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जनांकीय लाभांश का कैसे लिया जाए लाभ?

राजीव कुमार /  March 05, 2019

गत 13 फरवरी को 16वीं लोकसभा के अंतिम सत्र को देखते हुए मैं अत्यंत गौरव से भर गया। हमारा देश उन चुनिंदा देशों में से एक है जिन्होंने दूसरे विश्वयुद्घ के बाद औपनिवेशिक राज से स्वतंत्रता हासिल करने के बाद बीते सात दशक में अपने लोकतंत्र को न केवल बनाए रखा बल्कि उसे निरंतर मजबूत भी किया। 

कुछ लोग कहेंगे कि ऐसा करते हुए हमने उच्च आय वृद्घि के अवसर गंवाते हुए काफी कीमत भी चुकाई है। अगर इसे सच मान लिया जाए तो भी हमें यह समझना होगा कि भारत के लिए पूर्णकालिक और अबाधित संसदीय लोकतंत्र का न तो कोई विकल्प था और न ही है। हमारा लोकतंत्र हमें मूलभूत अधिकारों और आजादी की संवैधानिक गारंटी प्रदान करता है। बहरहाल, एक संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में बाजार अर्थव्यवस्था के सिद्घांतों और निजी उद्यमिता पर आधारित आर्थिक बदलाव को अंजाम देना एक बड़ी चुनौती का काम होता है। पाठकों के लिए यह जानना दिलचस्प होगा कि भला मानव इतिहास में कितने अन्य मुल्कों ने एक गरीब अर्थव्यवस्था वाले देश की अर्थव्यवस्था में सफलतापूर्वक यह आर्थिक बदलाव किया और इस दौरान अपने नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की भी पूरी तरह रक्षा की। 

देश में आम चुनाव करीब हैं और हमारे देश में यह काम जिस गति से और जिस पैमाने पर किया गया वह अपने आप में दुनिया के सामने एक उदाहरण है। मुझे ऐसा लग रहा है कि हम इस समय एक बहुआयामी बदलाव के मुहाने पर हैं। बीते वर्षों के दौरान और खासतौर पर पिछले पांच वर्ष के दौरान हम प्रतिस्पर्धी लोकलुभावनवाद से प्रतिस्पर्धी सुशासन की ओर बदलाव देख सकते हैं। यह चुनावी सफलता के प्रमुख वाहक के रूप में नजर आ रहा है। विभिन्न राजनीतिक दल अपने आर्थिक प्रदर्शन के आधार पर चुने या नकारे जा रहे हैं। अन्य कारक मसलन जातीय समीकरण और क्षेत्रीय वफादारी आदि की भूमिका है लेकिन आर्थिक प्रदर्शन सबसे प्रधान बनकर उभरा है, इसे नकारा नहीं जा सकता। यह बड़ा बदलाव है। आने वाले वर्षों में यह और अधिक स्पष्टï हो जाएगा। 

अब राज्यों के बीच भी निजी निवेश जुटाने की होड़ है। वे अपने भौतिक और सामाजिक ढांचे में बदलाव ला रहे हैं और कारोबारी सुगमता की अंतरराज्यीय रैंकिंग में सुधार के लिए प्रयासरत हैं तथा स्वास्थ्य, पोषण तथा शिक्षण की उपलब्धियों पर काम कर रहे हैं। यह बात प्रतिस्पर्धी संघवाद के मूल में है और नीति आयोग की विभिन्न अंतरराज्यीय रैंकिंग इसमें अहम भूमिका निभा रही हैं। इतना ही नहीं युवा आबादी की बढ़ती आकांक्षा हर स्तर पर प्रशासन पर यह दबाव डाल रही है कि वे प्रदर्शन में सुधार करें और बेहतर नतीजे प्रस्तुत करें। भविष्य में प्रतिस्पर्धी सुशासन मजबूत होगा तो आम नागरिकों को भी बेहतर पारदर्शिता, जवाबदेही और किफायत के रूप में इसका लाभ मिलेगा। सात दशक तक कमजोर, नरम और हस्तक्षेपकारी शासन के बाद देश के लोगों को विकासोन्मुखी राज्य का लाभ मिलना ही चाहिए। एक ऐसा राज्य जो अपनी जिम्मेदारियों को समझता हो और उनको पारदर्शी तथा प्रभावी ढंग से अंजाम देता हो। 

दूसरी बात, आर्थिक गतिविधियों को संचालित करने वाले कायदे तेजी से बदल रहे हैं। बेनामी लेनदेन संशोधन अधिनियम, अचल संपत्ति नियमन अधिनियम (रेरा) और ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता के साथ अब धोखाधड़ी करना या व्यवस्था को छलना मुश्किल हो गया है। यही बात बेनामी संपत्ति, बैकों तथा कर्जदारों को धोखा देने पर भी लागू होती है। ढाई लाख से अधिक फर्जी कंपनियों को बंद करके भी सरकार ने इस दिशा में अत्यंत सख्त संदेश दिया है। 

उचित ढंग से कारोबार करने वालों को प्रत्यक्ष कर व्यवस्था की सहजता और 95 फीसदी निगमित करदाताओं के लिए कर दरें कम करके राहत दी गई है। कारोबारी सुगमता के वैश्विक सूचकांक में भारत की स्थिति में सुधार हुआ है और यह चार वर्ष में 142वें स्थान से 77वें स्थान पर आ गया है। प्रतिस्पर्धी और नवाचारी सूचकांक पर भी इसकी स्थिति में सुधार हुआ है। 

कारोबारी सुगमता के लिए अंतरराज्यीय रैंकिंग बनाने में निवेशकों की राय को शामिल किया गया है ऐसे में उम्मीद की जा सकती है आने वाले समय में हालात में और अधिक सुधार आएगा। एफडीआई मानकों को उदार किया गया है और रक्षा अचल संपत्ति समेत सभी उत्पादन क्षेत्रों को बहुलांश विदेशी निवेश के लिए खोल दिया गया है। अर्थव्यवस्था और अधिक औपचारिक हुई है और लाइसेंस तथा कंट्रोल राज की व्यवस्था को खत्म किया गया है। ईमानदार निवेशक अब यह उम्मीद कर सकते हैं कि उन्हें सहजता से फलने-फूलने का अवसर मिलेगा। सांठगांठ वाले पूंजीवाद को भी निर्णायक ढंग से पीछे छोडऩे में कामयाबी मिली है। 

आखिर में स्थायी, तीव्र और समावेशी विकास की वृहद आर्थिक स्थिति कभी इतनी मजबूत नहीं थी। इससे पहले पांच वर्ष तक निरंतर जीडीपी वृद्घि की 7 फीसदी की दर हासिल करने में कामयाबी नहीं मिली थी जबकि शीर्ष मुद्रास्फीति की दर 4.5 फीसदी से कम रही हो। यह काफी हद तक इस वजह से भी हुआ क्योंकि सरकार ने रिजर्व बैंक को लक्षित मुद्रास्फीति दर हासिल करने का सांविधिक प्राधिकार और उत्तरदायित्व सौंपा। 

सरकार ने जो राजकोषीय कवायद की है उसने भी वृहद आर्थिक हालात को स्थिर बनाने में सहायता मिली है। यह आने वाले समय में आर्थिक वृद्घि के लिए बेहतर संकेत है। इसकी सहायता से हम स्थायी रूप से उच्च, समावेशी और स्थायी वृद्घि की दिशा में बढ़ सकेंगे। इतना ही नहीं, जन सेवाओं की आपूर्ति और लाभ के प्रत्यक्ष अंतरण के मामले में सुधार के साथ-साथ वृद्घि को बेहतर समावेशन और आय के बढ़ते स्तर का फायदा समाज के निचले पायदान पर रहने वाले लोगों को भी मिला है। 
यह सच है कि अभी भी काफी कुछ किया जाना बाकी है लेकिन उपरोक्त तीन आमूलचूल बदलावों के साथ हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि यह गतिशीलता बरकरार रहेगी। इसलिए अच्छी खबर यह है कि आने वाले दिनों में भारत के आर्थिक बदलाव को जनांकीय और लोकतांत्रिक लाभांश का पूरा सहयोग मिलेगा। वाणिज्यिक बैंकों से ऋण की आवक दोबारा गति पकड़ रही है। ऋण और जीडीपी का अनुपात 50 फीसदी के आसपास है ऐसे में निवेश की नई मांग आसानी से पूरी हो सकती है। देश की अर्थव्यवस्था ऐसे चरण में प्रवेश कर रही है जहां वृद्घि को दो अंकों में पहुंचाने का प्रयास किया जा सकता है। 
(लेखक अर्थशास्त्री और नीति आयोग के उपाध्यक्ष हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)
Keyword: RERA, Economy, Parliamentary Democracy, Democracy, Governance,
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