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आर्थिक वृद्घि दर में कैसे आएगी समृद्घि?

नीलकंठ मिश्रा /  March 16, 2019

तिमाही जीडीपी आंकड़ों को लेकर चाहे जितनी भी बहस क्यों न हो लेकिन हाल ही में जारी दिसंबर तिमाही में वृद्घि दर में आई गिरावट ने शायद ही किसी को चौंकाया हो। हां, इस गिरावट का आकार अवश्य अनुमान से काफी अधिक था। बीते कई महीनों के दौरान आर्थिक गतिशीलता में कमी आई है। व्यापक औपचारिक क्षेत्र की बिक्री के आंकड़े में गिरावट इसका उदाहरण है। यहां तक कि कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट ने भी जरूरी राहत नहीं दी। चालू तिमाही में वृद्घि दर में और गिरावट आने की बात कही जा रही है। 

क्या यह नव सामान्य है? इतना ही नहीं देश की अर्थव्यवस्था अपनी संभावित वृद्घि को मजबूत करने के लिए कई सकारात्मक ढांचागत बदलावों से गुजर रही है जिनकी बदौलत वृद्घि दर में गिरावट आ रही है। सवाल यह है कि वृद्घि को कैसे मजबूत किया जाए?

यह स्पष्टï है कि मंदी खपत आधारित है। वहीं दूसरी ओर सकल जमा पूंजी निर्माण (जीएफसीएफ) के संदर्भ में आकलित निवेश पांचवीं तिमाही में दो अंकों में बढ़ता रहा। जीएफसीएफ और जीडीपी का अनुपात भी बढ़ा है। हम इससे पहले यह चर्चा कर चुके हैं कि धीमी होती खपत के लिए कमजोर खाद्यान्न कीमतों के चलते अमीरों से गरीबों को आय के हस्तांतरण में ठहराव और वेतन आयोग के चक्र का समापन जिम्मेदार हैं। 

बीते तीन वर्षों के दौरान हमने सातवें वेतन आयोग का क्रियान्वयन होते देखा है जबकि इस दौरान घाटे में कोई खास इजाफा नहीं हुआ। इसके विपरीत इससे पहले के दो वेतन आयोग (एक दशक में एक ही वेतन आयोग होता है) के क्रियान्वयन के दौरान घाटे में तेजी से इजाफा हुआ था क्योंकि सरकार के पेंशन और वेतन व्यय में जीडीपी की तुलना में दो से ढाई फीसदी तक का इजाफा हुआ था। 

पर्यवेक्षक कहते हैं कि बीते पांच साल में देश के राजकोषीय घाटे में कोई बदलाव नहीं हुआ है लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि यह अभी भी इतिहास के न्यूनतम स्तर पर है। हालांकि राज्य और केंद्र का मिला जुला घाटा जीडीपी के 6 फीसदी से अधिक है। वित्तीय बचत के हिस्से के रूप में अनुपात गिरा है। वेतन का बिल अब असमायोजित जीडीपी की तुलना में धीमी गति से बढ़ रहा है। परंतु इन बातों से इतर बॉन्ड बाजार लगातार सरकार को दंडित कर रहा है। बॉन्ड प्रतिफल जरूरत से ऊंचे हैं। इनका प्रीमियम अतीत के मुकाबले काफी अधिक है। 

कई लोगों का मानना है कि बाजार किफायती है और यह उच्च प्रतिफल केवल बाजार द्वारा सरकार को अनुशासन सिखाने का उदाहरण भर है। यह एक कारक हो सकता है लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बाजार अक्सर परिसंपत्तियों का गलत मूल्यांकन करता है और भारतीय बॉन्ड बाजार नकदीकृत नहीं है। करीब आधी बॉन्ड खरीद बैंकों के कोष करते हैं जो प्राय: निष्क्रिय रहते हैं। यह भी शायद एक वजह है जिसके चलते बॉन्ड का मूल्य निर्धारित करने में तकनीकी चार्ट का प्रयोग किया जाता है। 

सरकारी बॉन्ड को एक ऐसी प्रतिभूति मानना सही नहीं है जिसकी कीमतों को सरकार नियंत्रित नहीं करती। नीति निर्माताओं ने ऐसा करके डेट के मूल्य निर्धारण में उसकी भूमिका को कमतर करके आंका है। यह उच्च प्रीमियम, अत्यधिक उच्च वास्तविक ब्याज दरों के भी ऊपर है क्योंकि मौद्रिक नीति समिति कृषि अधिशेष की दिशा में परिवर्तन की राह नहीं निकाल पा रहा और मुद्रास्फीति का अनुमान लगातार ऊंचा लग रहा है। 

अब वह समय नहीं है जब आरबीआई गवर्नर दरों का निर्धारण करते थे, अब यह काम समिति के हवाले है लेकिन यह कदम उठाने के साथ-साथ एमपीसी की मुद्रास्फीति और वृद्धि का अनुमान लगाने की संभावनाओं में कोई सुधार नहीं किया गया। पर्यवेक्षकों के मुताबिक दिक्कत  यह है कि हर सदस्य मुद्रास्फीति के एक समान अनुमानों पर निर्भर होते हैं। अगर अनुमान गलत हो तो कीमत अर्थव्यवस्था चुकाती है। हाल में समिति की ओर से बताया गया कि मुद्रास्फीति का अनुमान लगाने की प्रक्रिया में सुधार किया जा रहा है।  

पिछली दो बैठकों में एमपीसी ने मुद्रास्फीति के अनुमानों में उल्लेखनीय कमी की है। एमपीसी ने आने वाले वर्ष के लिए 7.2 फीसदी से 7.4 फीसदी का जो वृद्धि अनुमान प्रस्तुत किया है वह भी बहुत ऊंचा लग रहा है। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने चालू तिमाही में केवल 6.3 फीसदी की वृद्धि का अनुमान लगाया है। क्या बिना उत्प्रेरक के वृद्धि दर में एक फीसदी का इजाफा आ सकता है? क्या एमपीसी द्वारा दरों में कटौती से फर्क पड़ेगा? हमारी अर्थव्यवस्था दरों को लेकर संवेदनशील नहीं है लेकिन मौजूदा माहौल में इससे फर्क पड़ सकता है। 

अगर अल्पावधि में रीपो दर नीचे आती है तो या तो टर्म प्रीमियम में इजाफा होता है या फिर 10 वर्ष के सरकारी बॉन्ड प्रतिफल में गिरावट। इस स्थिति में संकटग्रस्त बॉन्ड म्युचुअल फंड को राहत मिलेगी जो पूंजी के बहिर्गमन से जूझ रहे हैं। दिसंबर तिमाही के नतीजों में सबसे अहम बात यह है कि एनबीएफसी के ऋण वितरण में काफी कमी आई है। 

बैंकिंग क्षेत्र के ऋण संबंधी आंकड़े हर पखवाड़े पेश किए जाते हैं लेकिन हाल के वर्षों में गैर बैंकिंग स्रोतों के आंकड़े भी महत्त्वपूर्ण हो गए हैं। ऋण की जानकारी देने वाला कोई व्यवस्थित तंत्र नहीं है। ऐसे में तिमाही नतीजे ही ऋण की मांग में कमी के प्राथमिक संकेतक हैं। आंकड़ों के मुताबिक चालू तिमाही में इसमें काफी कमी आई है। अगर हमने तत्काल वृद्धि के पथ पर वापसी नहीं की तो प्रतिफल में गिरावट का सिलसिला चालू रहेगा। 

आने वाले महीनों में चार ऐसी वजह हैं जो राजकोषीय उत्प्रेरक का काम करेंगी। अचल संपत्ति के लिए जीएसटी दर में कटौती से खरीदार वापस आ सकते हैं और इस क्षेत्र में नकदी प्रवाह बढ़ सकता है। आय हस्तांतरण की योजना का आकार काफी बड़ा है लेकिन गहन आर्थिक प्रभाव के लिए उसमें सुधार की आवश्यकता होगी। तीसरी बात, अगर समय पर कृषि ऋण माफी होती है और बैंक कृषि ऋण वितरण शुरू कर देते हैं तो इससे कृषि क्षेत्र में नकदी बढ़ेगी। आखिरी बात, सरकारी बैंकों का पुनर्पूंजीकरण भी वित्तीय क्षेत्र की क्षमताओं में कुछ विस्तार करेगा।

अगर वित्तीय क्षेत्र मौजूदा गतिरोध से निजात नहीं पाता है तो ये उपाय देश को दोबारा वृद्धि पथ पर वापस लाने में कामयाब नहीं हो सकेंगे।

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