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निदेशकों की जवाबदेही पर पंचाट का समय पर फैसला

सोमशेखर सुंदरेशन /  March 05, 2019

यह बात काफी हद तक ताजा हवा के झोंके के समान है। निदेशकों की जवाबदेही को लेकर मचे शोरगुल और कॉर्पोरेट जगत की किसी भी गड़बड़ी की समुचित जवाबदेही तय करने को लेकर की जा रही जोरदार मांगों के बीच बोर्ड के निदेशकों को संरक्षित करने संबंधी समुचित उपाय सामने आया है जो वास्तव में सराहनीय है। 

कंपनियों में अंशधारकों की जवाबदेही सीमित होती है। यह उनकी शेयर पूंजी के अनुपात में होती है। बहरहाल, कंपनियों के बोर्ड में शामिल निदेशकों को बहुत बड़े पैमाने पर असीमित जवाबदेही के जोखिम का सामना करना पड़ता है। खासतौर पर उस समय जबकि अद्र्घ न्यायिक भूमिका से लैस प्रवर्तन एजेंसियां कंपनियों के साथ साझा और विभिन्न दायित्वों की बात करती हैं। अक्सर ऐसी जवाबदेही को बिना इन निदेशकों की वास्तविक भूमिका का आकलन किए थोप दिया जाता है। कई बार तो इसकी इसके सिवा कोई वजह ही नहीं होती कि संबंधित व्यक्ति उस कंपनी का निदेशक भर होता है जिसने कानून का उल्लंघन किया हो। 

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा आरोपित एक संयुक्त एवं साझा जवाबदेही के मामले से निपटते हुए प्रतिभूति अपील पंचाट (एसएटी) ने निर्णय दिया कि सेबी का बिना विवरणिका जारी किए प्रतिभूतियां जारी करने वाली कंपनी के सभी निदेशकों को एक ही झाड़ू से हांकने का निर्णय सही नहीं था। कंपनी विधि के अधीन जहां प्रतिभूति खरीद की पेशकश 50 से अधिक लोगों को की गई हो वहां निजी प्लेसमेंट नहीं किया जा सकता। 

कंपनी में एक प्रबंध निदेशक होता है जो कंपनी विधि के मुताबिक देनदारियों में चूक के लिए सीधे जिम्मेदार होता है। कंपनी विधि में 'ऑफिसर इन डिफॉल्ट' शब्द ही इसीलिए आया है। चूंकि किसी कंपनी की देनदारी में चूक की स्थिति में जिम्मेदार व्यक्ति की पहचान तय होनी चाहिए इसलिए कंपनी विधि इनकी पहचान स्पष्टï करती है। ये हैं- प्रबंध निदेशक, पूर्णकालिक निदेशक, कंपनी सचिव, प्रबंधक और अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए जवाबदेह व्यक्ति। अगर ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है, तभी सभी निदेशकों को जिम्मेदार ठहराया जाएगा। 

इसके बावजूद सेबी के एक आदेश में उन निदेशकों द्वारा दिए गए प्रमाणों की अनदेखी की गई जो वास्तव में शामिल नहीं थे। आदेश में कहा गया कि बिना अनुपालन के जो भी राशि जुटाई गई है उसका रीफंड करने के लिए ये तमाम निदेशक जवाबदेह होंगे। एसएटी ने अपने निर्णय में कहा कि सेबी को ऐसा कोई निष्कर्ष नहीं मिला कि गलत काम करने वाला प्रबंध निदेशक था, पूर्णकालिक निदेशक या बोर्ड में शामिल निवेशकों में से कोई एक। ऐसे में हर निदेशक को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है। 

सेबी के इस रुख के चलते निदेशकों की भूमिका से इतर उनकी मौद्रिक आर्थिक जवाबदेही निर्धारित होने लगी। इस बात का असर आम आपराधिक अभियोजन वाले मामलों से अलग और गंभीर होना ही था। उन मामलों में जिन निदेशकों को उल्लंघन का दोषी नहीं पाया जाता वे सप्रमाण यह कह सकते हैं कि वे संबंधित दायित्व के अनुपालन के लिए जवाबदेह नहीं थे और उसके उल्लंघन का बोझ उन पर नहीं आता। रिकवरी के प्रावधानों में सारे बैंक खातों और वित्तीय परिसंपत्तियों की कुर्की तक का प्रावधान है। 

जुर्माने की बात करें तो भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग एक अन्य ऐसा नियामक है जिसके पास जुर्माने के संदर्भ में उत्तरदायित्व निर्धारित करने का अधिकार है। उसके जुर्माने भी समान प्रावधानों के अधीन वसूल किये जा सकते हैं। अदालतों में ऐसे मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं जहां कंपनियों के उन सभी निदेशकों की परिसंपत्तियों की घोषणा की मांग की जा रही है, जिनके खिलाफ प्रक्रियाओं के तहत आरोप लगाए गए हैं। 

यदि संक्षेप में कहा जाए तो निदेशक कार्यालय एक तरह से जब्ती का शिकार होगा। कॉर्पोरेट निदेशक बनने के लिए जोखिम-प्रोत्साहन प्रोफाइल कुछ ऐसी होती जा रही है कि अच्छा खासा तार्किक माना जाने वाला व्यक्ति भी इस कार्यालय से दूरी बनाए रखने में ही गनीमत समझेगा। ऐसे में कॉर्पोरेट जगत के व्यवस्थित कामकाज के लिए एक जोखिम उत्पन्न हो गया है जो कॉर्पोरेट सुशासन के लिए लिहाज से काफी अहम है। हकीकत यह है कि नया कंपनी अधिनियम और सूचीबद्घ कंपनियों के लिए सेबी के नियमन दोनों ने यह मानक तय किया है कि निदेशकों को तभी उत्तरदायी ठहराया जाएगा जबकि यह जानकारी हो कि उनको बोर्ड प्रक्रिया के माध्यम से होने वाली गड़बड़ी की जानकारी थी लेकिन इसके बावजूद उन्होंने इसे रोकने के लिए कोई पहल नहीं की। 

इस पूरे परिदृश्य में एसएटी के निर्णय के लिए शायद इससे बेहतर समय दूसरा कोई नहीं हो सकता था। अभी हाल ही में भेदिया कारोबार के एक कथित मामले से निपटते हुए देश की सर्वोच्च अदालत के पास भी यह अवसर आया कि वह यह बात दोहराए और दोबारा स्मरण कराए कि किसी निदेशक को जवाबदेह ठहराए जाने के लिए उसके केवल निदेशक होने को वजह नहीं बनाया जा सकता है, बल्कि इसके लिए कहीं अधिक तथ्यों की आवश्यकता होती है। एक सामान्य चूक यह है कि चूंकि आपराधिक विधि के मानकों के मुताबिक निस्संदेह रूप से दोषी साबित होने का कायदा दीवानी मामलों में लागू नहीं होता है इसलिए इन मामलों में निदेशक होने भर को सबूत मान लिया जाता है। जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। अगर नियामक भविष्य में सावधानी बरतें और प्रवर्तन की प्रक्रिया को बेहतर बनाएं तो इससे वास्तविक गलती करने वालों के मन में कहीं अधिक डर बैठेगा।

Keyword: Insider trading, SEBI, Company, Regulator, Corporate Sector, Responsibility, Demand, SAT,
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