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कैसे दूर हो देश में रेटिंग का संकट

तमाल बंद्योपाध्याय /  March 06, 2019

एक राजा था जिसे सड़कों पर चलना अच्छा लगता था लेकिन वह चाहता था कि उसके पैर गंदे न हों। घोषणा की गई कि जो व्यक्ति इस समस्या का समाधान खोजेगा, उसे भारी भरकम इनाम से नवाजा जाएगा। पहला व्यक्ति हजारों झाड़ुओं के साथ आया। झाड़ू से पूरे साम्राज्य के ऊपर धूल के बादल छा गए और राजा बीमार पड़ गया। दूसरे व्यक्ति ने लाखों भेड़ों को मार कर उनका चमड़ा सड़क को ढकने के लिए इस्तेमाल किया लेकिन इससे आधा मार्ग भी नहीं ढका जा सका। आखिरकार एक मोची दरबार में आया, उसने राजा के पैरों की नाप ली और उनके लिए एक जोड़ी सैंडल बनाए। अब राजा आराम से सड़क पर घूम सकता था और उसके पैर भी गंदे नहीं होते थे।

देश में क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की कमियों से जूझ रहे निवेशकों की समस्या हल करने के लिए हम क्या कर सकते हैं? एक के बाद एक कारोबारी घरानों के डिफॉल्ट ने कर्जदारों और बॉन्डधारकों को बुरी तरह प्रभावित किया है और क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों पर आरोप लग रहा है कि उन्होंने कंपनियों की स्थिति को लेकर निवेशकों को भ्रमित किया।

मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस कंपनी की रेटिंग एजेंसी इक्रा ने इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज (आईएलऐंडएफएस) की रेटिंग को एकबारगी ही निवेश श्रेणी से खराब में, एए प्लस से डी में बदल दिया। कंपनी को सन 1997 में एएए श्रेणी मिली हुई थी और इक्रा, इंडिया रेटिंग ऐंड रिसर्च और केयर रेटिंग, तीनों ने उसे एएए श्रेणी दी थी। एक अन्य एजेंसी ब्रिकवर्क रेटिंग इंडिया को हाल में भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने आचार संहिता का 

पालन न करने के लिए दंडित किया है। इसने दो कंपनियों के डिफॉल्ट को चिह्नित करने में देरी की थी। देश में रेटिंग की इस गड़बड़ी में सुधार के लिए इसके नियमन की समीक्षा आवश्यक है। सुझाव यह भी है कि इनके लिए निवेशक के भुगतान वाला मॉडल अपनाया जाए। फिलहाल भुगतान कर्जदाता करते हैं। लंबे जुड़ाव के बदले इनमें चक्रीय बदलाव, कम से कम दो या अधिक एजेंसियों द्वारा अनिवार्य रेटिंग आदि के सुझाव भी हैं। खासतौर पर तब जबकि ऋण का आकार 100 करोड़ रुपये से अधिक हो। प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए इनकी तादाद बढ़ाने की बात भी कही गई है।

अमेरिका में देश क्रेडिट रेटिंग एजेंसी हैं लेकिन वहां स्टैंडर्ड ऐंड पुअर्स, मूडीज और फिच का वर्चस्व है। हमारे यहां सात एजेंसियां हैं लेकिन यहां भी क्रिसिल, केयर और इक्रा के पास रेटिंग कारोबार का 80 फीसदी है। बाकी का काम अन्य एजेंसियों में बंटा हुआ है।

सैद्धांतिक रूप से देखें तो दो वजहों से प्रतिस्पर्धा का स्वागत किया जाना चाहिए। एक तो शुल्क में कमी आएगी और दूसरा रेटिंग में सुधार होगा। शुल्क तो पहले ही कम है। बैंक ऋण के लिए रेटिंग का ये एजेंसियां 40,000 रुपये और ऋण उपायों की रेटिंग के लिए कुल ऋण के कुछ आधार अंक, अधिकतम 10 आधार अंक तक लेती हैं। एक आधार अंक प्रतिशत का सौवां हिस्सा होता है।
गुणवत्ता सुधार के बजाय अधिक रेटिंग एजेंसी कई बार मानक कमजोर करने का काम भी करती हैं। कुछ एजेंसियों पर यह संदेह किया गया कि वे कारोबार के लिए रेटिंग से समझौता करती हैं। ऐसे में निवेशक द्वारा भुगतान का मॉडल भी सही काम नहीं करेगा क्योंकि निवेशक और रेटिंग करने वालों में गठजोड़ हो सकता है।
अधिकांश निवेशक, खासतौर पर म्युचुअल फंड अक्सर रेटिंग को औपचारिकता मानते हैं। वे रेटिंग में गिरावट को नापसंद करते हैं क्योंकि इसका असर मूल्यांकन पर प़ता है और निवेश का शुद्ध मूल्य कम होता है। अगर निवेशकों को ऋण की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए पैसे खर्च करने होंगे तो वे रेटिंग एजेंसी को भुगतान क्यों करंगे? बल्कि वे यही पैसा तथाकथित जांच परख की प्रक्रिया में व्यय करेंगे।
राजा के पैरों को धूल से बचाने वाले मोची की तरह सबसे सहज उपाय यही है कि डेट बाजार का गठन किया जाए। अभी बीमा और प्रोविडेंट फंड जैसे दीर्घकालिक निवेशक अपेक्षाकृत कमतर जगहों पर निवेश नहीं करते क्योंकि बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण, कर्मचारी भविष्य निधि संगठन और पेंशन फंड नियामक एवं विकास प्राधिकार एए श्रेणी से नीचे बहुत कम निवेश की इजाजत देते हैं।
बैंक भी ऐसे कर्जदार को पैसा देने को उत्सुक नहीं हैं जिसकी रेटिंग कम से कम बीबीबी न हो जो निवेश श्रेणी के लिए न्यूनतम है। ऐसे ऋण के लिए जोखिम अधिक होता है।
संक्षेप में कहें तो इसका हल उच्च प्रतिफल वाले बॉन्ड बाजार में निहित है। यहां निवेशक और बैंक अपने जोखिम का दांव लगा सकते हैं और कम रेटिंग वाले डेट प्रपत्र और निगमों के समक्ष जा सकते हैं। जब तक निवेश मानक शिथिल नहीं किए जाते तब तक क्रेडिट रेटिंग एजेंसी उच्च रेटिंग देने के दबाव में रहेंगी। अमेरिकी बॉन्ड बाजार देश के जीडीपी का 120 फीसदी है। इसकी तुलना में भारतीय बॉन्ड बाजार जीडीपी का बमुश्किल 15 फीसदी है।
इन एजेंसियों द्वारा डिफॉल्ट को देर से पहचानने की एक वजह जीवंत आंकड़ों का न होना भी है। बैंकों को एक दिन के डिफॉल्ट के आंकड़े सेंट्रल रिपोजिटरी ऑफ इन्फॉर्मेशन ऑन लार्ज क्रेडिट्स (सीआरआईएलसी) को देना होता है। रेटिंग एजेंसियों के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं। परंतु कई एजेंसियां इसका लाभ लेती हैं और जानबूझकर डिफॉल्ट को चिह्नित करने में देरी करती हैं। इसका फायदा जारीकर्ता को भी होता है और निवेशक को भी। अगर एजेंसियों को अद्यतन आंकड़ें मिलें तो वे जोखिम का बेहतर आकलन कर पाएंगी। अनदेखी करने पर उन पर भारी जुर्माना भी लगाया जाना चाहिए।
एसऐंडपी और मूडीज दोनों को 2008 में मॉर्गेज समर्थित प्रतिभूतियों की गुणवत्ता का सही आकलन न कर पाने पर दंडित किया गया था। इसके चलते ही 2008 का वित्तीय संकट आया था। 137 करोड़ डॉलर के जुुर्माने के अलावा एसऐंडपी ने 12.5 करोड़ डॉलर की राशि कैलिफोर्निया पब्लिक एंप्लॉयीज रिटायरमेंट सिस्टम को तथा 8 करोड़ डॉलर की राशि प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग को चुकाई। मूडीज ने न्याय विभाग को 43.75 करोड़ रुपये का जुर्माना दिया और राज्यों तथा वॉशिंगटन डीसी को 42.63 करोड़ डॉलर की राशि चुकाई गई।
हमारे देश में सेबी इन एजेंसियों पर बमुश्किल 3 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाता है। भले ही संदर्भ अलग हों लेकिन यह जुर्माना किसी भी तरह नाकाफी है।
निवेशकों को भी रेटिंग को इतनी अधिक तवज्जो देनी बंद करनी होगी। उन्हें अन्य अहम संकेतकों पर भी नजर रखनी चाहिए।
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक एवं जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लि. के वरिष्ठ परामर्शदाता हैं)
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