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लोकसभा चुनावों से बढ़ सकती है रियल्टी में खपत

निवेदिता मुखर्जी, विवेट सुजन पिंटो और शैली सेठ मोहिले /  03 11, 2019

चुनाव बनाम रियल एस्टेट

चुनावों से चार से छह सप्ताह पहले प्रॉपर्टी बाजार में गतिविधियां तेज होती हैं क्योंकि नेता रियल एस्टेट में लगे पैसे निकालने लगते हैं
2014 में पिछले चुनावों में 5,45,000 रियल एस्टेट इकाइयों को शुरू किया गया था जो संख्या उससे पिछले साल 4,60,000 थीं
2019 में चुनाव से पहले या बाद में किसी बड़ी परियोजना के शुरू होने की उम्मीद नहीं है
राजनीतिक दलों के इन चुनावों में करीब 50,000 करोड़ रुपये खर्च करने की संभावना है
अगर इस साल राजनेताओं ने रियल एस्टेट क्षेत्र से पैसा निकाला तो इस सेक्टर की स्थिति बद से बदतर हो जाएगी

बिजनेस स्टैंडर्ड लोकसभा चुनावों से बढ़ सकती है रियल्टी में खपतरियल एस्टेट और भारतीय चुनावों का कई वर्षों से चोली दामन का साथ रहा है। लेकिन 2019 के लोक सभा चुनाव इस मायने में अलग होंगे। इसका दुनिया का सबसे महंगे चुनावों में शुमार किया जा रहा है जिसमें राजनीतिक दलों के करीब 50,000 करोड़ रुपये खर्च करने की संभावना है। अमूमन चुनावों से चार से छह सप्ताह पहले रियल एस्टेट बाजार में गतिविधियां तेज हो जाती हैं क्योंकि राजनेता इस क्षेत्र में लगे अपने पैसों को निकालना शुरू कर देते हैं। लेकिन इस बार अभी तक रियल एस्टेट क्षेत्र में खामोशी है।

अलबत्ता इसका मतलब यह नहीं है कि आगामी चुनावों का देश की अर्थव्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। कार्नेगी एनडॉउमेंट फॉर इंटरनैशनल पीस में दक्षिण एशिया प्रोग्राम के निदेशक एवं सीनियर फेलो मिलन वैष्णव कहते हैं, 'मुझे उम्मीद है कि चुनाव आर्थिक उत्प्रेरक का काम करेंगे क्योंकि पार्टियां और उम्मीदवार अपनी जेब खोलेंगे और विज्ञापनों, उपभोक्ता सामान, जनसभाओं और प्रचार पर जमकर खर्च करेंगे।'

भारतीय चुनावों पर नजर रखने वाले वैष्णव ने कहा कि मार्च से मई 2019 के दौरान थोड़े समय के लिए खपत के कारण अर्थव्यवस्था में तेजी आ सकती है जबकि रियल एस्टेट में गिरावट की आशंका है। वह इसकी वजह बताते हैं। उन्होंने कहा, 'हमारे शोध में देवेश कपूर और मैंने पाया कि निर्माण गतिविधियों का पैमाना माने जाने वाली सीमेंट की खपत में चुनाव के दिनों में भारी गिरावट आती है क्योंकि इस क्षेत्र में अतिरिक्त नकदी को चुनाव प्रचार की तरफ मोड़ दिया जाता है। यह प्रभाव थोड़े समय रहता है लेकिन ऐसा होना लाजमी है क्योंकि रियल एस्टेट/निर्माण क्षेत्र  को राजनीति के लिए फंड का मुख्य स्रोत माना जाता है।'

एनारॉक प्रॉपर्टी कंसल्टेंट्स की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक रियल्टी में दबाव की वजह यह है कि चुनावों से पहने इस क्षेत्र में गतिविधियां ठप हो गई हैं। रिपोर्ट में कहा गया है, 'यह बात किसी से छिपी नहीं है कि पहले ऐसा होता था कि राजनीतिक दल रियल एस्टेट में जो पैसा लगाते थे, उसे चुनाव के दौरान निकालकर प्रचार में झोंका जाता था। इस समय रियल्टी बाजार गंभीर नकदी संकट से गुजर रहा है।'

एनारॉक प्रॉपर्टी कंसल्टेंट्स के चेयरमैन अनुज पुरी ने कहा कि पहले के वर्षों में जब राजनीतिक दल रियल एस्टेट में लगे पैसों को चुनाव प्रचार के लिए निकालते थे तो इस क्षेत्र में बड़ा नकदी संकट नहीं होता था। उन्होंने कहा, 'इस समय नकदी संकट एक बहुत बड़ी चिंता है और ऐसे में अगरचुनावों में रियल एस्टेट से फंड निकाला गया तो इससे बाजार की स्थिति और बदतर हो जाएगी।' पुरी ने कहा कि मकान खरीदारों तगड़ा मोलभाव कर सकते हैं क्योंकि नकदी की कमी से जूझ रहे डेवलपरों के पास बड़ी संख्या में अनबिके फ्लैट हैं। 

जहां तक कुल खपत की बात है तो डाबर के मुख्य कार्याधिकारी सुनील दुग्गल कहते हैं कि चुनावों से मांग बढ़ती है। उन्होंने कहा, 'चुनावों के दौरान नकदी बढऩे से खपत में तेजी आती है। लेकिन इस बार इसमें कुछ देरी हो सकती है क्योंकि कुछ मामलों में कल्याणकारी उपायों (जैसे पीएम-किसान योजना) की शुरुआत पिछले महीने ही हुई थी।' बजाज कॉर्प के प्रबंध निदेशक सुमित मल्होत्रा ने कहा कि इन योजनाओं से मांग बढ़ाने में मदद मिल सकती है। उन्होंने कहा, 'कल्याणकारी योजनाओं से किसानों को जो पैसे मिल रहे हैं उसका एक हिस्सा वे टिकाऊ उपभोक्ता सामान और मोटरसाइकिल खरीदने पर खर्च करेंगे। अगर उन्हें सरकार की तरफ से मदद नहीं मिलती तो वे आसानी से यह खरीदारी नहीं करते।'

चुनावों से प्रभावित होने वाला एक अन्य क्षेत्र वाहन उद्योग है। लेकिन वहां भी इस बार मिलाजुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। मारुति सुजूकी इंडिया के चेयरमैन आर सी भार्गव ने हाल में एक बातचीत में कहा था कि पहले कई बार ऐसा हुआ है कि जब चुनाव से पहले साल बिक्री की रफ्तार धीमी रहती थी और फिर चुनावी वर्ष में तेजी से बढ़ती थी।

एसबीआईकैप सिक्योरिटीज के खुदरा शोध प्रमुख महतेंश सबराद का मानना है कि समय गुजरने के साथ चुनाव और वाहनों की बिक्री में पारस्परिक संबंध कमजोर हुए हैं। उन्होंने कहा, 'पहले चुनावों में यूटिलिटी वाहनों की अच्छी बिक्री होती थी क्योंकि कोई भी गंभीर उम्मीदवार अपने प्रचार में इनका इस्तेमाल जरूर करता था। अलबत्ता अब यह प्रवृत्ति बदल गई है क्योंकि प्रचार के लिए बजट का एक बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया को आवंटित किया जा रहा है।'

लेकिन विश्लेषक चुनाव और वाहनों की बिक्री के बीच संबंध पर पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। इक्रा रेटिंग्स की शोध इकाई में वरिष्ठï समूह उपाध्यक्ष सुब्रत रे कहते हैं कि चुनावों के दौरान छोटे वाणिज्यिक वाहनों की बिक्री में मामूली बढ़ोतरी हो सकती है क्योंकि लोगों की आवाजाही के लिए उन्हें खरीदा जा सकता है लेकिन निजी वाहन क्षेत्र पर इसका सबसे कम असर नहीं होगा। अलबत्ता कस्बों और छोटे शहरों में खरीदार चुनावों तक खरीदारी टाल सकते हैं क्योंकि कई ऐसे भी मौके आए हैं जब वाहनों को जबरदस्ती उठा लिया गया और चुनावों में इस्तेमाल किया गया। खपत के संदर्भ में हायर एप्लायंसेज इंडिया के अध्यक्ष एरिक ब्रेगेंजा ने कहा कि एक महीने में तस्वीर साफ हो जानी चाहिए। उत्तरी राज्यों में मौसम का थोड़ा बहुत असर देखने को मिला है। ब्रेगेंजा ने कहा, 'अप्रैल में चीजें साफ होंगी। गर्मियां शुरू होने के बाद लोगों की जेब से पैसा निकलना शुरू हो सकता है।'

होटल एग्रीगेटर ओयो का रुख आशावादी है। ओयो के प्रवक्ता ने कहा, 'देश के विभिन्न हिस्सों में बड़ी चुनावी जनसभाओं के दौरान सर्च और बुकिंग में भारी तेजी देखने को मिलती है।' लेकिन इस बार ऐसी धारणा है कि नोटबंदी के बाद से एजेंसियों की नकदी लेनदेन पर कड़ी नजर है। साथ ही पार्टी के चुनावी खर्च पर चुनाव आयोग की सख्ती और रियल एस्टेट तथा बैंकिंग जैसे कारोबार में दबाव के कारण चुनावी अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी है। 
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