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चीनी खाने से नहीं होता मधुमेह!

संजीव मुखर्जी / नई दिल्ली March 06, 2019

भारत को विश्व की मधुमेह की राजधानी बनाने के लिए क्या सिर्फ चीनी जिम्मेदार है? चीनी उद्योग के प्रतिनिधियों और कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि चीनी को अनावश्यक रूप से इस विवाद में घसीटा जाता है कि बढ़ते मधुमेह की वजह चीनी है, जबकि इसके लिए बदलती जीवन शैली और शहरीकरण की प्रमुख भूमिका है। 

देश की निजी चीनी मिलों के प्रमुख संगठन इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (आईएसएमए) की ओर से आयोजित चीनी और स्वास्थ्य को लेकर आयोजित एक सेमीनार में उद्योग जगत के लोगों ने कहा कि 2,000 और 2016 बीच देश में मधुमेह के मामलों में सालाना 6.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जबकि इस दौरान प्रति व्यक्ति चीनी की खपत में महज 1.23 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। 

आईएसएमए की कवायद ऐसे समय में चीनी के स्वास्थ्य संबंधी लाभ गिनाने की है, जब भारत में 2018-19 चीनी सत्र (अक्टूबर-नवंबर) के बीच चीनी का उत्पादन 300 से 310 टन जबकि देश में खपत 260 लाख टन रहने का अनुमान है। पिछले साल के बचे स्टॉक और घरेलू व अंतरराष्ट्रीय बाजार में कम उठान की वजह से चीनी का स्टॉक 2018-19 चीनी सत्र के अंत तक 110 लाख टन से ज्यादा बचे रहने की संभावना है। तमाम विशेषज्ञों का कहना है कि चीनी की घरेलू खुदरा खपत में वृद्धि दर कम रहना अतिरिक्त स्टॉक की एक प्रमुख वजह है। 

आईएसएमए के महाप्रबंधन अविनाश वर्मा ने कहा, 'भारत में सालाना चीनी की खपत प्रति व्यक्ति 18.4 किलो है, जो दुनिया में सबसे कम है। यह पाकिस्तान व श्रीलंका से भी कम है। इसके बावजूद हमारे यहां मधुमेह तेजी से फैल रहा है। इससे लगता है कि समस्या की वजह कुछ और है, न कि चीनी की खपत।' 

उन्होंने कहा कि आज चीनी की खपत को लेकर दो बड़े मिथक प्रचलित हैं। पहला- इसकी वजह से मधुमेह होता है और दूसरा- इसकी वजह से बच्चों और बड़ों के दांत खराब होते हैं। अगर दांत खराब होने की बात करें तो अध्ययन एवं शोध से पता चलता है कि खाने में एसिड और पीएच वैल्यू की वजह से ऐसा होता है, जो कि चीनी में सामान्य माना जाता है। अगर पीएच वैल्यू 7 से नीचे है तो उसे एसिडिक माना जाता है और अगर इससे ज्यादा है तो उसे एल्कलाइन माना जाता है। 

वर्मा ने कहा, 'रसदार फलों जैसे नींबू, अचार, टमाटर और कॉफी में कम पीएच स्तर होता है और इस तरह से ये चीनी से ज्यादा एसिडिक हैं। इस तरह से देखें तो दांत खराब होने की वजह चीनी नहीं है। हालांकि यह सही है कि जब खाना दांत से चिपक जाता है तो यह एसिडिक हो जाता है। अगर दांत नियमित रूप से साफ कि या जाए तो उन्हें खराब होने से रोका जा सकता है।'

इस कार्यक्रम में हिस्सा ले रही जानी मानी पोषण विशेषज्ञ इशि खोसला ने कहा कि सिर्फ चीनी खाने से मधुमेह नहीं होता बल्कि अगर बहुत ज्यादा चीनी खाया जाए तो निश्चित रूप से यह मधुमेह की वजह बन सकती है। उन्होंने कहा कि उनके लंबे पेशेवर काल के दौरान तमाम ऐसे लोग आए, जो मोटे नहीं हैं, सक्रिय रहते हैं, स्वस्थ हैं, लेकिन उन्हें मधुमेह की बीमारी है। इससे पता चलता है कि आप क्या खाते हैं, वह उतना ही अहम है कि आप किस तरह से खाते हैं और आप जिस वक्त कोई चीज खा रहे हैं, वह खाने का उचित वक्त है या नहीं। 

इटली के रोम में बायो मेडिको कैंपस में साइंस आफ ह्यूमन न्यूट्रीशन और गैस्ट्रोइंट्रोलॉजी विशेषज्ञ डॉ लूका पिरेत्ता ने कहा, 'हमें यह जानने की जरूरत है कि हम क्या खाते हैं और इससे भी अहम है कि हम किस तरह से खाते हैं। सिर्फ किसी उत्पाद को इस्तेमाल कर लेने के बजाय हमें उसे उचित अनुपात में खाने के बारे में जानने की जरूरत है। साथ ही खाने का वक्त भी जानने की जरूरत है, जिससे कि स्वस्थ जीवनशैली बरकरार रह सके।' 

Keyword: Sugar mills, Sugar Economy, ISMA, Sugar Stock, Farmer, Diabetes, Health, Dental Problem,
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