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नारेबाजी से व्यवस्था सृजन तक का सफर है कठिन

कनिका दत्ता /  March 11, 2019

सरकारी नियंत्रण वाली विमानन कंपनी एयर इंडिया का घाटा 50,000 करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है और उस पर कर्ज भी बढ़कर 48,000 करोड़ रुपये से आगे जा चुका है। इसकी वित्तीय स्थिति इतनी खतरनाक हो चुकी है कि पिछले साल बिक्री के लिए रखे जाने पर भी कोई निजी खरीदार 76 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने के लिए आगे नहीं आया। 

ऐसी स्थिति में कोई भी यही सोचेगा कि इस अति-प्रतिस्पद्र्धी बाजार में बने रहने के लिए इस कंपनी को लागत में अधिक-से-अधिक कटौती पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। लेकिन लगता है कि इसके मालिक और प्रबंधन की चिंता कुछ और ही है। उसे यह फिक्र है कि उसके कर्मचारी एक खास तरह से देशभक्ति का प्रदर्शन करें।

गत 5 मार्च को परिचालन निदेशक की तरफ से जारी परामर्श में कहा गया है कि 'तत्काल प्रभाव से स्टाफ को हरेक उद्घोषणा के थोड़े अंतराल के बाद पूरे जोश से जय हिंद कहना होगा'। अधिकारियों ने एयरलाइन की तरफ से जारी इस परामर्श को देश के मौजूदा मिजाज के मुताबिक बताया है। ऐसे में अचरज नहीं है कि इसे लेकर सोशल मीडिया पर चुटकुलों की बाढ़ आ गई। मसलन, सफर के दौरान बीच आसमान में कोई समस्या होने पर कैबिन क्रू क्या कहेगा? यह खबर बीबीसी को भी इतनी विचित्र लगी कि उसने बालाकोट हवाई हमले के बाद उभरे राष्ट्रवाद से जोड़ते हुए अपनी वेबसाइट पर एक खबर भी जारी कर दी।

यह अंदाजा लगाना आसान है कि यह आदेश कहां से और क्यों आया? लेकिन शायद रायसीना हिल्स में बैठे राष्ट्रवादी पुरोधा इस पर थोड़ा ठहरकर गौर करना चाहें। नारेबाजी से लेकर व्यवस्था स्थापना तक का इतिहास कोई सुखद नहीं है। एयर इंडिया ने मुंबई स्थित अपनी इमारत के लिए केवल केंद्र सरकार की इकाइयों से ही बोली मांगी है।

जरा फौरी कॉर्पोरेट रिकॉर्ड पर नजर डालते हैं। वित्तीय सेवाओं से लेकर आतिथ्य सत्कार में सक्रिय सहारा समूह 1990 के दशक के आखिरी और 2000 के दशक के शुरुआती वर्षों में अपने चरम पर था। एक बार इसने भारतीय क्रिकेट टीम को प्रायोजित कर यह संकेत देने की कोशिश की थी कि वह भारतीय कारोबारी ढांचे में बड़ी हैसियत हासिल कर चुका है। शायद 2000 के शुरुआती दशक में सहारा प्रबंधन ने अपने कर्मचारियों को 'गुड सहारा' कहकर एक-दूसरे का अभिवादन करने का निर्देश दिया था। इसके साथ ही उन्हें अमेरिकी शैली में सीने पर हाथ भी रखने को कहा गया था। यह रिकॉर्ड में नहीं है कि कर्मचारियों ने प्रबंधन के इस आदेश का असल में पालन किया था या नहीं। लेकिन सहारा एयरलाइंस के पूर्व अधिकारी परवेज दमानिया ने बिज़नेस स्टैंडर्ड के एक सहकर्मी के साथ बातचीत में थोड़ा सकुचाते हुए इस पर मुहर लगाई थी। दमानिया ने कहा था कि उन्हें इसी अंदाज में अपने सहकर्मियों का अभिवादन करना पड़ता था।

लेकिन अब हमें बखूबी पता है कि कर्मचारियों के ऐसे जोशीले अभिवादन भी सहारा के संस्थापक सुब्रत रॉय को नियामकीय अड़चनों में फंसने के बाद एशिया की सबसे बड़ी जेल तिहाड़ जाने से नहीं रोक पाए।

एक खास तरह के नेता के लिए ऐसी नारेबाजी पीछे-पीछे चलने एवं समर्थन का भ्रम पैदा करती है। एडॉल्फ हिटलर से बेहतर इसे कौन समझ सकता है? हिटलर ने जर्मनी की ताकत का अपने लोगों के साथ इस तरह समायोजन किया कि असली नाज़ी अभिवादन 'सीज हेल' की जगह 'हेल हिटलर' ने ले ली थी। उन्हें रोमन शैली में अपने दाहिने हाथ को मोड़ते हुए सीने पर भी रखना पड़ता था। यह सरकारी कर्मचारियों के बीच आपसी अभिवादन का अनिवार्य तरीका था। इस निर्देश को लागू कराने के लिए कई सुरक्षा एजेंसियां भी लगी होती थीं। हालांकि सेनाओं के लिए इस तरह का अभिवादन अनिवार्य नहीं किया गया था।

 

खुद हिटलर ने भी इस पूरे मामले को काफी गंभीरता से लिया था। कहा जाता है कि हिटलर ने पार्टी रैलियों और सैन्य परेड के दौरान ऐसे अभिवादन स्वीकार करने के लिए खुद को तैयार करने के वास्ते अपने दाएं हाथ और कंधे को कसरत से मजबूत बनाने की कोशिश की थी। देर तक एक ही मुद्रा में खड़े रहने से उसके अनुयायियों की नजरों में उसकी प्रतिष्ठा काफी बढ़ गई। बाकी कार्यक्रमों में वह हाथ हिलाकर ही अभिवादन किया करता था। 

हिटलर का सैल्यूट उसके यूरोपीय दुश्मनों के बीच हंसी-मजाक का विषय बना रहा। ब्रिटेन में जर्मनी के राजदूत जोएकिम वॉन रिबनट्रॉप अपने फ्यूरर की शक्ति का भोंडा प्रदर्शन के चलते कई बार हंसी का विषय बने थे। जब रिबनट्रॉप ने ब्रिटिश सम्राट का अभिवादन हिटलर सैल्यूट से किया तो अखबारों में उनकी काफी आलोचना की गई थी।

 

हालांकि 1943 आने तक 'हेल हिटलर' कैदी वेरमाख सैनिकों के बीच क्रांतिकारी संकेतार्थ रखने लगा। रेड आर्मी ने स्टालिनग्राद शहर के पास वोल्गा नदी के बर्फीले दायरे में उन्हें घेर रखा था। जब हिटलर के इन सैनिकों को सोवियत सेना ने कब्जे में लिया तो वे गहरी निराशा के बीच यही उद्घोष करते थे। उनमें से अधिकतर सैनिक कभी भी अपने घर नहीं लौट पाए। स्टालिनग्राद की यह लड़ाई ही जर्मन सेना के पतन की शुरुआत साबित हुई।

देशभक्ति और राष्ट्रवाद के बीच की रेखा काफी बारीक है। जॉर्ज ऑरवेल ने देशभक्ति को जीवन शैली की प्रशंसा के तौर पर परिभाषित किया है जिसमें एक खास तरह के मूल्यों एवं विश्वास के प्रति निष्ठा जताई जाती है। ऑरवेल कहते हैं कि राष्ट्रवाद की जड़ें प्रतिद्वंद्विता और असंतोष में समाई होती हैं और यह शांति का दुश्मन है। भारत की आर्थिक वृद्धि की रफ्तार सुस्त होने, बेरोजगारी बढऩे और निर्यात की स्थिति डांवाडोल होने से उस सोच पर अचरज होना स्वाभाविक है कि एयर इंडिया के कर्मचारियों को मातृभूमि का उद्घोष करने के लिए कहा गया।
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