बिजनेस स्टैंडर्ड - मोदी की विदेश नीति की पांच गलतियां
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मोदी की विदेश नीति की पांच गलतियां

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  March 17, 2019

कौन सी भावना अधिक तीव्र है, भय या प्रीति? इस सवाल का जवाब तो कोई मनोविज्ञानी ही दे सकता है। एक स्तंभकार तो केवल तथ्य जुटा सकता है, जांच परखकर उन्हें कल्पना और मिथ्या प्रचार से अलग कर सकता है और एक महत्त्वपूर्ण बहस को जन्म दे सकता है। ट्रोलिंग (किसी के पीछे पडऩा और परेशान करना) को हम प्रगति का सूचक मानते हैं। पिछले दिनों चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जैश-ए-मोहम्मद के मुखिया मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित किए जाने के प्रस्ताव को रोककर भारत को बड़ा झटका दिया। चीन ने न केवल चौथी बार ऐसे प्रस्ताव को अवरुद्ध किया बल्कि चीन के सरकारी या पार्टी नियंत्रित मीडिया में आई टिप्पणियों में भारत को लेकर तमाम तरह की चेतावनी भी दी गईं। इनमें सबसे रूखी टिप्पणी वहां के सत्ताधारी दल के स्वामित्व वाले समाचार पत्र ग्लोबल टाइम्स में आई। पत्र ने भारतीय जनता पार्टी के क्रुद्ध कार्यकर्ताओं की तस्वीर के साथ नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाया कि वह इन परिस्थितियों का इस्तेमाल चुनावी लाभ के लिए कर रहे हैं। अखबार ने लिखा कि चीन भारत का मित्र है, उसके राष्ट्रवाद का बंधक नहीं। चीन ने गत वर्ष वुहान में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी चिनफिंग के बीच हुई वार्ता को लगभग पुनर्परिभाषित किया है, मानो वह कह रहा है कि अगर भारतीय चुनावों के वक्त उसके सैनिक भारतीय क्षेत्र में नहीं आए हैं तो उसने अपना वादा निभाया है। बाकी मामलों में पुराना नियम लागू होगा।

 
चीन के इस दंभ के खिलाफ भारतीय प्रतिक्रिया की बात करें तो इस तरह की घेराबंदी के बाद भी भारत ने चीन का नाम तक लेने का साहस नहीं किया और उसने 'एक देश' को लेकर अपनी 'निराशा' जाहिर की। अमेरिका ने बिना कोई हिचकिचाहट दिखाए चीन का नाम लिया और उसका वक्तव्य भारत की तुलना में कहीं अधिक कड़ा है।  मोदी सरकार की मजबूती में कोई कमी नहीं आई है लेकिन अब वह अपनी दबंगई का प्रयोग चुनिंदा ढंग से कर रही है। हालांकि इसमें भी विवेक का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। आम चुनाव से दो महीने पहले मार्च 2019 में मोदी का भारत, शत्रुतापूर्ण व्यवहार कर रहे चीन का प्रतिकार करने में घबराया हुआ नजर आ रहा है, जबकि अपेक्षाकृत मित्रवत रहे अमेरिका के साथ एक स्वदेशी कारोबारी युद्ध छेड़ दिया गया है। जो हमें नुकसान पहुंचाते हैं और हमें अपमानित करते हैं उनके समक्ष घुटने टेक देते हैं और हमारे लिए आवाज उठाते हैं, उनसे हम लड़ते भी हैं क्योंकि हम उनसे प्यार करते हैं।
 
आइए बात करते हैं मोदी के विदेश नीति सिद्धांत की पांच गलतियों के बारे में: 
 
1- हम यह समझ पाने में नाकाम रहे हैं कि रणनीतिक गठजोड़ करने के लिए बड़ा दिल होना आवश्यक है: अमेरिका हमारा प्रमुख रणनीतिक सहयोगी रहा है लेकिन ट्रंप समेत अमेरिका के शीर्ष प्रशासन में भारत को लेकर एक किस्म की ऊब पैदा हो चुकी है। ट्रंप को एक ढीठ बच्चा मानकर खारिज किया जा सकता है लेकिन क्या हमारी स्थिति ऐसा करने की है? आप इस बात पर हंस सकते हैं कि वह हार्ली डेविडसन बाइक पर भारतीय शुल्क को लेकर किस तरह चिंतित थे लेकिन वह भी हमारे स्वदेशी अर्थशास्त्र को अगंभीर करार दे सकते हैं। आयातित औषधियों और चिकित्सा उपकरणों की कीमतें घटाना एक अच्छा नैतिक और राजनीतिक कदम है। परंतु इसका क्रियान्वयन अचानक मूल्य नियंत्रण और आयात पर प्रतिबंध के साथ नहीं किया जाना चाहिए। भारत द्वारा एमेजॉन और वॉलमार्ट के खिलाफ जंग छेडऩे पर अमेरिका हैरत में होगा क्योंकि भारत खुद अपने ई-कॉमर्स और डिजिटल फाइनैंस क्षेत्र में चीनी निवेश का स्वागत कर रहा है।
 
पुलवामा की घटना के बाद अमेरिका ने जिस तरह भारत का साथ दिया वह उल्लेखनीय है क्योंकि मोदी और ट्रंप के आपसी रिश्तों और समझ में तनाव देखा गया है। नवंबर 2017 के बाद से दोनों के बीच कोई द्विपक्षीय बातचीत नहीं हुई है और नवंबर 2018 में ब्यूनस आयरस में जी-20 शिखर बैठक में ऐसी वार्ता का प्रयास नाकाम रहा। ट्रंप ऐसे व्यक्ति हैं कि अगर उनकी निजी नाराजगी दूर नहीं की गई तो वह तस्वीर खिंचवाने जैसी बातों में समय नहीं गंवाते। भारत अगर व्यापारिक मोर्चे पर थोड़ी रियायत दे तो इससे उसे नुकसान नहीं होगा।
 
ट्रंप अफगानिस्तान में सेना नहीं मांग रहे। वह रूस की एस-400 राइफल न खरीदने और ईरान में चाबहार बंदरगाह बंद करने को भी नहीं कह रहे। उनकी मांग केवल इतनी है कि कुछ शुल्क दरों में रियायत दी जाए। समझदार नेता अपनी लड़ाइयां सावधानी से चुनते हैं। खासतौर पर मित्रों के साथ अपनी लड़ाइयां। 
 
2- बड़ी और अहंकारी ताकतों के एकतरफा तुष्टïीकरण का गलत आकलन: भारत ने अमेरिका के साथ कारोबारी मोर्चे पर झगड़ा मोल लिया जबकि उसके साथ हमारा व्यापार अधिशेष 6,000 करोड़ डॉलर का है। जबकि चीन के साथ इतनी ही राशि का घाटा होने के बावजूद उसे अबाध पहुंच दी जा रही है। चीनी वस्तुओं और निवेश के लिए बाजार शायद इसलिए खोला गया ताकि भारत के प्रति उसका रुख नरम रहे।
 
ऐसा कुछ नहीं हुआ। दो वर्ष पहले चीन डोकलाम में घुसा। अब संदेश कुछ ऐसा है कि अगर चुनावी वक्त में हम डोकलाम या चुमर में नहीं घुस रहे तो हमारा शुक्रिया कहिए। वह भी एक चीनी फोन, नेटवर्क या ऑपरेटिंग सिस्टम पर। अमेरिका से हम छूट चाहते हैं जबकि चीन को रियायत दे रहे हैं।
 
3- व्यक्ति केंद्रित विदेश नीति से लगाव- मोदी का अपना कद और करिश्मा है। परंतु यह पेशेवर कूटनीति का स्थान नहीं ले सकता। हमें आंतरिक बहस और चर्चा के जरिये नीतियों में सुधार करने की आवश्यकता है।  हो सकता है सऊदी शहजादे को गले लगना पसंद आता हो और वह तुरत-फुरत निर्णय लेते हों लेकिन शी चिनफिंग इससे नाखुश हो सकते हैं या इसे चापलूसी समझ सकते हैं। इसके अलावा तंग श्याओफिंग के बाद ऐसे ताकतवर चीनी नेता होने के बावजूद हो सकता है उन्हें वह व्यक्तिगत शक्ति न हासिल हो जो मोहम्मद बिन सुलेमान को रियाद में या मोदी को नई दिल्ली में हासिल है। शी चिनफिंग एक संगठित और सक्षम तंत्र के साथ काम करते हैं जो मोदी की कैबिनेट से अधिक प्रभावी ढंग से काम करता है। अब यह स्पष्ट हो चुका है कि शी चिनफिंग के साथ मोदी ने जो लुभावना तरीका अपनाया, जो झियान, वुहान और अन्य जगहों पर लगातार जारी रहा, वह नकारात्मक साबित हो चुका है। गणतंत्र दिवस पर ट्रंप को आमंत्रित करना और नवाज शरीफ से करीबी बढ़ाने के बाद हासिल नाकामी दोनों बताते हैं कि यह सब बिना तैयारी के किया गया। 
 
4- अनुमान की कीमत: राजनीति, कूटनीति, युद्ध, खेल और जुआ, ऐसे क्षेत्र हैं जहां आपकी आगामी चाल का अंदाजा नहीं लगना चाहिए। मोदी इस मोर्चे पर नाकाम रहे। विदेशी नेता उनकी शैली से वाकिफ हैं। उन्हें पता है वे प्रचार, तस्वीरों और तारीफ में रुचि रखते हैं। ये नेता जानते हैं कि मतदाताओं को प्रसन्न करने के लिए मोदी को इनकी जरूरत है। चीनी अब तक यह समझ चुके हैं कि मोदी चुनाव के पहले सीमा पर कोई घुसपैठ पसंद नहीं करेंगे। वे यह भी जान चुके हैं कि मोदी पाकिस्तान के साथ छोटी झड़प पसंद करेंगे ताकि तुरंत अपनी जीत की घोषणा कर सकें। चीन के साथ यह असंभव है। चीन ने अंदाजा लगा लिया है कि मोदी कब क्या प्रतिक्रिया देंगे। पाकिस्तान ने भी कुछ चीजें समझ ली होंगी। उन्हें पता है कि मोदी अब बड़े आतंकी हमलों पर तुरंत प्रतिक्रिया देंगे। अब पाकिस्तान मनचाहा संकट उत्पन्न कर सकता है। बड़े नेता खुद को मोहरा नहीं बनने देता। 
 
5- विदेश नीति और घरेलू नीतियों को मिलाना: मोदी ने अक्सर अपनी विदेश नीति की पहल और शिखर बैठकों का इस्तेमाल घरेलू छवि निर्माण के लिए किया है। सबसे पहले चीन ने इसका फायदा उठाया। उसे पता था कि भारत चुनावी मौसम में घुसपैठ नहीं चाहेगा और उन्होंने इस बारे में अपनी शर्तो पर आश्वस्त किया। व्यापार में चीन का दबदबा बढ़ा है। अरुणाचल प्रदेश और पाकिस्तान को लेकर उनका नजरिया कड़ा है और भारत मसूद अजहर के मामले में केवल प्रतिरोध कर पाया वह भी बिना नाम लिए। वुहान के बाद से भारत ने परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह की सदस्यता की मांग नही उठाई। अब अगर भारत मसूद अजहर पर प्रतिबंध चाहता है तो इससे दो बातें होती हैं: एक तो भारत चीन के समक्ष अपनी द्विपक्षीय हैसियत कमजोर करता है और दूसरा वह उसे यह अवसर देता है कि वह भारत के साथ अपनी नीति को पाकिस्तान से जोड़ सके। यानी भारत-चीन और पाकिस्तान का एक त्रिकोण, यही तो चीन चाहता था। हमने मोदी सरकार के पांच साल के कार्यकाल का बहीखाता पेश नहीं किया है। हमने केवल वे बातें दर्ज की हैं जो हमारी दृष्टि में उसकी सबसे बड़ी गलतियां हैं।
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