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एशिया और भारत के लिए अहम है सऊदी अरब

हर्ष वी पंत /  March 05, 2019

अमेरिका के साथ बिगड़ते रिश्तों के बीच सऊदी अरब ने एशिया में चीन और भारत के साथ रिश्ते मजबूत करने की पहल की है। देश बदलती परिस्थितियों का लाभ किस प्रकार उठाता है। बता रहे हैं हर्ष वी पंत 

 
पिछले दिनों भारत की यात्रा पर आए सऊदी अरब के शहजादे मोहम्मद बिन सलमान (एमबीएस) को लेकर हमारे देश में होने वाली चर्चा मोटे तौर पर इस बात पर केंद्रित रही कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान को लेकर संतुलन कायम करने की कोशिश की। उनकी यह यात्रा पुलवामा हमले के तुरंत बाद हुई थी और यही वह वक्त था जब भारत पाकिस्तान को लेकर अपना रुख सख्त कर रहा था। परंतु इसके अलावा भी इस यात्रा के व्यापक भू सामरिक महत्त्व को हमें समझना होगा। सऊदी अरब के रिश्ते अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ तेजी से खराब हो रहे हैं और एमबीएस की कोशिश यह संकेत देने की थी कि उनका देश चीन और भारत जैसे एशियाई देशों के साथ तालमेल बेहतर करने में लगा है। वह दुनिया को यह भी दिखाना चाहते थे कि वह इतने अलग-थलग भी नहीं हैं जितना कि समझा जा रहा है। यह उनकी सामरिक नीति है जो एमबीएस की आलोचना करने वालों को यह बताती है कि वह वैश्विक स्तर पर अभी भी एक कामयाब नेता हैं और वैश्विक शक्ति से जुड़े अहम राष्ट्रों में उनका काफी असर है। 
 
पाकिस्तान के साथ सऊदी अरब के रिश्ते काफी पुराने हैं जिन्हें उसने नया दम दिया। यह एक ऐसी साझेदारी है जिसमें सऊदी अरब पाकिस्तान को आर्थिक बुनियादी मदद पहुंचाता रहा है और बदले में उसे और वहां के शाही परिवार को पाकिस्तानी सेना का संरक्षण मिलता है। जैसा कि इमरान खान ने हाल ही में कहा था, 'हमने हमेशा कहा है कि अगर इस्लाम के पवित्र शहरों को कोई खतरा उत्पन्न हुआ तो पाकिस्तान उन्हें बचाने का पूरा प्रयास करेगा।Ó हाल के महीनों में सऊदी अरब ने पाकिस्तान को 600 करोड़ डॉलर का जो ऋण दिया है वह भी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से बातचीत की दृष्टि से बहुत अहम रहा है। अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान एमबीएस ने 1,000 करोड़ डॉलर के समझौतों पर हस्ताक्षर किए। ये समझौते ग्वादर में रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स बनाने के लिए किए गए। ग्वादर चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर पर स्थित है और वह एक बेल्ट, एक रोड पहल की दृष्टि से भी बेहतर है। यह परियोजना सऊदी कंपनी को बलूचिस्तान प्रांत में जगह देगी जहां से आवश्यकता पडऩे पर ईरान को निशाना बनाया जा सकता है। साथ ही उसे चीन के साथ साझेदारी विकसित करने का अवसर भी मिलेगा। इसके चकित करने वाली कोई बात नहीं है कि चीन ने सीपीईसी में सऊदी अरब के प्रवेश की सराहना की है। यह परियोजना कई मोर्चों पर दिक्कत का सामना कर रही है। 
 
चीन सऊदी अरब का सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार है। दोनों के बीच 6,330 करोड़ डॉलर का कारोबार होता है। वर्ष 2017 में जब सऊदी शाह सलमान ने चीन की यात्रा की थी तो दोनों देशों ने 6,500 करोड़ डॉलर के सौदों पर हस्ताक्षर किए थे। इस दौरान पूरा ध्यान ऊर्जा और प्रौद्योगिकी क्षेत्र पर था। एमबीएस की यात्रा में यह संकेत निहित था कि वह पश्चिम की बढ़ती चिंताओं के बावजूद साम्राज्य का अहम हिस्सा हैं। चीन की बेल्ट रोड पहल के अनुरूप सऊदी अरब ने लाल सागर के तटवर्ती इलाके में आर्थिक क्षेत्र विकसित करने की बात कही है। इस काम के पूरा होने तक सऊदी अरब की ओर से इसमें 50,000 करोड़ डॉलर का निवेश किया जाएगा। सऊदी अरब चीनी भाषा को अपने स्कूलों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल करने पर सहमत हो गया है। 
 
इस यात्रा का सबसे अहम पहलू था एमबीएस द्वारा चीन में चल रहे मुस्लिमों के यातना शिविरों का बचाव। उन्होंने कहा था कि चीन को यह अधिकार है कि वह अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में आतंकवाद विरोधी और चरमपंथ विरोधी गतिविधियों को अंजाम दे। इस महीने के आरंभ में तुर्की की रेसेप तैयप एर्डोगन के नेतृत्व वाली सरकार ने इस धरपकड़ को मानवता के लिए शर्मनाक बताया था। उसने इन शिविरों में कथित अत्याचार और राजनीतिक समझ बदलने के प्रयासों की भी निंदा की थी। इस बीच चीन पश्चिम एशिया के दो प्रतिद्वंद्वियों सऊदी अरब और ईरान के बीच संतुलन कायम करने की कोशिश में लगा हुआ है। एमबीएस की यात्रा के ऐन पहले ईरान के विदेश मंत्री जवाद जरीफ चीन आए थे। म्युनिख सुरक्षा सम्मेलन में भी चीन ने जरीफ के भाषण की तारीफ की थी। चीन के स्टेट काउंसिलर वांग यी ने कहा, 'मैंने टेलीविजन पर देखा कि आपने सम्मेलन में किस तरह खुलकर ईरान के अधिकारों  का बचाव किया। मुझे लगता है कि लाखों चीनी नागरिकों ने भी देखा होगा कि आपने क्या कहा और अब आप चीन में एक चर्चित हस्ती हैं।Ó सऊदी अरब और ईरान के भूराजनैतिक आकलन में चीन की महत्ता बढ़ रही है और शिनच्यांग प्रांत में मुस्लिमों पर अत्याचार के मामले में दोनों देशों की खामोशी काफी कुछ कह रही है। 
 
भारत में भी एमबीएस का ध्यान आर्थिक और व्यापारिक मसलों पर था और उन्होंने अगले कुछ वर्ष में 10,000 करोड़ डॉलर के निवेश की बात कही। अरैमको और अबू धाबी नैशनल ऑयल कंपनी महाराष्ट्र में रत्नागिरि तेल रिफाइनरी की स्थापना में 440 करोड़ डॉलर का निवेश कर रही हैं। एसएबीआईसी भी भारत में पेट्रोकेमिकल संयंत्र में बड़ी हिस्सेदारी खरीदने वाली है। दोनों देश सौर ऊर्जा और उपग्रह तकनीक के क्षेत्र में भी मिलकर काम करने वाले हैं। देश का 20 फीसदी तेल आयात सऊदी अरब से होता है जबकि देश के करीब 27 लाख लोग वहां रहकर काम करते हैं। परंतु एमबीएस की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों का संयुक्त दस्तावेज महत्त्वपूर्ण होकर उभरा जिसमें सऊदी अरब ने आतंकवाद के मुद्दे पर भारत का समर्थन किया। 
 
एमबीएस की भारत यात्रा महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका में सऊदी अरब को लेकर माहौल बेहद खराब है। सऊदी अरब ने उसे साफ संकेत दिया है कि वह अपने साझेदार बदल सकता है। वॉशिंगटन पोस्ट के स्तंभकार जमाल खशोगी की क्रूर हत्या के बाद अमेरिका की नजरें एमबीएस पर वैसे ही टेढ़ी हैं। यमन में भी हालात खराब हैं। एक ओर जहां ट्रंप प्रशासन सऊदी अरब को परमाणु तकनीक बेचने पर विचार कर रहा है, वहीं अमेरिकी सीनेट यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही है कि इस मसले पर अंतिम निर्णय उसका हो। यमन में बढ़ता तनाव भी पिछले कुछ समय से प्रत्यक्ष है। ऐसे में सऊदी अरब का एशिया की ओर रुख करना समझ में आता है। इन बदलते हालात में भारत की क्या भूमिका होगी यह अभी देखा जाना होगा। 
 
(लेखक किंग्स कॉलेज, लंदन के रक्षा अध्ययन विभाग में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्राचार्य हैं।)
Keyword: america, india, UAE,,
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