बिजनेस स्टैंडर्ड - मेट्रो रेल परियोजनाओं की आर्थिक व्यवहार्यता
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मेट्रो रेल परियोजनाओं की आर्थिक व्यवहार्यता

विनायक चटर्जी /  March 09, 2019

महज कुछ सप्ताह पहले लंदन अंडरग्राउंड ने अपना परिचालन शुरू होने की 156वीं वर्षगांठ मनाई। वह दुनिया के शुरुआती रेल तंत्रों में से एक है और उसने दर्जनों शहरी परिवहन नेटवर्क के डिजाइन को प्रभावित किया है। यहां तक कि उसके मशहूर मानचित्र तक का अनुकरण किया गया। दिल्ली मेट्रो में 'माइंड द गैप (दूरी का ध्यान रखें)' जैसी उसकी मौलिक घोषणा और उसके मानचित्र को देखने पर लगता है कि उस पर लंदन अंडरग्राउंड मेट्रो का असर है। ऐसा तब है जबकि दिल्ली मेट्रो को पैदा हुए अभी सिर्फ 16 वर्ष हुए हैं। यानी वह लंदन अंडरग्राउंड के कई सालों बाद अस्तित्व में आई है। 

परंतु बुनियादी ढांचा क्षेत्र में नए होने का एक अर्थ बेहतर होना भी होता है क्योंकि बाद में बनने वाली परियोजनाएं, पिछली परियोजनाओं की सफलता और विफलता से काफी कुछ सीख चुकी होती हैं। बड़े और हवादार स्टेशन, आधुनिक रेल ट्रैक और डिब्बे तक दिल्ली मेट्रो तकनीकी तौर पर न केवल लंदन अंडरग्राउंड बल्कि कई अन्य पुरानी मेट्रो रेल व्यवस्थाओं मसलन न्यूयॉर्क मेट्रो आदि से भी काफी बेहतर है। 

दिल्ली मेट्रो बहुत तेजी से प्रगति कर रही है। उसके बुनियादी विकास के आंकड़े सफलता की कहानी स्वयं कहते हैं। दिल्ली मेट्रो के ट्रैक की कुल लंबाई अब करीब 327 किलोमीटर हो चुकी है जो लंदन अंडरग्राउंड की 402 किमी की लंबाई के काफी करीब है। लंदन में 270 स्टेशन हैं जबकि दिल्ली में 236 स्टेशन हैं। दिल्ली जल्दी ही उसे पार कर सकता है। उसने 20 वर्ष में कमोबेश वह हासिल कर लिया है जहां तक पहुंचने में लंदन को 150 वर्ष लग गए हैं। 

परंतु इसे अगर दूसरे तरीके से देखें तो दिल्ली मेट्रो को अभी भी अपनी समकक्ष मेट्रो रेल परियोजनाओं की तुलना में लंबी दूरी तय करनी है। लंदन अंडरग्राउंड में रोजाना 50 लाख लोग यात्रा करते हैं जबकि दिल्ली में हर रोज यात्रा करने वालों की तादाद 25 लाख है। हालांकि लंदन की आबादी दिल्ली की आबादी की तुलना में आधी है। दिल्ली मेट्रो के यात्रियों की तादाद 2017-18 में इससे ठीक एक वर्ष पहले की तुलना में कम ही हुई है। 

यात्रियों की संख्या में इस कमी के लिए कई लोग लगातार दोबारा किराये में इजाफे को जिम्मेदार बताते हैं। सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वॉयरनमेंट की एक रिपोर्ट में कहा गया कि दिल्ली मेट्रो, वियतनाम की हनोई मेट्रो के बाद दुनिया की दूसरी सबसे महंगी मेट्रो सेवा है। यह आकलन एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति द्वारा अपनी मासिक आय में से मेट्रो यात्रा किराये के रूप में व्यय की जाने वाली औसत राशि पर आधारित है। हालांकि दिल्ली मेट्रो ने स्वयं इसका विरोध करते हुए कहा कि किराये में बढ़ोतरी काफी समय के बाद की गई है। कहा गया कि इस अवधि में राजधानी में औसत वेतन में बढ़ोतरी के साथ किराया उतना ज्यादा नहीं रह गया है। 

परंतु दिल्ली मेट्रो की यात्रा करने वालों की संख्या मुंबई की उपनगरीय रेल से महज एक तिहाई है। मुंबई की उपनगरीय रेल सेवा अपने आप में लंदन अंडरग्राउंड जैसी ही अहमियत रखती है। दिल्ली मेट्रो के नेटवर्क का विस्तार होने के साथ यह अंतर कम होता जाएगा लेकिन एक सवाल बरकरार है कि आखिर दिल्ली मेट्रो के प्रदर्शन का आकलन किस मानक पर किया जाए? इसके अलावा देश भर में शुरू हो रही नई मेट्रो रेल परियोजनाओं को क्या सबक लेने की आवश्यकता है? उनमें से कई तो दिल्ली मेट्रो के ही ढर्रे पर आगे बढ़ रही हैं।

दुनिया भर में शहरी मेट्रो तंत्र से जुड़े अहम निर्णयों को इस बात से जूझना पड़ रहा है कि समाज के सभी धड़ों तक उसकी पहुंच और किराये को व्यवहार्य बनाए रखने के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए और इस दौरान सेवा को वित्तीय रूप से भी व्यवहार्य बनाए रखा जाए। यूरोप के अधिकांश देशों और अमेरिका में परिचालन लागत और यात्री किराये के बीच का अनुपात ऐसा है कि राजस्व जुटाने के लिए उनको सब्सिडी अथवा अन्य उपाय अपनाने पड़ते हैं। दिल्ली मेट्रो के किराये में बढ़ोतरी के बाद दिल्ली अथवा केंद्र सरकार की सब्सिडी पर इसकी निर्भरता कम हुई है। दिल्ली मेट्रो अपने परिचालन के लिए इन दो सरकारों पर काफी हद तक निर्भर रही है।

एक बार फिर न्यूयॉर्क मेट्रो और लंदन मेट्रो के परिचालन पर नजर डालना श्रेयस्कर होगा। लंदन अंडरग्राउंड मेट्रो की यात्री किराये से लागत वसूल करने की क्षमता न्यूयॉर्क की तुलना में कहीं बेहतर है। यह यात्रियों से इतना किराया वसूल कर लेती है कि वह अपनी परिचालन लागत के अतिरिक्त कुछ राशि जुटा ले। इस मामले में न्यूयॉर्क मेट्रो का प्रदर्शन सबसे कमजोर है।

ऐसा किराये के ढांचे में अंतर की वजह से भी है। लंदन और दिल्ली जैसे मेट्रो तंत्र दूरी या क्षेत्र आधारित मॉडल पर काम करते हैं जहां कोई यात्री जितनी अधिक दूरी तक यात्रा करता है, उतना अधिक किराया चुकाता है। न्यूयॉर्क जैसे शहरों में यात्री किराया तयशुदा है, भले ही वह कितनी भी दूर तक सफर करे। ऐसी व्यवस्था उन उपभोक्ताओं के लिए मुफीद है जो गरीब हैं और कार्यस्थल के आसपास रहने का बोझ नहीं उठा सकते।

साफ जाहिर है कि न्यूयॉर्क मेट्रो प्रणाली लंदन की तुलना में खासी सस्ती है। हालांकि इसकी भी एक कीमत है जो चुकानी पड़ती है। सब्सिडी के अभाव में कम किराया होने के चलते एक अवधि के बाद सेवा मानकों में कमी आनी शुरू हो जाती है। पटरियों और डिब्बों का रखरखाव और उनकी गुणवत्ता और उन्नयन का काम भी प्रभावित होता है। अचल संपत्ति विकास से कुछ हद तक नुकसान की भरपाई होगी लेकिन देश में तमाम मेट्रो प्रणालियों के पास यह सुविधा नहीं होगी। 

आखिरकार, सरकारों को अपना पैसा खपाते हुए मेट्रो प्रणालियों को सब्सिडी प्रदान करनी ही होगी। वरना उन्हें किराया इतना अधिक रखना होगा कि गरीब यात्री उसका बोझ ही वहन न कर पाएं। ऐसे में  समाज का वह तबका प्रभावित होगा जिसे इस तेज और किफायती सार्वजनिक परिवहन प्रणाली से सबसे अधिक लाभ होगा। इतना ही नहीं यह शहर की सड़कों को वाहनों के जाम से मुक्त रखने काम भी करता है। ऐसे में हमें सही चयन करना होगा।

(लेखक फीडबैक इन्फ्रा के चेयरमैन हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।) 
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