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नए भारत के बारे में सामरिक पूर्वानुमान लगा पाना कठिन

अजय शुक्ला /  March 06, 2019

भारतीय वायुसेना का पकड़ा गया पायलट अब लौट चुका है, नियंत्रण रेखा पर गोलाबारी में थोड़ी कमी आई है और भारतीय सेना ने इस क्षेत्र में शांति एवं स्थिरता बनाए रखने की प्रतिबद्धता जताई है। हालांकि पुलवामा हमले जैसी एक और वारदात सीमापार तनाव का नया दौर शुरू कर सकती है। ऐसे में यह आकलन करना सही होगा कि भारत के हवाई हमले से सामरिक परिदृश्य में क्या कोई बदलाव आया है?

पहला, भारत के 'सामरिक संयम' के परित्याग से भारी बदलाव आया है। पुलवामा हमले के बाद से ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान भारत को यह संदेश भेजते रहे कि संयम दिखाते हुए बातचीत से समाधान तलाशा जाए। इमरान ने भारत का एक मिग-21 विमान मार गिराने और एक पायलट को पकडऩे के बाद भी संयम बरतने की बात कही। अगले ही दिन इमरान ने 'शांति के लिए पहल' करते हुए पायलट को लौटाने की पेशकश कर दी। यह बात ध्यान रखनी होगी कि पाकिस्तान का नेता अचानक ही तर्कसंगत बातें करने लगा है। भारत का नेता तो ऐसा व्यक्ति माना जाता है जिसके बारे में कोई अनुमान नहीं लगा सकता है। पाकिस्तान की 'सोची-समझी तर्कशून्यता' की रणनीति अब खत्म हो चुकी है। भारत के सामरिक संयम की जगह 'सुनिश्चित प्रतिरोध' ने ले ली है। 

हालांकि इस बदलाव की गंभीरता का आकलन मुश्किल है। वर्ष 1947 से ही भारत ने पाकिस्तान के साथ हरेक संघर्ष में तर्कसंगत एवं जिम्मेदार पक्ष की भूमिका निभाई है। उसने अक्टूबर 1947 में कश्मीर में अपनी सेना तभी भेजी थी जब महाराजा हरि सिंह ने विलय संधि पर हस्ताक्षर कर दिए। वर्ष 1965 की शुरुआत में भारत ने कच्छ में पाकिस्तान की हरकत पर ऐसा संयम दिखाया कि राष्ट्रपति अयूब खान ने यह मान लिया कि कश्मीर में पाकिस्तानी सेना के घुसने का बहुत प्रतिरोध नहीं होगा। वर्ष 1999 में भी करगिल से पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेडऩे के दौरान भारत ने ऐसा ही संयम दिखाया था। सीमापार आतंकवाद और उग्रवाद के लंबे दौर में भी भारत ने संयम का परिचय दिया था। वर्ष 2001-02 में संसद पर आतंकी हमला होने के बाद भारत ने अपनी सेना को सीमा पर तैनात करने के बाद भी विवेक का इस्तेमाल करते हुए उसे वापस बुला लिया। जल्द ही भारत ने 'कोल्ड स्टार्ट' सिद्धांत अपनाया जिसमें सैन्यबलों को किसी भी उकसावे की स्थिति में पाकिस्तान में घुसने का प्रावधान है। लेकिन अग्रिम सीमा पर पाकिस्तानी सेना और परमाणु हथियारों की तैनाती ने भारतीय नीति-निर्माताओं के हाथ बांध दिए। 

समूची अवधि में पाक सैन्य मुख्यालय ने भारत को यह अहसास दिलाने की कोशिश की है कि भारत की तरफ से किसी भी सैन्य कार्रवाई का जवाब देते समय वह विवेक का इस्तेमाल नहीं करेगा। वह ऐसे संकेत भी देता रहा कि भारत को नहीं रोक पाने पर वह परमाणु हथियारों के भी इस्तेमाल से नहीं चूकेगा। हालांकि भारत ने परमाणु हमले की सूरत में व्यापक नाभिकीय प्रतिरोध का सिद्धांत अपनाया हुआ है लेकिन पाकिस्तान में कोई भी नहीं मानता है कि भारत कभी ऐसा कदम उठाएगा। 

लेकिन अब ये तमाम धारणाएं अतीत की बात हो चुकी हैं। भारत ने भी अब अपना पहले से कोई अनुमान न लगाए जा सकने वाला रुख दिखाने के साथ आतंकी हमला करने वालों को सबक सिखाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति जताई है। भारत जवाबी गोलीबारी और सर्जिकल स्ट्राइक से आगे बढ़कर वायु शक्ति और शायद नौसैनिक शक्ति जैसे विकल्पों के बारे में भी सोच सकता है। इससे पाकिस्तान की पुरानी मान्यताएं ध्वस्त हो चुकी हैं। भारत के ठिकानों पर हमले का उसे तगड़ा जवाब मिलने का डर है।

दूसरा, भारत को अपनी मंशा के साथ क्षमता भी दिखानी होगी। यह खेद का विषय है कि बालाकोट में आतंकी ठिकाने को ध्वस्त किए जाने पर सवाल उठ रहे हैं। वायुसेना प्रमुख ने इस पर एतराज जताते हुए कहा है कि 'शवों की गिनती करना वायुसेना का काम नहीं है'। लेकिन विमान में लगे कैमरे, सैटेलाइट तस्वीरों, मानवरहित हवाई उपकरणों और जमीनी एजेंटों के जरिये इस नुकसान का आकलन इसलिए अहम है कि भारत पूरी दुनिया को ऐसे हमले करने की मंशा के साथ इसकी क्षमता रखने के बारे में भी दिखा सके। भारत के मिग-21 विमान द्वारा पाकिस्तान के उन्नत विमान एफ-16 को मार गिराए जाने पर भी सवाल उठ रहे हैं। वैसे तकनीक के इस दौर में भी ऐसे सबूत नहीं पेश कर पाना चिंताजनक है।

जवाबी हमलों के रास्ते पर बढऩे के लिए भारत को अपने सैन्य सिद्धांत, रणनीति और प्राथमिकता में भी उसे जगह देनी होगी। हम सीमापार दंडात्मक हमलों को प्राथमिकता देकर किसी उकसावे का भी संयमित तरीके से सामना करने की मजबूत क्षमता विकसित कर पाएंगे। 

तीसरा और शायद सबसे अहम बिंदु, भारत यह याद रखे कि इस संकट की जड़ में भी पहले की तरह कश्मीर ही है। पिछले पांच वर्षों में कश्मीरी अवाम के भीतर विलगाव की भावना अप्रत्याशित रूप से बढ़ी है। अपना हिंदुत्ववाद पूरे देश में लागू करने की भाजपा की कोशिशों से घाटी के मुस्लिम उद्वेलित हैं। गोरक्षकों के हाथों मुसलमानों के मारे जाने, घरवापसी, सार्वजनिक स्थलों पर नमाज की मनाही और लव जिहाद को कश्मीरी आज द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को वैध ठहराने का जरिया बता रहे हैं।

ऐसी स्थिति में कश्मीरी अवाम के जख्मों पर मरहम लगाने की जरूरत है लेकिन सरकार कश्मीर विवाद को महज सुरक्षा का मसला मानकर चल रही है। पिछले पांच वर्षों में घाटी में हिंसा बढ़ी है और अब निहत्थे कश्मीरी भी सुरक्षाबलों के सामने खड़े होने लगे हैं। जब तक कश्मीर उबलता रहेगा, तब तक पुलवामा जैसे हमले दोबारा होने और पाकिस्तान के साथ तनाव बढऩे की आशंका बनी रहेगी। केवल बातचीत से ही इस आक्रोश को शांत किया जा सकता है।
Keyword: Pulwama attack, Pakistan,Defense, Imran Khan, Indian Airforce, Kashmir, Army,
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