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बाजार पर भू-राजनीतिक हालात से ज्यादा दबाव के आसार नहीं

बीएस बातचीत
पुनीत वाधवा /  March 11, 2019

भारत और पाकिस्तान के बीच भू-राजनीतिक घटनाक्रम से पिछले दिनों बाजार मे बेचैनी बनी रही। मैन्युलाइफ ऐसेट मैनेजमेंट के सिंगापुर स्थित प्रबंध निदेशक राणा बी गुप्ता ने पुनीत वाधवा के साथ  साक्षात्कार में बाजारों के लिए परिदृश्य और क्षेत्रों को लेकर अपनी पसंद के बारे में विस्तार से बातचीत की। पेश हैं उनसे बातचीत के मुख्य अंश:

बाजार भू-राजनीतिक हालात को किस तरह से देख रहे हैं?

चुनाव से बाजार में अस्थिरता काफी हद तक बढ़ जाएगी। हालांकि हम यह नहीं मान रहे हैं कि इससे बाजार पर ज्यादा प्रभाव पड़ेगा। भारतीय मतदाताओं ने पिछले 20 वर्षों में दो मुख्य गठबंधनों में से किसी के भी पक्ष में निर्णायक जनादेश दिया है। खंडित जनादेश की कम संभावना है। इसका मतलब है कि यदि इस तरह का परिणाम आता है तो बाजार को आश्चर्य हो सकता है। भू-राजनीतिक स्थिति ताजा घटनाक्रम है। आपको इस पर गंभीरता से नजर रखने की जरूरत है। हमारा मानना है कि भू-राजनीतिक स्थिति को लेकर ज्यादा अनिश्चितता की आशंका कम है। 

क्या भारतीय बाजार मौजूदा समय में 'गिरावट पर खरीदारी' की स्थिति में है?

सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) अनुपात की तुलना में अपने कम निर्यात और अपेक्षाकृत बेहतर  जनसांख्यिकीय प्रोफाइल की वजह से भारत घरेलू मांग-केंद्रित वृद्घि के साथ मजबूत बना हुआ है। संरचनात्मक सुधारों से जीएसटी के क्रियान्वयन को बढ़ावा मिल रहा है और फंसे कर्ज के समाधान से मध्यावधि से दीर्घावधि नजरिये वाले निवेशक के लिए उम्मीद बढ़ी है। अल्पावधि में, इस तरह के समाधान और सुधार और वैश्विक वित्तीय स्थिति के सख्त होने की वजह से वृद्घि की रफ्तार कमजोर पड़ी है। इन अल्पावधि समस्याओं के साथ साथ चुनाव को लेकर बढ़ती राजनीतिक बयानबाजी ने मौजूदा कमजोर प्रदर्शन को बढ़ावा दिया है। सरकार और आरबीआई, दोनों ने वृद्घि में नरमी को लेकर प्रतिक्रिया दिखाई है और वैश्विक वित्तीय हालात में सुधार आ रहा है। यदि चुनाव परिणाम और भू-राजनीतिक स्थिति पर हमारा अनुमान सही साबित होता है तो हम खास क्षेत्रों में अच्छे अवसर देखेंगे।

ये क्षेत्र कौन से हैं?

पिछले कुछ वर्षों में हुए सुधारों से कई अवसर पैदा हुए। पहला, औपचारिकता (फॉर्मलाइजेशन) से संबंधित सुधारों से संगठित क्षेत्र को ज्वैलरी, अपैरल्स और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स जैसे खास सेगमेंट में बाजार भागीदारी बढ़ाने में मदद मिली। दूसरा, औपचारिकता से ऊंचे कर आधार और जीडीपी के मुकाबले कर बढ़ाने में मदद मिली। विद्युतीकरण और सड़क जैसे क्षेत्रों पर सरकारी खर्च से इलेक्ट्रिकल अप्लायंसेज जैसे क्षेत्रों के लिए अवसर पैदा हुए हैं। तीसरा, फंसे कर्ज के समाधान से जुड़े सुधारों से एनपीए से संबंधित ऋणों की बेहतर वसूली में मदद मिली। इससे निजी बैंकों के बैलेंस शीट में मजबूती आई। हम भारत के साथ साथ अन्य उभरते बाजारों में हेल्थ केयर खर्च में वृद्घि कर रही हेल्थकेयर कंपनियों को भी पसंद कर रहे हैं।

आप कौन से क्षेत्रों को लेकर सतर्क हैं?

गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। एनबीएफसी ही नहीं, हम उन क्षेत्रों को लेकर भी सतर्क हैं जिनमें एनबीएफसी ने अपनी उधारी बढ़ाई है। इनमें वाहन और रियल एस्टेट शामिल हैं। हम निजी पूंजीगत खर्च के अभाव को देखते हुए पूंजीगत वस्तु क्षेत्र पर भी सतर्क हैं। वैश्विक तौर पर वाहन क्षेत्र में अनिश्चितता पैदा हुई है जिसने हमें भारत में ऑटो एंसिलियरी कंपनियों पर सतर्क रहने के लिए मजबूर किया है। 

पूंजीगत खर्च-केंद्रित/चक्रीय क्षेत्रों पर आपका क्या नजरिया है?

चक्रीय क्षेत्रों में, हम निजी बैंकों (कॉरपोरेट) को पसंद कर रहे हैं, जो धीमी वृद्घि और खराब परिसंपत्ति गुणवत्ता जैसी समस्याओं से बाहर निकल रहे हैं। हालांकि हमें निजी पूंजीगत खर्च में सुधार के मजबूत संकेत अभी नहीं दिखे हैं। हालांकि जहां सरकार-केंद्रित पूंजीगत खर्च से मदद मिली है, वहीं इसे लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है कि ऑर्डरों में मौजूदा वृद्घि दर बरकरार रहेगी। इसलिए, हम पूंजीगत वस्तु क्षेत्र पर सतर्क बने हैं।

आपके हिसाब से कोई कॉन्ट्रा दांव?

दूरसंचार और विद्युत क्षेत्र अगले एक साल में बड़े बदलाव की स्थिति में होंगे। इन क्षेत्रों में मजबूत बैलेंस शीट वाली और अच्छी तरह से प्रबंधित कंपनियों लगातार मुनाफा हासिल करने में सक्षम होंगी। हमारी नजर में दूरसंचार उद्योग ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां राजस्व पर दबाव दूर होने के आसार दिख रहे हैं। एक ऐसे उद्योग में जहां कर्ज का स्तर ऊंचा बना हुआ है, उस उद्योग की वृद्घि में कमी स्थायी नहीं है। 
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