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कड़वा सच

संपादकीय /  March 13, 2019

देश में किसी भी अन्य क्षेत्र को इतने अधिक राहत पैकेज नहीं मिले होंगे जितने कि चीनी उद्योग को मिले हैं। इसके बावजूद इस क्षेत्र की चिंताएं खत्म होने का नाम ही नहीं लेतीं। गन्ना कीमतों की बकाया राशि अब बढ़कर 20,000 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है। इससे भी यह बात साफ जाहिर होती है। स्पष्ट है कि या तो सरकार के हस्तक्षेप सही दिशा में नहीं हैं या फिर उद्योग जगत आर्थिक झटकों से निपटने के लिए पर्याप्त मजबूती हासिल नहीं कर पा रहा है। सरकार भी समय-समय पर ऐसे नीतिगत हस्तक्षेप करती है जो गलत मशविरे पर आधारित होते हैं और इन हस्तक्षेपों का समय भी सही नहीं होता। इसका असर उद्योग जगत की सेहत पर पड़ता है। मार्च महीने में जारी होने वाले चीनी के कोटे में भारी इजाफा इसका उदाहरण है।

इसके चलते पहले से कमतर बनी हुई चीनी कीमतों पर और अधिक दबाव आ गया है और पहले से वित्तीय तंगी से जूझ रही मिलों के सामने नकदी का नया संकट खड़ा हो गया है। चीनी उद्योग गन्ना किसानों को उनका बकाया चुकाने के लिए जो भी कदम उठा रहा है उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण हैं चीनी की बिक्री का आधारभूत मूल्य तय करना, गन्ना किसानों  को नकद सहायता प्रदान करना, चीनी मिलों को रियायती ऋण मुहैया कराना और चीनी निर्यात को अप्रत्यक्ष सब्सिडी प्रदान करना। यह काम आंतरिक परिवहन और माल भाड़ा लागत वहन करके किया जाता है। 

इनमें ताजातरीन पैकेज गत सप्ताह मंजूर किया गया जिसमें 15,500 करोड़ रुपये का ऋण शामिल है। इस ऋण पर 2,600 करोड़ रुपये का ब्याज अनुदान दिया जाना है। अहम बात यह है कि ये ऋण प्राथमिक तौर पर नए एथनॉल विनिर्माण संयंत्रों की स्थापना और डिस्टिलरीज तैयार करने के लिए है ताकि एथनॉल की उत्पादन क्षमता में वृद्घि की जा सके। इसका लक्ष्य है बी-हेवी शीरे और गन्ने के रस के इस्तेमाल से मुख्य उत्पाद चीनी के बजाय एथनॉल के उत्पादन को बढ़ावा देना।

राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति में पहले ही यह संशोधन किया जा चुका है जिससे गन्ने के रस से सीधे एथनॉल का उत्पादन किया जा सकता है और ऐसे अल्कोहल के लिए ऊंची कीमत पर भुगतान किया जा सकता है। गन्ने के रस से सीधे अल्कोहल बनाने के दीर्घकालिक प्रभाव वाकई चिंतित करने वाले हो सकते हैं। इससे पानी की भारी खपत वाली इस उपज को बढ़ावा मिल सकता है और यह पर्यावरण की दृष्टिï से दिक्कतदेह हो सकता है। हमारे देश में जमीन और पानी दोनों की कमी है। ऐसे में  देश की प्रमुख और सिंचित कृषि भूमि को गन्ने की खेती के लिए देना उचित नहीं होगा। 

कृषि आधारित ईंधन उत्पादन का एकमात्र व्यावहारिक विकल्प है अवशेष कृषि जैव ईंधन का प्रयोग। इसका अधिकांश हिस्सा अभी बेकार हो जाता है। इसके अलावा खेती के लिए बेकार जमीन पर ईंधन वाले पौधे भी रोपे जा सकते हैं। चीनी क्षेत्र की चिंताओं का स्थायी हल आधारभूत सुधारों में निहित है। इसके लिए इस क्षेत्र को पूरी तरह नियंत्रणमुक्त किया जाएगा। समय-समय पर कई विशेषज्ञ समितियां इस विषय में राय दे चुकी हैं। इनमें सबसे नई है अर्थशास्त्री सी रंगराजन की अध्यक्षता वाली समिति जिसने 2012 में कई उपयुक्त सुझाव दिए।

इसमें राजस्व साझेदारी आधारित मूल्य निर्धारण कर गन्ने की कीमत को चीनी से जोडऩे का सुझाव भी शामिल है। इससे इन दोनों फसलों का उत्पादन बाजार की मांग के अनुसार होगा और इस क्षेत्र का कोई अंशधारक परेशान नहीं होगा फिर चाहे वह गन्ना उत्पादक हो या चीनी उत्पादक या फिर उपभोक्ता। अभी भी रंगराजन समिति की रिपोर्ट लागू करने में बहुत देरी नहीं हुई है। उसे लागू करके इस उद्योग को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।

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