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नया अवसर, नई राह

संपादकीय /  March 11, 2019

भारतीय स्टेट बैंक ने अपनी जमा बचत दर और अल्पावधि के ऋण के मूल्य को रीपो दर से जोडऩे का निर्णय लिया है जो समझदारी भरा कदम है। इससे ब्याज दरों का जल्द पारेषण होने की गुंजाइश बनी है। लंबे समय से आरबीआई द्वारा अपनी अहम नीतिगत दरों में कटौती के बावजूद कर्जदारों को उसका लाभ नहीं मिल रहा था। इसका कारण यह है कि बैंक इस स्थिति में होते ही नहीं थे कि वे अपने जमा का मूल्य दोबारा तय कर सकें। अब तक बैंक ब्याज दर को अपने फंड की लागत से जोड़ते रहे हैं।

देश के सबसे बड़े बैंक ने स्वेच्छा से एक लाख रुपये से अधिक की जमा पर मिलने वाले ब्याज की दरों को रीपो दर से जोड़ दिया है जो अब 6.25 फीसदी है। आगामी मई से जमा बचत को रीपो दर से 2.75 फीसदी कम ब्याज मिलेगा। स्टेट बैंक के कुल जमा में ऐसे जमा का हिस्सा 33 फीसदी है जो काफी अहम है। प्रभावी तौर पर बैंक अब अपने जमा के इस हिस्से के लिए नमनशील दर पर निर्धारित करेंगे। ऋण क्षेत्र की बात करें तो कैश-क्रेडिट खाते और एक लाख रुपये से अधिक का ओवरड्राफ्ट भी रीपो दर से 2.25 फीसदी के दायरे में जोड़ा जाएगा। जमा और ऋण दोनों के लिए एक लाख रुपये की सीमा यह सुनिश्चित करने के लिए है छोटे बचतकर्ता और कर्जदारों को रीपो दर में घट-बढ़ से दिक्कत न हो। 

अब यह लगभग तय हो गया है कि अन्य बड़े बैंक भी इसका अनुकरण करते हुए अपने ब्याज मार्जिन की अस्थिरता को कम करेंगे। परंतु इस दौरान देखना यह होगा कि म्युचुअल फंड और बीमा कंपनियां इस उपाय को लेकर किस प्रकार की प्रतिक्रिया देती हैं। हाल के दिनों में बैंकों के खुदरा जमा में पहले के समान तेजी से इजाफा नहीं हुआ है। 

खासतौर पर नोटबंदी के बाद के दौर में आई एकबारगी तेजी के पश्चात ऐसा देखने को नहीं मिला है। पहले जो खुदरा जमाकर्ता थे उनका एक बड़ा तबका अब मकान और सोने जैसी वस्तुओं में निवेश करने में रुचि दिखा रहा है। यह तबका म्युचुअल फंड और कर बचत वाली बीमा योजनाओं में भी रुचि रखता है। यह एक बड़ी वजह है जिसके चलते गैर जमा उधारी पर बैंकों की निर्भरता वित्त वर्ष 2018 में 30 फीसदी तक बढ़ी है जबकि ऐन पिछले वर्ष यह 11 फीसदी थी। 

चालू और बचत बैंक खाते अभी भी कुल जमा के 42 फीसदी के लिए उत्तरदायी हैं लेकिन यह देखना अभी बाकी है कि अब रीपो दर में कटौती होने पर उनके बड़े निवेशक किस प्रकार की प्रतिक्रिया देते हैं। बैंकों के जमा दर में कटौती करने के अनिच्छुक होने की एक अहम वजह यह भी है। फिर चाहे बात बचत की हो या खुदरा की। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि इस कदम को ऐसे समय में कुछ जमाकर्ताओं के प्रतिरोध का सामना करना पड़ सकता है जबकि मुद्रास्फीति में कमी आ रही है। उनके मुताबिक ब्याज दरों में इजाफे तक इंतजार करना बेहतर होता क्योंकि तब ग्राहकों को इस ढांचे की आदत हो जाती। 
परंतु एक के बाद एक आरबीआई के गवर्नर बैंकों द्वारा ब्याज दरों के कमजोर पारेषण की समस्या से जूझते रहे हैं। इससे पहले सारे प्रयासों में ऋण पक्ष को निशाना बनाया गया फिर चाहे बात आधार दर व्यवस्था की हो या सीमांत लागत आधारित ऋण दर की। दिक्कत यह थी कि इससे केवल नए कर्जदारों को लाभ होता और हठी जमा दर की समस्या पर कोई असर नहीं होता। स्टेट बैंक का यह कदम एक नई राह दिखाता है। 
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