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परोपकार की मरीचिका

संपादकीय /  March 14, 2019

विप्रो के संस्थापक अजीम प्रेमजी का शिक्षा को समर्पित अपने ट्रस्ट को 21 अरब डॉलर दान में देने की घटना ने निश्चित रूप से भारत में परोपकारिता के मानकों को नई ऊंचाई दी है। देश की चौथी बड़ी सूचना प्रौद्योगिकी सेवा कंपनी विप्रो में अपने 34 फीसदी शेयरों से हुई आय को दान में देने का ऐलान प्रेमजी की तरफ से की गई ऐसी चौथी घोषणा है। इसके पहले वह वर्ष 2001, 2010 और 2013 में भी बड़ी रकम दान में दे चुके हैं। इस तरह भारत के सर्वाधिक समृद्ध लोगों में शामिल इस एकांतप्रिय अरबपति ने विप्रो के 67 फीसदी शेयरों को अपने चैरिटी फाउंडेशन के सुपुर्द कर दिया है। यह दान प्रेमजी को दुनिया के अग्रणी परोपकारी लोगों में शामिल करता है। वह शिव नाडर, किरण मजूमदार शॉ और नीलेकणी जैसे भारत के चुनिंदा परोपकारी उद्यमियों में भी मौजूद हैं। 

 
असल में, सलाहकार फर्म 'बेन ऐंड कंपनी' की भारत में परोपकारिता पर जारी नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक प्रेमजी की दानवीरता धर्मार्थ कार्यों के लिए दान देने के मामले में धनवान लोगों के खराब रिकॉर्ड को ही रेखांकित करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, निजी परोपकारिता फंडिंग में बेहद अमीर लोगों की हिस्सेदारी महज 55 फीसदी ही है और उसमें भी अकेले प्रेमजी का अंशदान 80 फीसदी है। अगर प्रेमजी की तरफ से दी गई राशि हटा दें तो अत्यधिक अमीर भारतीयों के दान में वित्त वर्ष 2013-14 से लेकर 2017-18 के दौरान 4 फीसदी की गिरावट ही आई है। यह आंकड़ा इस लिहाज से काफी अटपटा लगता है कि गत पांच वर्षों में बेहद अमीर भारतीयों की संख्या 12 फीसदी बढ़ी है और वर्ष 2022 तक उनकी संख्या और संंपत्ति दोनों के ही दोगुना होने की संभावना है। यह रिपोर्ट सतत विकास का एजेंडा 2030 पूरा करने के लिए घरेलू निजी क्षेत्र से अधिक फंड मिलने की जरूरत पर बल देती है। रिपोर्ट के मुताबिक, महज आर्थिक वृद्धि से भारत के मानव विकास संकेतकों को नहीं सुधारा जा सकता है। असल में, भारत का मानव विकास सूचकांक और सतत विकास लक्ष्य रैंकिंग पिछले चार वर्षों में शायद ही सुधरा है। निजी सहयोग से इन मानदंडों में सुधार लाना बड़ी चुनौती बना हुआ है। मौजूदा एवं पुरानी सरकारों ने गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) को विदेश से अनुदान मिलने पर पाबंदियां लगाकर विदेशी फंड को भी सीमित कर दिया है।
 
पिछली सरकार के समय वर्ष 2014 में लागू हुए कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) नियम के तहत एक निर्धारित सीमा से अधिक लाभ एवं कारोबार वाली कंपनी को अपने लाभ का 2 फीसदी हिस्सा सीएसआर कार्यों के लिए रखना अनिवार्य है। भुगतान नहीं करने पर जवाब देने की बाध्यता होने से कई समस्याएं भी पैदा हुई हैं। बेन का सर्वे बताता है कि सीएसआर फंड की 15 फीसदी राशि खर्च ही नहीं हो पाती है। इसी तरह सीएसआर के तहत संचालित कई कार्यक्रमों के विश्लेषण से पता चलता है कि एक ही ढर्रे पर चलने से उनका क्रियान्वयन भी ठीक से नहीं हो पाता है। इसके अलावा कराधान की भी समस्या है। सीएसआर मद में व्यय पर कर छूट का लाभ नहीं मिलने से कंपनियां कर छूट के दायरे में आने वाली संस्थाओं को दान देने के लिए प्रोत्साहित होती हैं। ऐसा होने से सीएसआर का असली मकसद ही पूरा नहीं हो पाता है। 
 
जहां तक व्यक्तिगत हैसियत से किए जाने वाले परोपकार का संबंध है तो रॉकफेलर के समय से ही अमेरिकी एवं यूरोपीय अरबपतियों का शानदार रिकॉर्ड रहा है लेकिन उसकी एक वजह भी रही है। इन देशों में अरबपति कारोबारी इस वजह से बड़ी राशि दान करते रहे हैं कि वहां पर उत्तराधिकारी को संपत्ति हस्तांतरित करने के लिए मोटा शुल्क लगता है। हालांकि भारत में उत्तराधिकार की संपत्ति पर शुल्क नहीं लगता है लेकिन चैरिटेबल ट्रस्ट को कर अवकाश का लाभ मिलता है। फिर भी इंडिया इंक के लिए प्रेमजी के नक्शे-कदम पर चल पाना काफी मुश्किल रहा है। 
Keyword: wipro, IT, ajim premji,,
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