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राजकोषीय मजबूती की कोशिशों से पूंजीगत व्यय पर आशंका

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  March 05, 2019

वर्ष 2018-19 के लिए अपने राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3.4 फीसदी तक सीमित रखने के संशोधित लक्ष्य को क्या केंद्र सरकार हासिल कर पाएगी? मौजूदा वित्त वर्ष के पहले 10 महीनों के बारे में महालेखा नियंत्रक की तरफ से हाल ही में जारी आंकड़े देखें तो संदेह पैदा होना लाजिमी है। इन आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल 2018-जनवरी 2019 के दौरान राजकोषीय घाटा पूरे वित्त वर्ष के लिए अनुमानित लक्ष्य का 121 फीसदी हो चुका है। गत 1 फरवरी को पेश अंतरिम बजट में दी गई जानकारी से पता चलता है कि राजकोषीय घाटा इस वित्त वर्ष के पहले 10 महीनों में ही 7.71 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है। इस वजह से 6.34 लाख करोड़ रुपये का संशोधित लक्ष्य पाने के लिए सरकार को बाकी दो महीनों में 1.37 लाख करोड़ रुपये के राजकोषीय अधिशेष की जरूरत पड़ेगी।

 
सरकार के लिए ऐसा कर पाना कितना मुश्किल होगा? आंकड़े खुद ही इसकी गवाही देते हैं। इसके लिए राजस्व प्राप्ति के मासिक रुझान को समझना मददगार होगा। समूचे बजट आकार का दो-तिहाई से अधिक हिस्सा राजस्व प्राप्ति का ही होता है। वर्ष 2017-18 के पहले 10 महीनों में कुल राजस्व प्राप्तियों का करीब 76 फीसदी हिस्सा संग्रह हुआ था। दूसरे शब्दों में, कुल राजस्व प्राप्तियों का 24 फीसदी हिस्सा वित्त वर्ष के अंतिम दो महीनों में आया। इसी तरह कुल राजस्व प्राप्तियों में अहम स्थान रखने वाले केंद्रीय शुद्ध कर राजस्व के मामले में 2017-18 का करीब 22 फीसदी हिस्सा फरवरी और मार्च महीने में ही आया।
 
एक पल के लिए यह मान लें कि वित्त वर्ष 2018-19 में भी आखिरी दो महीने पिछले साल की ही तरह राजस्व जुटाने में सफल रहेंगे। लेकिन ऐसा होने पर भी समस्या यह है कि संशोधित राजस्व प्राप्ति  लक्ष्य से 1.33 लाख करोड़ रुपये कम ही रह जाएगी। इस कमी की भरपाई केवल तभी हो सकती है जब सरकार को वित्त वर्ष के अंतिम दो महीनों में पूरे साल की राजस्व प्राप्ति का 32 फीसदी हिस्सा मिल जाए। लेकिन ऐसा हो पाने की संभावना लगभग नगण्य है। फिर सरकार के पास क्या चारा रह जाता है? पूंजी के मोर्चे पर विनिवेश प्राप्तियां अच्छी हालत में हैं। हालांकि आलोचक हमेशा ही विनिवेश प्राप्तियों की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठाएंगे क्योंकि यह सरकार के घाटे को पूरा करने के लिए संसाधन स्थानांतरित करने का जरिया भर बनकर रह गया है। जनवरी के अंत तक विनिवेश प्राप्तियां 35,606 करोड़ रुपये तक ही पहुंच पाई थीं जबकि वित्त वर्ष के लिए 80,000 करोड़ रुपये प्राप्ति का लक्ष्य रखा गया था। फरवरी में 20,867 करोड़ रुपये का विनिवेश कार्य पूरा किया गया जिसके बाद इस मद में कुल प्राप्तियां 56,473 करोड़ रुपये हो चुकी हैं। इसका मतलब है कि अकेले मार्च महीने में 23,527 करोड़ रुपये की विनिवेश प्राप्ति जरूरी होगी। वैसे 2017-18 के आंकड़े देखें तो सरकार के लिए ऐसा कर पाना बहुत मुश्किल नहीं होगा। अकेले फरवरी-मार्च 2018 में 44,652 करोड़ रुपये की विनिवेश प्राप्तियां हुई थीं।
 
इस तरह अगर सरकार संशोधित राजकोषीय घाटा लक्ष्य हासिल करना चाहती है तो व्यय पर ध्यान केंद्रित करना होगा। सरकार के राजस्व व्यय में तो अधिक गुंजाइश नहीं दिखती है। बड़ी सब्सिडी के मामले में हमेशा ही स्थगन की संभावना रहती है लेकिन इस समय बहुत कम सुधार की गुंजाइश दिख रही है। चालू वित्त वर्ष के पहले 10 महीनों में बड़ी सब्सिडी के मद में व्यय 2.59 लाख करोड़ रुपये और संशोधित अनुमानों के मुताबिक समूचे वित्त वर्ष का व्यय 2.66 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। यानी आखिरी दो महीनों में सब्सिडी वितरण में शायद ही कोई गतिविधि होगी क्योंकि सरकार ने व्यय मद को पहले ही संकुचित कर दिया है। 
 
फिर सरकार को इस स्थिति से उबारने का काम पूंजीगत व्यय ही कर सकता है। अगर ऐसा होता है तो वह दुर्भाग्यपूर्ण होगा। पूंजीगत व्यय की नकेल कसने का काम पहले ही शुरू हो चुका है। इस तरह जनवरी 2019 के अंत तक सरकार का पूंजीगत व्यय 2.29 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। अंतरिम बजट में  दिए गए संशोधित अनुमानों के मुताबिक पूरे साल के लिए यह आंकड़ा 3.16 लाख करोड़ रुपये रहेगा। ऐसे में पूरी आशंका है कि सरकार वित्त वर्ष के आखिरी दो महीनों में आवंटित राशि में से बाकी 87,000 करोड़ रुपये का इस्तेमाल नहीं कर पाएगी।
 
इसकी संभावना भी है कि सरकार पूंजीगत व्यय के तहत खर्च न की जा सकी समूची रकम का इस्तेमाल राजस्व प्राप्ति में 1.33 लाख करोड़ रुपये की कमी को पूरा करने के लिए करे। ध्यान रखें कि सरकार ने पिछले साल असल में मार्च 2018 में 33,000 करोड़ रुपये का पूंजीगत व्यय वापस ले लिया था। इस तरह सरकार का पूंजीगत व्यय फरवरी 2018 तक 2.97 लाख करोड़ रुपये था लेकिन मार्च 2018 में यह घटकर 2.64 लाख करोड़ रुपये हो गया। भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार 2018-19 में 190 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने से भी सरकार को राजकोषीय घाटे के मोर्चे पर 6,000 करोड़ रुपये की सुरक्षा मिलेगी। अधिक कर राजस्व जुटाने और पूंजीगत व्यय में कटौती के लिए अतिरिक्त प्रयासों से सरकार राजकोषीय घाटे के संशोधित लक्ष्य को हासिल करने की उम्मीद कर सकती है। लेकिन आलोचक हमेशा ही राजकोषीय मजबूती की ऐसी कोशिशों पर सवाल उठाते रहते हैं। 
Keyword: fiscal deficit, ICRA, GDP, राजकोषीय घाटा,
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