बिजनेस स्टैंडर्ड - सामाजिक दायित्व का सम्मान
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सामाजिक दायित्व का सम्मान

बीएस संवाददाता / मुंबई March 14, 2019

सृजन के सह-संस्थापक वेद आर्य का कहना है वह जो भी कार्य करते हैं उनमें आपसी सहयोग और साझेदारी को प्राथमिकता देते हैं। सृजन ने हाल में ही एक अभियान की शुरुआत की है। इस अभियान में बुद्ध फेलोशिप के तहत प्रशिक्षित एवं शिक्षित पेशेवरों को विकास क्षेत्र में आगे आने के लिए बढ़ावा दिया जाता है। लेखिका, सामाजिक उद्यमी, शिक्षाविद् और कथा की संस्थापक गीता धर्मराजन के साथ आर्य 2018 बिजनेस स्टैंडर्ड अवार्ड की संयुक्त विजेता रहे। यह सम्मान इन दोनों हस्तियों को उनकी सामाजिक उद्यमशीलता के लिए दिया गया है। इन दोनों हस्तियों ने चुनौती से अकेले न निपटकर अन्य लोगों के सहयोग से आगे बढऩे का निर्णय लिया। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस चेयरमैन एवं निर्णायक मंडल के चेयरमैन एस रामादुरई ने सामाजिक क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्यों के लिए दिए जाने वाले सम्मान के विजेताओं का चयन किया। रामादुरई ने कहा कि उनके लिए विजेताओं का चयन आसान काम नहीं था। उन्होंने कहा, 'हमने विभिन्न श्रेणियों में विजेताओं के नामों पर काफी विचार-विमर्श किया। हमारे सामने कई विकल्प थे, लेकिन अंतत: हमें किसी एक का ही चयन करना था।' प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन के सह-संस्थापक माधव चौहान, ओमिडयार नेटवर्क इंडिया एडवाइजर्स की प्रबंध निदेशक रूपा कुडवा, बेन कैपिटल प्राइवेट इक्विटी के प्रबंध निदेशक अमित चंद्रा, फोर्ड फाउंडेशन के क्षेत्रीय निदेशक प्रदीप नायर और गिवइंडिया के निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी अतुल सतीजा निर्णायकमंडल के अन्य सदस्य थे। 
 
नाज फाउंडेशन (इंडिया) ट्रस्ट को 'सोशल एंटरप्राइज ऑफ द ईयर' के तौर पर चुना गया। यह संस्थान एलजीबीटीक्यू समुदाय के लिए यौन स्वास्थ्य एवं समाज में उनके व्यापक समावेश के लिए काम करता है। हालांकि सम्मान देते वक्त मुख्य रूप से  युवतियों के लिए और यौन स्वास्थ्य के क्षेत्र में इसके कार्यों को आधार बनाया गया। 'सोशियली अवेयर कॉर्पोरेट ऑफ द ईयर' का सम्मान पीरामल एंटरप्राइजेज को पीरामल फाउंडेशन के सराहनीय कार्यों के लिए दिया गया। पीरामल फाउंडेशन ने आंध्र प्रदेश के अराकू वैली में आदिवासी समुदायों में स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं में सुधार के लिए  लक्षित एवं काफी प्रभावी कार्य किए हैं। निर्णायक मंडल ने महसूस किया कि यह एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें बड़ी रकम या अच्छी प्रतिभाएं नहीं आती हैं, जिससे फाउंडेशन के कार्य और सराहनीय हो जाते हैं। रामादुरई के सामने विकल्प स्पष्ट था। उन्होंने कहा, 'परिचालन दायरा और इस क्षेत्र में संलग्नता के लिए हमने पीरामल फाउंडेशन का चयन किया।' संगठनों के कार्य, उनके बीच आपसी सहयोग से काम करने की भावना और इनके प्रणेताओं ने देश में आशा एवं ऊर्जा का संचार किया है। 
 
सोशली अवेयर कॉरपोरट ऑफ दी इयर
पीरामल एंटरप्राइजेज-पीरामल फाउंडेशन 
चेयरमैन: अजय पीरामल 
 
पीरामल फाउंडेशन ने समाज के पिछड़े वर्ग के लिए काम करने की प्रतिबद्धता जताई है जिससे उनके जीवन में सुधार हो सकता है। इसके लिए कंपनी उन्हें निरोधात्मक और उपचारात्मक स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराती है। इस पुरस्कार के लिए फाउंडेशन ने आंध्र प्रदेश में अराकु वैली में आसरा ट्राइबल हेल्थ प्रोग्राम के अपने काम को दिखाया। परियोजना के तहत 52,836 लाभार्थियों को लक्षित किया गया जिनमें से अधिकांश महिलाएं थीं। इसका मकसद गर्भवती महिलाओं के मृत्यु दर में 30 फीसदी और नवजात शिशुओं की मृत्यु दर में 20 फीसदी की कमी करना शामिल है। इसके लिए इन लाभार्थियों के घरों के आसपास का माहौल साफ सुथरा बनाने, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने के साथ ही महिलाओं और उनके परिवारों को शिशु जन्म को लेकर उनके व्यवहार में बदलाव की जागरुकता लाने पर जोर दिया गया। इस परियोजना का नतीजा यह हुआ कि नवजात शिशुओं की मृत्यु दर में 73 फीसदी की कमी आई और पिछले डेढ़ साल में बच्चे को जन्म देने वाली औरतों की मृत्यु दर्ज नहीं की गई है। नीति आयोग ने भी इसके काम की सराहना की है और इसने प्राथमिकता वाले चुनिंदा आदिवासी क्षेत्रों की वकालत भी की है। वैली के इस काम का हवाला देते हुए निर्णायक मंडल ने इसे एक ऐसी मिसाल के तौर पर पेश किया कि कैसे लगातार कोशिश करने से ऐसी दुरुह समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। 
 
सोशल एंटरप्राइज ऑफ दी इयर
नाज फाउंडेशन (इंडिया) ट्रस्ट: दि यंग 
पीपुल्स इनीशिएटिव 
संस्थापक: अंजलि गोपालन 
 
एक महत्त्वाकांक्षी एजेंडे के साथ नाज की स्थापना अंजलि गोपालन ने वर्ष 1994 में की थी। एचआईवी/एड्स से पीडि़त बच्चों और लोगों की देखभाल और मदद करने तथा एलजीबीटीक्यू समुदाय के सदस्यों को समाज में सम्मान और स्वीकार्यता दिलाने के मकसद से इसकी स्थापना की गई थी। उस वक्त यह कुछ उन चुनिंदा संगठनों में शामिल था जिसने उस समुदाय पर ध्यान दिया जिन्हें सामाजिक विकास कार्यक्रमों के लिहाज से सामान्यतौर पर हेय की दृष्टि से देखा जाता था। निर्णायक मंडल ने इस पहल की सराहना करते हुए इस पुरस्कार से नवाजा। दिल्ली और मुंबई के सरकारी और ट्रस्ट से संचालित होने वाले स्कूलों में इस संगठन ने किशोरियों को लक्षित किया लेकिन जल्द की इसने अपना दायरा चेन्नई, बेंगलूरु, जालंधर, नगापट्टिनम और मदुरै के कुछ हिस्सों में बढ़ा लिया। नाज फाउंडेशन में प्रोग्राम निदेशक कल्याणी सुब्रमण्यम का कहना है कि ज्यादातर लोगों ने इसकी शुरुआत के वक्त सोचा कि यह एक पागलपन वाला विचार है। उस वक्त खेलों के जरिये लड़कियों को यौन स्वास्थ्य से जुड़ी बातों के प्रति जागरुक बनाना उस वक्त सोच से परे था। सुब्रमण्यम कहती हैं कि इस समस्या को लेकर व्यग्रता का माहौल जरूर था। वह कहती हैं, 'हमने यह देखा कि 15-16 साल की लड़कियां प्रसव-पूर्व क्लिनिक में आती थीं और एचआईवी पॉजिटिव की जांच कराती थीं। निश्चित तौर पर हमारा संवाद पर्याप्त नहीं था।' ऐसे में नेटबॉल जैसे खेलों का इस्तेमाल यौन स्वास्थ्य के बारे में बात करने का जरिया बना। सुब्रमण्यम का कहना है कि इसका यह नतीजा हुआ कि एचआईवी रोकथाम कार्यक्रम महिलाओं के सशक्तिकरण की एक पहल बना गया। उन्होंने 70 लड़कियों के साथ शुरुआत की थी और अब 90,000 लड़कियां काम करती हैं। कई लड़कियां जो शुरुआत में इस कार्यक्रम का हिस्सा बनीं थीं वे अब कोच और टीम लीडर बन चुकी हैं। मुंबई और दिल्ली में ही 11,032 लड़कियों ने पूर्ण प्रशिक्षण में हिस्सा लिया और 39 सामुदायिक खेल कोच बन चुकी हैं।
 
सोशल एंटरप्रेन्योर ऑफ दी इयर अवॉर्ड (संयुक्त)
वेद आर्य, संस्थापक, सृजन
गीता धर्मराजन, संस्थापक, कथा
 
वेद आर्य ने अपना जीवन आईआईटी-आईआईएम की डिग्री से किया था। उन्हें पहली नौकरी टीसीएस में मिली। इसके बाद एफसी कोहली की अगुआई वाली प्रबंधन सलाहकार कंपनी में नौकरी मिली। उन्होंने डेढ़ साल में यह जानते हुए नौकरी छोड़ दी कि अगर वह कॉरपोरेट क्षेत्र में फिर से आना चाहेंगे तो उन्हें निश्चित रूप से नौकरी मिल जाएगी। वह कहते हैं कि मैं फिर कभी नहीं गया। मैं विकास के गांधीवादी मॉडल और ग्रामीण विकास की विभिन्न पहलों पर काम कर रहा था। उन्होंने 1997 में सृजन की स्थापना की। यह ग्रामीण विकास की पहल है, जो सरकार, नागरिक संगठनों, दानदाता एजेंसियों और निजी उद्यमों के सहयोग पर निर्भर है। सृजन एक हाइब्रिड संगठन है, जो एक सलाहकार कंपनी और जमीनी स्तर पर विकास एजेंसी के रूप में काम करता है। इसके मॉडल को दुनियाभर में विभिन्न संस्थानों ने अपनाया है। आर्य कहते हैं कि अगर कोई विकास एजेंसी का सरकार के साथ खराब संबंध हैं या उसके धन प्रदाताओं के साथ लेनदेन के संबंध हैं तो उनकी संस्था उसकी मदद नहीं करती है। वह कहते हैं कि अगर हर कोई लक्ष्य को प्राप्त करने की कोशिश करे तो समस्या खत्म हो जाएगी। गीता धर्मराजन ने पांच छात्रों और बिना पुस्तकों के 1988 में कथा की शुरुआत की थी। वह कहती हैं कि कई भाषाएं बच्चों के शिक्षण के लिए फायदेमंद नहीं बल्कि बाधा बन रही हैं। उन्होंने सबसे पहले बच्चों के लिए एक पत्रिका शुरू की, जिसका नाम तमाशा रखा गया। इसके बाद कथा की स्थापना की गई, जिसके बाद कथा लैब स्कूल विकसित किए गए। ये स्कूल उनके ट्रेडमार्क कहानी-अध्यापन पर काम करते हैं। 
 
धर्मराजन कहती हैं, 'इसे (कहानी के रूप में शिक्षण) गैर-परंपरागत माना जाता है, लेकिन हमारे शिक्षा प्रणाली में अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं।' उनका इस आसान धारणा पर आधारित है कि कहानियों से शिक्षण को रोचक बनाने में मदद मिलती है।  उनका मानना है कि कक्षा में रुचिकर माहौल तैयार करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि जब वह इसकी शुरुआत कर रही थीं, उस समय शिक्षा पर एक सरकारी सर्वेक्षण आया था। इसमें संकेत दिया गया था कि बच्चे स्कूल इसलिए नहीं छोड़ रहे हैं कि उनके माता-पिता उन्हें स्कूल भेजने का खर्च नहीं उठा सकते बल्कि इसकी वजह बच्चों को पढऩा रुचिकर नहीं लगता था। 
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