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पाकिस्तान के साथ शांति की लंबी राह

शेखर गुप्ता /  March 11, 2019

कितने आदमी थे? यह सवाल सन 1975 में आई रमेश सिप्पी की फिल्म शोले में हिंदी सिनेमा के सबसे भयंकर लेकिन सबसे अधिक पसंद किए जाने वाले खलनायक गब्बर सिंह ने अपने उन आदमियों से पूछा था जो मार खाकर लौटे थे। मैं इस बात का प्रयोग पिछले दिनों पाकिस्तान और भारत के बीच छिड़ी 90 घंटे की 'जंग' के संदर्भ में क्यों कर रहा हूं या कहें तो 27 फरवरी के बाद हमारे राजनीतिक-रणनीतिक विमर्श का चीजों का जिस तरह 'गब्बरीकरण' हो गया है, उस लिहाज से मुझे यही उपमा सही लगती है।

ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे समक्ष तीन ही सवाल बचे हैं: हमारे बम या मिसाइल जैश के ठिकाने को निशाना बना सके या नहीं? अगर उनका निशाना सही था तो क्या लोग मारे भी गए (कितने आदमी थे) तीसरा: क्या वायुसेना के विमान ने पाकिस्तान वायु सेना के एफ-16 विमान को मार गिराया? ये तीनों सवाल असली मुद्दे से कोसों दूर हैं। हमने दो सप्ताह पहले लिखा था कि बदला बुद्धिमानी भरी कार्रवाई नहीं है। बदला मूर्ख लेते हैं, समझदार व्यक्ति भयभीत करने, प्रतिरोध और प्रतिकार करने का सहारा लेते हैं। ये तीनों सवाल बदले की मानसिकता को दर्शाते हैं जो भारत जैसे विशाल, शक्तिशाली देश के लिए खेद की बात है। यही कारण है कि हम इसे 'गब्बरीकरण' कह रहे हैं।

तालियां बजाती भीड़ के सामने वाहवाही लूटते प्रधानमंत्री ने स्वयं वाहवाही लूट कर इसे बढ़ावा दिया है। उन्होंने कहा कि बदले के लिए ज्यादा प्रतीक्षा करना उनके स्वभाव में नहीं है। यह सामरिक प्रतिक्रिया का खतरनाक राजनीतिकरण है। सेना चाहती है कि वह शत्रु को चौंका सके। वह यह नहीं चाहती कि वह आसानी से उसके कदमों के बारे में अनुमान लगा ले। 

दूसरी बात, यह इस बात की स्वीकारोक्ति भी हो सकती है कि आपको शायद नहीं लगता कि आप इतने ठोस कदम उठा सके हैं जो पाकिस्तान को रोक सकें। हो सकता है मैं इन बातों की समझ को लेकर अतिवादी हो रहा हूं लेकिन इससे आपके विकल्प सीमित होते हैं।

दूसरी ओर अगर प्रधानमंत्री को लगता है कि हालिया हमलों से प्रतिकार के लिए जरूरी प्रभाव उत्पन्न नहीं हुआ है तो भारतीय उपमहाद्वीप को एक नव सामान्य की तैयारी करनी होगी जो भारत के लिए सर्वश्रेष्ठ हालात से अलग होगा। आतंक-प्रतिकार-उकसावे और फिर कमी का चक्र नियंत्रण रेखा के इर्दगिर्द हो रहे खूनखराबे से थोड़ा अधिक है लेकिन उससे अलग नहीं। एकमात्र अंतर यह है कि छोटे हथियारों, मोर्टार, स्नाइपर राइफल और कमांडो चाकुओं के स्थान पर लड़ाकू विमानों और स्मार्ट हथियारों का इस्तेमाल किया जाएगा। यह बात सैन्य रुख रखने वालों और किशोरों के लिए उत्साह बढ़ाने वाली बात हो सकती है लेकिन बदकिस्मती से यह अगर पराजय नहीं तो भी रणनीतिक समझौता तो है। लेफ्टिनेंट जनरल एच एस पनाग (सेवानिवृत्त) ने भी अपने एक समझदारी भरे और साहसी लेख में यही बात कही है।

अब बात करते हैं सकारात्मक पहलुओं की। पंजाब (1981) और कश्मीर (1989) में पाकिस्तान नियंत्रित आतंकवाद की शुरुआत के बाद पहली बार भारत ने अपनी सहिष्णुता की एक रेखा तय की। अतीत में पुलवामा से भी अधिक बड़े उकसावों मसलन संसद पर हमला और 26/11 के हमलों का कोई प्रतिकार नहीं किया गया। भारत की प्रतिक्रिया के बारे में सबको अंदाजा हो चुका था और इसे लेकर एक तरह की ऊब उत्पन्न होने लगी थी। अब प्रत्यक्ष प्रतिकार ही तार्किक विकल्प था। बालाकोट से पाकिस्तान को तीन महत्त्वपूर्ण संदेश दिए गए:

- सहिष्णुता की एक सीमा है, जिसे पार करने पर भारत पाकिस्तान की जमीन पर काफी अंदर तक जाकर मार करेगा, भले ही बात कितनी भी बढ़ जाए। उस दृष्टि से देखें तो पाकिस्तान की परमाणु शक्ति होने की धमकी बेमानी हो चुकी है। यह समाप्त नहीं हुआ है लेकिन पाकिस्तान का सामना अब एक नई हकीकत से है।

- यह कि भारत के पास यह शक्ति है कि वह ऐसी जवाबी कार्रवाई कर सके और पूरी गोपनीयता बरत सके।

- तीसरी बात, दुनिया की तमाम प्रमुख शक्तियां अब यह स्वीकार करती हैं कि भारत के पास विरोध करने का अधिकार है। इसके साथ ही भारत से यह अपेक्षा भी की जाती है कि वह जवाबदेही का परिचय देगा और ऐसे किसी चक्र में नहीं फंसेगा।

इस बार कुछ ऐसा ही हुआ है। परंतु हमें नकारात्मक पहलुओं का भी ध्यान रखना होगा। इसे भी तीन उदाहरणों से समझते हैं: 

- हमला, जवाबी हमला और भारतीय प्रतिक्रिया ने पारंपरिक लड़ाई में भारत और पाकिस्तान के बीच की असमानता को उजागर कर दिया। तकनीक, हथियारों और क्षमताओं की बात करें तो दोनों पक्ष लगभग बराबरी पर हैं। परंतु अगर तनातनी लंबी चली तो भारत का पलड़ा भारी है। संक्षेप में भारत को पाकिस्तान पर बढ़त हासिल है लेकिन पाकिस्तान को दंडित करने की क्षमता उसके पास नहीं है।

- ऐसे तेजी से विकसित होते हालात से निपटने के लिए सुदृढ़ संचार योजना की आवश्यकता है। इसे अपने लोगों, मीडिया और शेष विश्व के साथ तैयार करना होगा। मोदी सरकार इस मोर्चे पर नाकाम है।

- कंधार विमान अपहरण कांड के बाद एक बार फिर भारतीय जनमानस कमजोर कड़ी साबित हुआ। यह वही जनता है जो पाकिस्तान के खिलाफ निर्णायक आर-पार की लड़ाई की मांग कर रही थी, उसने एक युद्धबंदी के पाकिस्तान की कैद में जाने के बाद ही अपना धैर्य गंवा दिया। पाकिस्तान को खत्म करने की मांग रातोरात अभिनंदन को वापस लाने की मांग में बदल गई। भारतीय जनता शायद यह भूल गई कि असल लड़ाई में दोनों पक्षों का नुकसान होता है।

संक्षेप में कहें तो इस संकट ने भारत को सिखाया कि यदि उसे आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान के खिलाफ एक नया, कम सहनशील और दंडात्मक रुख अपनाना है तो सैन्य और मानसिक तैयारी के लिए काफी कुछ करना होगा। देश के नेताओं को सैन्य क्षमता बढ़ाने के लिए निवेश करना होगा। इसके अलावा मानसिकता में भी बदलाव लाना होगा। पिछले दिनों जो कुछ हुआ वह एक दो बार और चल सकता है क्योंकि पाकिस्तान का आचरण आसानी से सुधरने वाला नहीं है। फिर पाकिस्तान और अंतरराष्ट्रीय समुदाय दोनों इसके आदी हो जाएंगे। मैं हमला करूं, आप जवाबी हमला करें और फिर अपने-अपने देश में जनता के बीच जीत की घोषणा करेंगे। जनता को अपनी सेना पर इतना भरोसा है कि उसकी बातों को कभी झूठ नहीं मानेगी।

हमें पहले देश की जनता को यह समझाना होगा युद्ध क्या है। अमेरिकी ड्रोन और हवाई हमलों के फुटेज देखते हुए कई लोगों की मति भ्रष्ट हो गई है। फिल्में जोश जगाती हैं लेकिन इन्हें इतने मूर्खतापूर्ण ढंग से बनाया जाता है मानो वे 'विजय जासूस' जैसी कहानियों से प्रेरित हों। या फिर उनमें उड़ी फिल्म के 'गरुड़' जैसे गैजेट दिखाए जाते हैं। असल जिंदगी में जंग खिलौनों की किसी दुकान से गुजरने जैसी नहीं होती।

अगर आपके सैनिक सनी देओल और विकी कौशल हैं तो पाकिस्तानी भी जॉनी वाकर नहीं हैं। उनके पास भी लड़ाकू जवान हैं, वे भी इसी मिट्टी की संतान हैं। देश के सैनिक पाकिस्तानी जवानों को कभी हल्के में नहीं लेते। यही वजह है कि वे असल लड़ाई में हारते नहीं। नेताओं को यह बात जनता के दिमाग में भी डालनी होगी। परंतु अगर वे अपनी राजनीति के लिए सेना का इस्तेमाल करते रहेंगे तो यह सही नहीं होगा। 

आखिरकार, समझाने-बुझाने और प्रतिकार की नीति ही सबसे बेहतर है। परंतु इसके लिए हमें ऐसी क्षमता विकसित करनी होगी कि पाकिस्तान जवाब न दे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो दोनों देश एक दूसरे को भयभीत करते रहेंगे। इसकी आर्थिक कीमत दोनों देशों को चुकानी होगी।

एक तरीका यह है कि हम अपने रक्षा बजट को जीडीपी के 2 फीसदी के तयशुदा स्तर पर कर दें। ऐसा करने से हमारे मौजूदा रक्षा बजट में 25 फीसदी इजाफा होगा। सैन्य बलों में सुधार की जरूरत है। जनरल विपिन रावत के पास सेना के लिए एक जबरदस्त योजना है। उदाहरण के लिए सेना को पारंपरिक युद्ध और निर्णायक प्रतिकार के लिए तैयार करना।

पाकिस्तान को इसके लिए होड़ करने की चुनौती दी जा सकती है। वह या तो शांत हो जाएगा या इस होड़ में पड़कर गरीबी को न्योता देगा। शायद जब वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की 1,200 करोड़ डॉलर की सहायता चुकता करेगा तब इन चीजों पर विचार करेगा। याद रहे, सबसे अच्छी सेना वह होती है जो इतनी ताकतवर हो कि आपको उसका इस्तेमाल ही न करना पड़े। भारत ऐसा कर सकता है।

Keyword: India, Pakistan, IMF, Poor, Sholey, Air Force, Prime Minister, Mortar,
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