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कोहली-धोनी की सफल जोड़ी में छिपे हैं कॉर्पोरेट नेतृत्व के गुर

इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  March 12, 2019

क्रिकेट टीमों के कप्तान सीमित ओवरों के मैच में नाजुक हालत होने पर अमूमन 30 गज के दायरे के भीतर ही क्षेत्ररक्षण करना पसंद करते हैं। इससे उन्हें बदलते हालात के हिसाब से नियंत्रण रखने और गेंदबाजों एवं नजदीकी क्षेत्ररक्षकों को सलाह देने में आसानी होती है। लेकिन भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान इस बंधी-बंधाई लकीर से अलग जा चुके हैं। मैच-दर-मैच वह मुकाबले के अंतिम ओवरों के दौरान सीमारेखा के पास पहुंचे होते हैं। हालांकि इससे भी उन्हें दो फायदे होते हैं। पहला, अपने ताकतवर बाजुओं एवं टांगों का इस्तेमाल करते हुए वह तेजी से गेंद को विकेट की ओर थ्रो कर पाते हैं और दूसरा, इससे टीम के विकेटकीपर को गेंदबाजों को सही लेंथ पर गेंद डालने का सुझाव देने का मौका मिल जाता है। कोहली का तर्क बड़ा सरल है: अगर टीम में महेंद्र सिंह धोनी जैसी काबिलियत एवं विशाल अनुभव रखने वाला विकेटकीपर हो तो उसे स्टंप के पीछे रहते हुए गेंदबाजी के बारे में सबसे अच्छा नजारा मिलता है। वैसे भी मैदान के दूसरे छोर पर खड़ा होने पर भी कोहली और धोनी की आंखें एक-दूसरे के संपर्क में बनी रहती हैं। इस तरह कप्तान को भी विकेट के पास हो रही गतिविधियों के बारे में सबकुछ पता रहता है और बनाई जा रही रणनीति से भी वह परिचित रहता है। धोनी एवं कोहली के बीच के भरोसे, दोस्ती और एक-दूसरे के प्रति सम्मान भाव ने यह मिथक तोडऩे में मदद की है कि एक कप्तान को किसी राजा की तरह बरताव करना चाहिए अन्यथा उसे अपने दायित्व से भागने वाला मान लिया जाएगा।

 
लेकिन इस प्रचलित धारणा के उलट कोहली-धोनी की जोड़ी नेतृत्व का बेहतरीन नजारा पेश करती है। कोहली अपने क्रियाकलाप से एक बेहद आत्मविश्वासी नेता के तौर पर नजर आते हैं जिसे यह बखूबी पता है कि अपने साथी खिलाडिय़ों से सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कैसे कराया जाए और टीम का साझा मकसद हासिल करने में योगदान दिया जाए। कोहली ने कई मौकों पर यह साफ किया है कि वह सीमित ओवरों के क्रिकेट इतिहास के बेहतरीन कप्तानों में शुमार किए जाने वाले धोनी के अनुभव का लाभ उठाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। आखिर धोनी बेहद मुश्किल हालात में भी अपना संयम बनाए रखने की अनूठी काबिलियत रखते हैं। अपने तमाम साक्षात्कारों में कोहली ने यह माना है कि जब भी उन्हें जरूरत महसूस होती है वह धोनी की सलाह लेते हैं और 10 में से 9 बार उन्हें अपने पूर्व कप्तान से मिली सलाह सही ही साबित होती है। कोहली का मानना है कि टीम में धोनी जैसे अनुभवी खिलाड़ी की मौजूदगी अपने आप में एक वरदान है, खासकर उनकी कप्तानी के शुरुआती दिनों में। धोनी ने भी इसी अंदाज में अपने मौजूदा कप्तान की तारीफ करते हुए कोहली को 'पहले ही महानता का दर्जा' हासिल कर चुका खिलाड़ी बताते हुए कहा है कि वह खुद को चर्चा में आने से बचाने की कोशिश करते हैं क्योंकि इसके हकदार कप्तान होते हैं।  एक नेतृत्वकर्ता के लिए सबसे अहम बिंदु यह है कि अपनी टीम की नजरों में वह विश्वास से ओतप्रोत दिखे। एक नेता के लिए अपनी सबसे बड़ी ताकत दिखाने का मौका तब होता है जब वह अपने पूर्ववर्ती से बात करता है या बरताव करता है। महान नेताओं को कभी भी अपने से पहले उस पद पर रहे व्यक्ति से सलाह और प्रेरणा लेने में कभी कोई समस्या नहीं होती है। उन्हें कभी भी दूसरे की आलोचना करने की जरूरत नहीं पड़ती है क्योंकि वे खुद को लेकर आश्वस्त होते हैं। 
 
सच कहें तो लीजेंड का दर्जा हासिल कर चुके कप्तान या सीईओ से कमान संभालना सामान्य नेतृत्व की तुलना में कहीं अधिक जटिल प्रक्रिया है। कर्मचारी या खिलाड़ी इस बदलाव के बेमेल होने को लेकर चर्चा करेंगे और पुराने बॉस से नए बॉस की तुलना भी होगी। ऐसे में कोहली को श्रेय जाता है कि अपने प्रदर्शन से रोलमॉडल बन जाने के बावजूद कोहली ने धोनी को वह सम्मान दिया है जिसके वह हकदार हैं। दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही एक-दूसरे से काफी अलग मिजाज वाले शख्स हैं। जहां कोहली काफी आक्रामक नजर आते हैं वहीं धोनी भारत के सर्वाधिक शांत एवं संयमित कप्तानों में से एक रहे हैं। वैसे इससे कोई फर्क भी नहीं पड़ता है। ऐसा होना भी चाहिए। कोई बोर्ड नया अगुआ चुनते समय सबसे बड़ी यही गलती कर सकता है कि वह मशहूर सीईओ की नकल ही तलाशने लगे। ऐसा होना तो नामुमकिन ही है। किसी भी सूरत में, एक संगठन के लोग काफी समझदार होते हैं और अगर उन्हें यह लगा कि आप किसी और की नकल करने की कोशिश कर रहे हैं तो वे आपको धूर्त समझने लगेंगे।
 
कोहली का सबसे बड़ा नेतृत्व कौशल यह है कि उन्हें अपने पूर्ववर्ती से उनका सर्वश्रेष्ठ निकालने की कला आती है और वह धोनी के विदा होने के पहले उनसे सारी बारीकियां सीख लेना चाहते हैं। उन्हें मालूम है कि इसके लिए उन्हें अपने पूर्व कप्तान की छाया बनने की जरूरत नहीं है।  इस कहानी का सार बहुत सरल है। नेतृत्व को रिश्ते बनाने का तरीका पता होना चाहिए और उसे यह समझना चाहिए कि किसी समूह का समेकित आईक्यू किसी भी अकेले व्यक्ति के आईक्यू से वजनदार होगा और चाहे वह कितना भी समझदार हो उसे सबकुछ पता नहीं हो सकता है। जब सत्य नडेला ने माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ का दायित्व संभाला था तो उन्हें बखूबी मालूम था कि बिल गेट्स के सर्चलाइट इंटेलिजेंस का इस्तेमाल किस तरह करना है? गेट्स ने भी कंपनी की तरफ से लाए जाने वाले नए उत्पादों के बारे में विश्लेषणात्मक नजरिया देकर नडेला की चाहत पूरी की। नडेला ने यह भी कहा कि वह कर्मचारियों को उत्साहित करने की गेट्स की खासियत का भी फायदा उठाना चाहते हैं। आप नडेला की जगह कोहली को रखें और गेट्स के स्थान पर धोनी को रखकर देखें तो आपको पता चल जाएगा कि मौजूदा भारतीय क्रिकेट टीम चैंपियन क्यों है?
Keyword: IPL, cricket, kohli, dhoni,,
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