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पीएफ पर अदालती फैसले से वेतन को झटका!

आशिष आर्यन /  March 11, 2019

उच्चतम न्यायालय ने कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) में योगदान की गणण्ना करने में कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) की 'मूल वेतन' की परिभाषा को सही ठहराया है। शीर्ष न्यायालय ने हाल में कहा कि कर्मचारियों को मिलने वाले कुछ अन्य भत्तों (जैसे विशेष भत्ते) को भी मूल वेतन का हिस्सा माना जाएगा। भत्तों को मिलाने का मतलब है कि कर्मचारी का मूल वेतन अब बढ़ जाएगा और इसके परिणामस्वरूप नियोक्ता और कर्मचारी दोनों का ईपीएफ योगदान बढ़ जाएगा। 

लेकिन उच्चतम न्यायालय के फैसले से सभी वेतनभोगी कर्मचारियों पर असर नहीं पड़ेगा। पीडब्ल्यूसी में पार्टनर और लीडर (पर्सनल टैक्स) कुलदीप कुमार कहते हैं, 'इससे दो तरह के कर्मचारी प्रभावित होंगे। पहले वे जिनका मूल वेतन 15,000 रुपये तक है और दूसरे अंतरराष्ट्रीय कामगार।' लॉ फर्म एलऐंडएल पार्टनर्स में पार्टनर विलियम विवियन जॉन ने कहा, 'अन्य रोजगार कानूनों में मूल वेतन में कटौती के फॉर्मूले के कर्मचारियों के लिए अलग-अलग मायने हो सकते हैं। कंपनियों को इस पर गहराई से विचार करना होगा और इसके प्रभावों की समीक्षा करनी होगी।'

ईपीएफओ के नियमों के मुताबिक ईपीएफ में कर्मचारी और नियोक्ता का योगदान बराबर होना चाहिए जो मूल वेतन के 12 फीसदी के बराबर है। लेकिन अगर कर्मचारी का मूल वेतन प्रतिमाह 15,000 रुपये से अधिक है तो नियोक्ता अपने और कर्मचारी के योगदान को 1,800 रुपये पर सीमित कर सकता है जो 15,000 रुपये का 12 फीसदी है। यह कंपनी पर निर्भर करता है कि वह 1,800 रुपये से अधिक योगदान करना चाहती है या नहीं। ईवाई इंडिया के टैक्स डायरेक्टर (पीपल एडवाइजरी सर्विसेज) पुनीत गुप्ता ने कहा, 'इसके कारण कुछ वेतनभोगी कर्मचारियों पर प्रभाव पड़ सकता है और जिनका मूल वेतन 15,000 रुपये से अधिक है उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा।'

अभी मूल वेतन में क्या-क्या शामिल है, यह तय करने के लिए उच्चतम न्यायालय ने कुछ शर्तें निर्धारित की हैं। उन्हीं में यह मसला था कि भत्तों को मूल वेतन में शामिल किया जाए या नहीं। न्यायालय के मुताबिक सभी कर्मचारियों या कुछ कर्मचारियों को मिलने वाले भत्ते मूल वेतन का हिस्सा माने जा सकते हैं। वेरिएबल पे या प्रोत्साहन राशि को मूल वेतन नहीं माना जाएगा। किसी कर्मचारी के कामकाज से जुड़े भत्तों को मूल वेतन नहीं माना जाएगा।

उदाहरण के लिए नियोक्ता हर कर्मचारी को टेलीफोन भत्ता देता है लेकिन यह राशि अलग-अलग होती है। कर विशेषज्ञों ने कहा कि इसे मूल वेतन में शामिल किया जाएगा। यह वेरिएबल भत्ता नहीं है बल्कि हर महीने मिलने वाली निर्धारित राशि है। इसका मतलब यह है कि यह कोई प्रोत्साहन नहीं है और हर महीने कर्मचारी को मिलता है। 

वेतन पर असर

आपके वेतन पर इसका असर का अनुमान लगाने के लिए पहले आपको उच्चतम न्यायालय के फैसले को विस्तार से जानने की जरूरत है। ईपीएफ में योगदान को कम रखने के लिए नियोक्ता मूल वेतन को सीमित रखते हैं। इसके बाद वे वेतन में अन्य भत्तों को जोड़ते हैं। अगर कोई व्यक्ति प्रतिमाह 25,000 रुपये कमाता है तो उसका वेतन पैकेज इस प्रकार हो सकता है- मूल वेतन 6,000 रुपये, विशेष भत्ता 9,000 रुपये और बाकी भत्ते। इनमें मोबाइल बिल प्रतिपूर्ति, आवास भत्ता और यात्रा भत्ता शामिल है। ऐसे में नियोक्ता को ईपीएफ के रूप में केवल 720 रुपये का योगदान देना होता है।

उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद नियोक्ता को भत्तों को मूल वेतन में शामिल करना होगा और हर महीने ईपीएफ में कम से कम 1,800 रुपये का योगदान करना होगा। क्लियरटैक्स के संस्थापक और मुख्य कार्याधिकारी अर्चित गुप्ता कहते हैं, 'किसी वेतनभोगी कर्मचारी के लिए इसका मतलब यह है कि ईपीएफ में उसका योगदान बढ़ेगा लेकिन हाथ में कम वेतन आएगा।' कई नियोक्ताओं के कर्मचारियों का मूल वेतन अगर 15,000 रुपये से अधिक होता है तो वे ईपीएफ में 1,800 रुपये की न्यूनतम सीमा से अधिक योगदान करते हैं। कर विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी शर्तों का अनुबंध में उल्लेख होता है और नियोक्ता अनुबंध की समयावधि समाप्त होने से पहले इन शर्तों में बदलाव नहीं कर सकते हैं। तो क्या कंपनियों को अनुबंध की शर्तों के मुताबिक ईपीएफ में अपना योगदान बढ़ाने की जरूरत होगी? ऐसे मामलों में उच्चतम न्यायालय के फैसले के मुताबिक मूल वेतन में भी बढ़ोतरी होगी। कर विशेषज्ञों के अनुसार कई ऐसे मामले हैं जिनमें अदालतों ने व्यवस्था दी है कि नियोक्ताओं को अपना योगदान बढ़ाने की जरूरत नहीं है क्योंकि यह उनके विवेक पर निर्भर करता है।

अंतरराष्ट्रीय कामगार पर प्रभाव

घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कामगारों के लिए ईपीएफ के नियम अलग-अलग हैं। अंतरराष्ट्रीय कामगारों के लिए 15,000 रुपये की न्यूनतम सीमा नहीं है। नियोक्ता को अनिवार्य रूप से मूल वेतन का 12 फीसदी ईपीएफ में देना होता है। अगर विदेश में काम करने वाले किसी कामगार का मूल वेतन एक लाख रुपये है, उसे एक लाख रुपये विशेष भत्ता और दो लाख रुपये अन्य भत्ते मिलते हैं। ऐसी स्थिति में नियोक्ता को मूल वेतन का 12 फीसदी ईपीएफ में देना होता था। अब नियोक्ता और कर्मचारी दोनों पर ईपीएफ का बोझ बहुत बढ़ जाएगा।

उच्चतम न्यायालय ने पाया कि ऐसे कोई आंकड़े नहीं थे जिनसे साबित हो कि कर्मचारियों को दी जाने वाली अतिरिक्त राशि ज्यादा कामकाज के एवज में दी गई थी। ईपीएफओ ने मौजूदा व्यवस्थाओं को चुनौती दी थी जिनके तहत विशेष भत्ते महंगाई भत्तों का हिस्सा थी जो अपने आप में मूल वेतन का हिस्सा है। दो न्यायाधीशों के पीठ ने ईपीएफओ के तर्क को सही ठहराया और कहा कि मूल वेतन के अलावा जो भी प्रोत्साहन राशि दी जा रही है उसका सीधा संबंध कर्मचारी द्वारा किए गए अतिरिक्त काम से होना चाहिए। लक्ष्मीकुमारन ऐंड श्रीधरन के कार्यकारी पार्टनर पुनीत दत्त त्यागी के मुताबिक अदालत के फैसले ने पिछले फैसलों से पैदा हुए भ्रम को दूर कर दिया है।
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