि आरबीआई के नई सख्त एनपीए कानून जैसे कुछ बड़े बदलावों से सभी उम्मीदें टूट गईं। 
 
12 फरवरी, 2018 को आरबीआई ने कॉरपोरेट ऋण पुनर्गठन जैसी सभी मौजूदा ऋण सुधार योजनाओं को समाप्त कर दिया। उसने कहा कि यदि 2,000 करोड़ रुपये या इससे अधिक के कर्ज वाले कर्जदारों द्वारा ऋण देनदारी में एक दिन का भी विलंब किए जाने पर इसे फंसा कर्ज समझा जाना चाहिए और कर्जदाताओं को समाधान प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए। यदि 180 दिन में कोई कदम नहीं उठाया जाता है तो संबद्घ खाते को आईबीसी को सुपुर्द कर दिया जाना चाहिए। लेकिन यह पहल दीर्घावधि तौर पर सकारात्मक है, लेकिन इससे पीएसबी के अल्पावधि आय परिदृश्य को लेकर चिंता बढ़ी क्योंकि कुल कॉरपोरेट उधारी में उनका तीन-चौथाई का याोगदान है और आईबीसी ने 50 प्रतिशत अग्रिम प्रावधान की शर्त रखी है। 
 
आरबीआई के नए एनपीए नियमों के महज दो दिन बाद एक और झटका लगा, जब पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) में नीरव मोदी द्वारा 11,000 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी का पता चला। इससे पीएसबी में प्रशासनिक स्तर पर चिंता पैदा हुई। निफ्टी पीएसयू बैंक सूचकांक इन दो घटनाक्रम की वजह से महज पांच कारोबारी सत्रों में 11 प्रतिशत टूट गया था।  बेहद महत्वपूर्ण बात यह है कि ये संरचनात्मक समस्याएं हैं। प्रभुदास लीलाधर के मुख्य कार्याधिकारी एवं मुख्य पोर्टफोलियो प्रबंधक (पीएमएस) अजय बोडके का कहना है, 'पीएसबी के प्रदर्शन को प्रभावित करने वाले मुद्दों में सीएमडी के संक्षिप्त कार्यकाल, इनकी नियुक्ति में सख्ती और नए व्यवसाय को लेकर कर्मचारियों की सक्रियता का अभाव मुख्य रूप से शामिल रहे हैं। लेकिन महज 2-3 पीएसबी को छोड़कर, क्या पीएसबी में पर्याप्त ऋण मूल्यांकन क्षमता मौजूद है। यह सवाल बरकरार है।'
 
बोडके का कहना है कि चूंकि पीएसबी शुद्घ ब्याज मार्जिन, वृद्घ्रि, परिसंपत्ति गुणवत्ता और परिचालन खर्च जैसे मानकों पर कमजोर हैं और बाजार में इसका प्रभाव दिखा है।  पीएसबी का वित्तीय प्रदर्शन उम्मीद की तुलना में ज्यादा खराब हुआ है। वित्त वर्ष 2018 में सकल एनपीए 350 आधार अंक तक बढ़कर 12.9 प्रतिशत हो गया और स्लिपेज (खातों के फंसे कर्ज में तब्दील होने की दर) 9.3 प्रतिशत पर रही, जो वित्त वर्ष 2013 के बाद से सबसे ज्यादा थी। इस तरह से वित्त वर्ष 2018 में ऋण बुक के प्रतिशत के तौर पर ऋण लागत या प्रावधान भी बढ़कर 4.2 प्रतिशत पर पहुंच गया। वित्त वर्ष 2018 में 20 पीएसबी ने संयुक्त रूप से 86,630 करोड़ रुपये का नुकसान दर्ज किया, जबकि एक साल पहले यह आंकड़ा 932 करोड़ रुपये था। इसका प्रभाव वित्त वर्ष में बाद की तिमाहियों में भी देखा गया।
 
गुप्ता का कहना है कि पीएनबी धोखाधड़ी के बाद आरबीआई द्वारा एलओयू रद्द किए जाने से भी वैश्विक ऋण बुक प्रभावित हुई और यह दिसंबर 2018 में 15 प्रतिशत की घरेलू ऋण वृद्घि की तुलना में महज 4 प्रतिशत बढ़ी।  इक्विरस सिक्योरिटीज के विश्लेषक रोहन मंडोरा का कहना है कि इसके अलावा पुनर्पूंजीकरण से इक्विटी में बड़ी गिरावट भी आई, क्योंकि यह तब किया गया था जब पीएसबी का मूल्यांकन उनकी बुक वैल्यू से नीचे था, जिससे शेयर कीमतों पर दबाव पड़ा।  हालांकि पीएसबी की परिसंपत्ति गुणवत्ता में अब सुधार आ रहा है और कुछ बैंकों को आरबीआई के सख्त पीसीए दायरे से बाहर निकलने में मदद मिली है, लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि अभी सब कुछ सामान्य नहीं हुआ है। एसबीआई को छोड़कर, हम फिलहाल पीएसबी पर सकारात्मक नहीं हैं। एमके ग्लोबल में इंस्टीट्यूशनल रिसर्च के प्रमुख धनंजय सिन्हा का कहना है कि एमएसएमई से जुड़े ऋण जोखिम, कृषि ऋण माफी के प्रभाव और बाजार भागीदारी के नुकसान को लेकर चिंताएं बरकरार हैं। 
 
बोडके का मानना है कि पीएसबी में अच्छी रणनीति के साथ खरीदारी की जा सकती है, पर इन्हें फिलहाल प्रमुख पोर्टफोलियो का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि उन्होंने लंबे समय से निवेशकों को खुश नहीं किया है। वह कहते हैं कि मैं एसबीआई और बैंक ऑफ बड़़ौदा जैसे प्रमुख पीएसबी की सलाह देना पसंद करूंगा। 
Keyword: bank, loan, debt, RBI, NPA, PSB,,
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