बिजनेस स्टैंडर्ड - सोशल मीडिया पर छद्म विज्ञापनों से निपटना बड़ी चुनौती
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सोशल मीडिया पर छद्म विज्ञापनों से निपटना बड़ी चुनौती

बीएस बातचीत
अरूप रॉयचौधरी और नेहा अलावधी /  03 13, 2019

बीएस बातचीत

चुनाव आयुक्त अशोक लवासा का मानना है कि आगामी चुनावों में चुनाव आयोग को अभिव्यक्ति की आजादी के मसले वाले छद्म (सरोगेट) विज्ञापन के मामलों से निपटना पड़ सकता है। अरूप रॉयचौधरी और नेहा अलावधी के साथ बातचीत में उन्होंने ईवीएम की विश्वसनीयता पर उठ रहे सवालों को पूरी तरह खारिज कर दिया। पेश है संपादित अंश:

छद्म विज्ञापन से आप किस तरह निपटेंगे? 

बिजनेस स्टैंडर्ड सोशल मीडिया पर छद्म विज्ञापनों से निपटना बड़ी चुनौतीइस तरह के विज्ञापन में तो कोई भी व्यक्ति या संगठन किसी दल से अपना संबंध घोषित न करते हुए भी उसके लिए सोशल मीडिया पर अभियान चला सकता है। ऐसे में आप लोगों को छद्म विज्ञापन से दूर रहने के लिए किस तरह रोक सकते हैं जिसमें अभिव्यक्ति की आजादी भी प्रभावित न हो।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने वायदा किया है और उन्हें उस पर खरा उतरना है। पहली, वे अपने स्तर पर निगरानी रखने वाले लोग रखेंगे। दूसरी, वे तथ्यों की पड़ताल के लिए अपने प्लेटफॉर्म पर टूल्स का इस्तेमाल करेंगे। तीसरा, किसी भी मामले में कोई शिकायत मिलने पर उन्हें फौरन हरकत में आना होगा और या तो उस सामग्री को प्लेटफॉर्म से हटाना होगा या फिर उनकी नीतियों एवं हमारे निर्देशों के हिसाब से जरूरी लगने वाले कदम उठाएंगे। चौथी बात यह है कि वे कोई भी ऐसा राजनीतिक विज्ञापन स्वीकार नहीं करेंगे जिसकी आयोग ने संस्तुति न की हो। 

हरेक राजनीतिक विज्ञापन के लिए एक पूर्व-प्रमाणन संख्या जारी होगी और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को गैर-राजनीतिक विज्ञापन अपलोड करने के पहले इस संख्या के बारे में संतुष्ट होना होगा। जहां तक औपचारिक राजनीतिक विज्ञापनों का सवाल है तो उसका व्यय संबंधित पार्टी या उम्मीदवार के चुनावी व्यय का हिस्सा माना जाएगा। अगर आपका किसी सोशल मीडिया पर अपना अकाउंट है तो आपको उस विज्ञापन को अपलोड करने से रोका जा सकता है जो पहले ही सोशल मीडिया पर प्रमाणित किया जा चुका हो। 

कोई भी नागरिक कह सकता है कि वह तो अभिव्यक्ति की आजादी के तहत किसी भी उम्मीदवार का समर्थन कर सकता है। ऐसे में आयोग का क्या रुख होगा?

यह बात तो है। चुनाव के दौरान सोशल मीडिया का नियमन करने वाले कानून के अभाव में ऐसा होता है। बंबई उच्च न्यायालय में यह मामला लंबित है। देखते हैं कि इस पर न्यायालय का क्या फैसला आता है?

ईवीएम की विश्वसनीयता पर काफी कुछ कहा जाता रहा है। इससे चुनाव आयोग भी सवालों के घेरे में आ जाता है। इस बारे में आपका क्या कहना है?

यह एक लोकतांत्रिक देश है लिहाजा लोग भी अपनी राय जाहिर करने के लिए आजाद हैं। मुझे नहीं लगता है कि अपनी स्वतंत्रता के बारे में बयान जारी करना चुनाव आयोग का काम है। हम नियमों के मुताबिक अपना काम कर रहे हैं। हमारी यह अपेक्षा है कि लोग जानकारी के आधार पर ही टिप्पणी करें और जमीनी हकीकत से परे न हों। ईवीएम दो दशकों से इस्तेमाल हो रही हैं। इस दौरान कई चुनाव ईवीएम से ही कराए गए हैं। अभी तक कोई भी व्यक्ति ईवीएम में छेड़छाड़ की बात साबित नहीं कर पाया है। देश भर में 30 से अधिक मामले अदालतों में गए हैं और सभी आरोपों पर अदालतों ने विचार किया है। इस दौरान तकनीकी विशेषज्ञों की मदद भी ली गई है। जिन मामलों में फैसला आ गया है, उनमें से किसी में भी अदालत ने ईवीएम को लेकर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की है। हां, ईवीएम संचालन में कुछ दिक्कतें हो सकती हैं।

लोग ईवीएम के बारे में कहां शिकायतें दर्ज करा सकते हैं? 

चुनाव आयोग ने शिकायत दर्ज कराने के लिए कई इंतजाम किए हुए हैं। चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी की शिकायत जिला निर्वाचन अधिकारी या आयोग की मीडिया प्रमाणन एवं निगरानी समिति (एमसीएमसी) से की जा सकती है। हरेक जिले में एमसीआरसी बनाई गई हैं और हमने हरेक समिति को एक सोशल मीडिया विशेषज्ञ रखने का निर्देश दिया है। वह समिति मिली शिकायत की प्रकृति और उसकी सामग्री पर गौर करेगी। इसने वादा किया है कि वे चुनाव अधिकारियों से शिकायत मिलने पर तत्काल कार्रवाई करेंगे। इसके अलावा सी-विजिल ऐप पर भी शिकायत की जा सकती है। 

लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार के लिए खर्च की सीमा 70 लाख रुपये तय की गई है जो अवास्तविक है। आयोग ऐसी पाबंदी कैसे लागू कर पाता है?

चुनाव आयोग इस सीमा का सख्ती से अनुपालन करा रहा है। अगर आप उम्मीदवारों की तरफ से दाखिल खर्च के ब्योरे देखें तो अधिकतर उम्मीदवार 60 फीसदी राशि ही दिखाते हैं। हम चुनावी खर्च पर निगरानी रखने वाले प्रेक्षक भी तैनात करते हैं। चुनाव प्रचार के दौरान रोजाना के खर्चों का ब्योरा रखना और उनका मिलान कराने के बारे में सख्त नियम हैं। चुनाव खत्म होने के बाद उम्मीदवार को अपने खर्च का ब्योरा देना होता है। अगर यह पता चलता है कि उम्मीदवार मतदाताओं को लुभाने या रेवडिय़ां बांटने के काम में लगा हुआ है तो आयोग के उडऩ दस्ते एवं निगरानी टीमें हरकत में आती हैं। खास तौर पर खर्च के लिहाज से संवेदनशील जगहों पर इन टीमों की तैनाती अधिक होती है। हम चुनावी खर्च पर नजर रखने के लिए 700 से अधिक व्यय प्रेक्षक तैनात करेंगे।

मतदान से 48 घंटे पहले प्रचार पर लगने वाली रोक क्या मंत्रियों और राजनीतिक दलों के सदस्यों के सोशल मीडिया अकाउंट पर भी लागू होंगे?

मतदान से 48 घंटे पहले प्रचार पर लगने वाली रोक सोशल मीडिया पर भी लागू होगी। किसी व्यक्ति के निजी अकाउंट से कही गई बात आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करती है तो उस पर भी कार्रवाई होगी। 

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