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व्यापारिक चूक

संपादकीय /  March 05, 2019

अमेरिकी प्रशासन ने भारत और तुर्की से होने वाले आयात को अपनी व्यापक वरीयता व्यवस्था (जीएसपी) से बाहर करने का निर्णय लिया है। इस व्यवस्था के तहत चुनिंदा वस्तुओं को शून्य शुल्क पर अमेरिका में आयात किया जाता रहा है। भारत इस व्यवस्था का सबसे बड़ा लाभार्थी है और उसे करीब 560 करोड़ डॉलर मूल्य का आयात लाभ होता है। यह पहले से तनावग्रस्त भारतीय निर्यातकों के लिए परेशान करने वाली सूचना है। इसे लेकर भारतीय प्रशासन का आशावादी रवैया भी गलत है। सरकार का कहना है कि इस प्रक्रिया में होने वाली रियायत की राशि सालाना 20 करोड़ डॉलर से भी कम थी इसलिए निर्यातक अधिक प्रभावित नहीं होंगे। भारत-अमेरिका व्यापार रिश्तों को यह एक बड़ा झटका है और भारत की प्रतिक्रिया बहुत हल्की है। भारत के कई निर्यातकों को इससे मामूली ही सही प्रतिस्पर्धी लाभ हासिल था। ऐसे में यह बदलाव सरकार के अनुमान से कहीं अधिक नुकसानदेह हो सकता है। 

 
यह बात भी ध्यान देने लायक है कि इसका भारत और अमेरिका के आर्थिक रिश्तों पर क्या असर होगा। भारत और अमेरिका के कारोबार में भारत के पास मामूली व्यापार अधिशेष है। यह करीब 230 करोड़ डॉलर मूल्य का है। मौजूदा अमेरिकी प्रशासन के संरक्षणवादी रुख को देखें तो यह तनाव इतना नहीं बढऩे देना चाहिए था कि भारत को सन 1970 के दशक से मिल रहा लाभ समाप्त हो जाए। ऐसा नहीं है कि भारत ने रियायत नहीं दी है। उदाहरण के लिए अमेरिका से होने वाले मोटर साइकिल आयात पर शुल्क कम किया गया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप बार-बार आग्रह कर रहे थे कि हार्ली डेविडसन मोटर साइकिल पर से शुल्क कम किया जाए। यह मोटर साइकिल अमेरिका के ऐसे प्रांत में बनती है जो चुनावी दृष्टि से अहम है। यह स्पष्ट है कि भारत ने इस अवसर का लाभ अमेरिका के साथ अधिक एकीकृत आर्थिक मसलों को प्रभावी बनाने के लिए नहीं किया। फिलहाल जिन क्षेत्रों को नुकसान पहुंचेगा, उनमें रसायन एवं अभियांत्रिकी शामिल हैं। यह वह विनिर्माण क्षेत्र है जिसका निर्यात बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि देश में रोजगार तैयार हो सकें। 
 
दुर्भाग्य की बात है कि भारतीय कारोबारी प्रतिष्ठान देश के हित के मामलों में भी अदूरदर्शी है। इन हालात के लिए देश में हाल में उठाए गए लोकलुभावन कदमों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। उदाहरण के लिए अमेरिका में बने चिकित्सा उपकरणों, खासतौर पर कार्डियक स्टेंट और घुटने के प्रत्यारोपण में काम आने वाले उपकरणों पर नियंत्रण थोपने से अमेरिका नाखुश है। दुख की बात यह है कि इस क्षेत्र में मूल्य नियंत्रण से भारतीय मरीजों को भी कोई लाभ नहीं हुआ है क्योंकि अस्पताल आसानी से बढ़ी लागत को कहीं न कहीं समायोजित कर देंगे। भारत यह कहता रहा है कि धार्मिक वजहों से अमेरिका से दुग्ध उत्पादों का आयात नहीं किया जाता। इसकी एक वजह यह है कि अमेरिका ने बोवाइन सोमाटोट्रोपिन पर प्रतिबंध नहीं लगाया है जो पशुओं की पीयूष ग्रंथि से बनता है। यह डेरी फार्मिंग में पूरक के रूप में प्रयुक्त होता है। इस क्षेत्र में हम किसी समझौते पर क्यों नहीं पहुंचे यह भी स्पष्ट नहीं है। भारत के विकल्प सीमित हैं। उदाहरण के लिए उसने 29 अमेरिकी वस्तुओं पर प्रतिरोध स्वरूप 23.5 करोड़ डॉलर मूल्य का शुल्क लगाया था लेकिन अब तक वह इस उम्मीद में छह बार इसका क्रियान्वयन टाल चुका है कि अमेरिका के साथ समझौता हो जाएगा। ऐसी कवायद बेमानी हैं। विश्व व्यापार जगत में जब चीन पर दबाव बढ़ रहा है और व्यापारिक नेटवर्क निरंतर बदल रहे हैं तो भारत को इसका लाभ लेना चाहिए। इसके बजाय सरकार संभावित व्यापारिक लाभ की अनदेखी कर रही है।
Keyword: america, india, GSP, export,,
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