बिजनेस स्टैंडर्ड - सांप्रदायिक ताकतों को सरकार में नहीं होना चाहिए: सीताराम येचुरी
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सांप्रदायिक ताकतों को सरकार में नहीं होना चाहिए: सीताराम येचुरी

आदिति फडणीस /  03 04, 2019

बीएस बातचीत

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के महासचिव सीताराम येचुरी ने आदिति फडणीस से बातचीत में साझा मंच, संयुक्त मोर्चा और वामपंथी विचारों के निरंतर प्रभाव लेकिन उसकी घटती चुनावी ताकत के बारे में चर्चा की। पेश हैं मुख्य अंश: 

गठबंधन चलाने का भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से अधिक अनुभव किसी अन्य के पास नहीं है। गठबंधन को सुचारु रखने के लिए क्या जरूरी है?

बिजनेस स्टैंडर्ड सांप्रदायिक ताकतों को सरकार में नहीं होना चाहिए: सीताराम येचुरीसबसे पहले, गठबंधन एक खास कार्यक्रम पर आधारित होना चाहिए। गठबंधन को सुचारु रखने के लिए खास नीतियों पर समझौता होना जरूरी है। साथ ही विभिन्न साझेदारों के अन्य कार्यक्रमों पर भी गौर करना होता है। इसलिए यह कोई सौदेबाजी नहीं है बल्कि आपने लोगों से जो वादा किया है उसे निभाने की बात है। जहां तक गठबंधन को चलाने के हमारे अनुभव की बात है तो हमने हमेशा एक ऐसा गठबंधन बनाने पर जोर दिया है जो एक कार्यक्रम पर आधारित हो। और इसी से न्यूनतम साझा कार्यक्रम (सीएमपी) की अवधारणा विकसित हुई। दूसरा, इसके लिए एक हद तक ईमानदारी और विश्वसनीयता की भी जरूरत होती है।

आपकी पार्टी कई ऐसी गठबंधन सरकारों का हिस्सा रही है जहां कार्यक्रम को लेकर सहमति नहीं थी। आपातकाल के बाद जनसंघ और वामपंथी पार्टियां एक साथ थीं। इस पर आप क्या कहेंगे?

वास्तव में एक साथ नहीं थे लेकिन लोकतंत्र की बहाली के लिए संघर्ष करने के लिहाज से आपको ऐसा दिख सकता है। हम लोकतंत्र को नए सिरे से स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहे थे। इसके लिए आपको एक सरकार की जरूरत होगी जो कानूनी तौर पर लोकतंत्र की बहाली करने में समर्थ हो। इसलिए उस समय सरकार और संसद की जरूरत थी जो एक ऐसा कानून बनाए जिससे यह सुनिश्चित हो कि भविष्य में आपातकाल को दोहराया न जा सके। यही कारण है कि जनता पार्टी की सरकार बनने पर संविधान में 44वां संशोधन किया गया और अन्य तमाम बदलाव किए गए। उस लिहाज से हमने समर्थन किया था। तथ्य यह है कि उस समय जनता पार्टी सरकार का उद्देश्य लोकतंत्र को बहाल करना था। लेकिन इसके अलावा कोई नीतिगत दिशा नहीं थी जिससे वह गठबंधन टूट गया और 1980 में इंदिरा गांधी की वापसी हुई।

इसी प्रकार 1996 में यदि आप संयुक्त मोर्चा गठबंधन पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि उसे कांग्रेस बाहर से समर्थन दे रही थी और वह उसी पर टिकी थी। जबकि कांग्रेस संयुक्त मोर्चा के किसी भी घटक दल से बड़ी पार्टी थी। कांग्रेस सरकार में शामिल नहीं हो सकती थी क्योंकि उसे अपना सरकार खोना पड़ा था। इसलिए यह खुद अस्थिरता पैदा कर रहा था और कांग्रेस ने अपना समर्थन वापस लेने का निर्णय लिया। अन्यथा संयुक्त मोर्चा की सरकार 2001 तक चलती और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 1998 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और 1999 में राष्टï्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार नहीं बनती।

वीपी सिंह की सरकार को आपने और भाजपा ने एकसाथ समर्थन किया था। इस पर क्या कहेंगे?

वीपी सिंह सरकार को स्थिरता इसलिए दिखी थी क्योंकि उसे वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों दलों का समर्थन मिला था। भाजपा उस गठबंधन में शामिल हो सकती थी लेकिन यदि भाजपा उस सरकार में शामिल होती तो हम उसका समर्थन नहीं करते। यही कारण है कि भाजपा सरकार से बाहर रही और भाजपा के तत्कालीन नेतृत्व इससे काफी परेशान भी थे। यहां तक कि चुनाव प्रचार के दौरान भी इसे राष्ट्रीय मोर्चा और वाम मोर्चा कहा गया था। देश में कई जगहों पर हमने भाजपा को टक्कर दी। लेकिन चुनाव के बाद जब कांग्रेस की तत्कालीन सरकार को बहुमत नहीं मिली तो एक वैकल्पिक सरकार बनाई गई और उस समय यह एकमात्र रास्ता दिखा था। लेकिन उस समय तथ्य यह था कि वीपी सिंह जिस सामाजिक न्याय के एजेंडे की वकालत कर रहे थे उस पर भाजपा सहमत नहीं थी। इसलिए मंडल के तौर पर जो कुछ भी सामने आया उसका कमंडल द्वारा विरोध किया गया। उसके बाद आडवाणी रथ यात्रा शुरू हुई। बाकी हम सब भलीभांति जानते हैं। इसलिए हम कहते हैं कि गठबंधन तभी चल सकता है जब एक साझा नीतिगत दिशा हो।

साल 2004 में नीतिगत मोर्चे पर विपक्षी एकता की पहल की गई थी। मुद्दा था: सांप्रदायिक ताकतों को सरकार में नहीं होना चाहिए। इसलिए हमने कहा था कि हमें एक वैकल्पिक धर्मनिरपेक्ष सरकार बनानी चाहिए और हम ऐसा आज भी कह रहे हैं। लेकिन हम इस बात पर सहमत हैं कि चुनाव के बाद एक धर्मनिरपेक्ष सरकार का गठन किया जाएगा। उसके गठन के बाद ही न्यूनतम साझा कार्यक्रम तय किया जाएगा। लेकिन समस्या तब आती है जब आप एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम तैयार कर लेते हैं और बाद में उसका उल्लंघन करते हैं। न्यूनतम साझा कार्यक्रम में भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के बारे में कुछ भी नहीं था। उसमें अमेरिका के सामरिक हितों को लेकर हमारी विदेश नीति के बारे में भी कुछ नहीं था। इसलिए वामपंथी दलों ने अपना समर्थन वापस ले लिया। कांग्रेस ने न्यूनतम साझा कार्यक्रम का उल्लंघन किया था।

आपको भलीभांति पता है कि कांग्रेस ने पहले न्यूनतम साझा कार्यक्रम का उल्लंघन किया था और इसे जानते हुए आप कांग्रेस के साथ गठबंधन क्यों करने जा रहे हैं?

पहला, कांग्रेस के साथ हम कोई गठबंधन नहीं करने जा रहे हैं। हालांकि अप्रत्यक्ष तौर पर सीटों का कुछ समायोजन हो सकता है जैसे तमिलनाडु में हम द्रमुक के साथ थे और द्रमुक कांग्रेस के साथ। अथवा महाराष्ट्र में जहां हम राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के साथ हैं और राकांपा कांग्रेस के साथ। लेकिन सवाल यह है कि किसी भी समय भारत को किस खतरे से बचाने की जरूरत है? वह स्वाभाविक तौर पर हमारी प्राथमिकता है। जब आपको लोकतंत्र पर खतरा दिखा था तो लोकतंत्र बहाल करना पहली प्राथमिकता थी। जब धर्मनिरपेक्षता पर प्रहार किया गया, जैसा वाजपेयी सरकार के दौरान और आज के दौर में कई बार दिखा है तो उसे सुनिश्चित करना प्राथमिकता बन गई है। भारत के लिए, हमारे संविधान के लिए और हमारे लोकतंत्र के लिए यह जरूरी है कि इस प्रकार की ताकतें सत्ता में बरकरार न रहें। इसे हासिल करने के लिए हम भाजपा विरोधी वोट को एकजुट करने के लिए काम करेंगे।
हालांकि यह रणनीति विभिन्न राज्यों के लिए अलग-अलग हो सकती है जो इस बात पर निर्भर करेगा कि वहां के प्रमुख खिलाड़ी कौन हैं, स्थानीय परिस्थिति कैसी है आदि। लेकिन उद्देश्य एक होगा कि एक वैकल्पिक धर्मनिरपेक्ष सरकार का गठन किया जाए।

यदि कांग्रेस अपने पिछले अनुभवों- लोकसभा में इस सबसे पुरानी पार्टी की सीटें घटकर 44 रह गईं हैं- से नहीं सीखती है तो हम केवल इतना कह सकते हैं कि यदि आपने किसी नीतिगत दिशा के लिए वादा किया है तो उसे पूरा कीजिए। वादा करते समय इसका आकलन कर लीजिए कि उस पर कितना सहमत हो सकते हैं और कितना नहीं। लेकिन वादा करने के बाद मुकरना सही नहीं होगा क्योंकि इससे अस्थिरता पैदा होगी।

कभी-कभी आपको ऐसी पार्टियों को भी साथ लेना होता है जिनकी कोई विचारधारा नहीं होती। वे तब तक साथ रहती हैं जब तक सरकार होती है। इस पर क्या कहेंगे?

यह एक बड़ी समस्या है क्योंकि राष्ट्रीय जनता दल और लालू प्रसाद के अलावा अन्य सभी क्षेत्रीय दल कभी न कभी भाजपा के साथ रहे हैं।

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बारे में आप क्या कहेंगे?

जहां तक हमारा अनुभव है, टीएमसी बंगाल में भाजपा के खिलाफ है क्योंकि वे बंगाल में प्रतिस्पर्धी सांप्रदायिकता की दौड़ में हैं जिसे भाजपा की बहुसंख्य सांप्रदायिकता से रफ्तार मिल रही है। वास्तव में इससे उन्हें (भाजपा को) मदद मिल रही है। इसके अलावा सारदा, नारदा आदि चिट फंड के तमाम मामले हैं।

पिछले पांच साल से इन सब मोर्चे पर रफ्तार सुस्त क्यों रही? और चुनाव से पहले अचानक ड्रामा किया जा रहा है जिससे संदेह पैदा होता है।

तो क्या आप सारदा-नारदा से जुड़े सभी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करने के भाजपा के रुख का समर्थन करते हैं?

सभी के खिलाफ नहीं, बल्कि दोषियों के खिलाफ। जांच के बाद, और जांच का आदेश किसी अन्य ने नहीं बल्कि सर्वोच्च न्यायालय ने दिया है। हम किसी व्यक्ति के खिलाफ जांच एजेंसी द्वारा बेवजह सताए जाने के खिलाफ हैं। भले ही वे हमारे राजनीतिक धुर विरोधी ही क्यों न हो लेकिन बेवजह सताना लोकतंत्र का हिस्सा नहीं है।

आपने भाजपा की सहयोगी रह चुकी तेलुगू देशम पार्टी जैसी कई संभावित गठबंधन साझेदारों का भी विरोध किया है। ऐसे में भारतीय राजनीति में आप खुद को कहां देखते हैं?

जब आप माकपा अथवा वामपंथी दलों की ताकत की बात करते हैं तो दो पैमाने दिखते हैं। पहला चुनावी पैमाना है जो काफी महत्त्वपूर्ण है और मैं इसे नजरअंदाज नहीं कर सकता। इस पैमाने के लिहाज से हम जरूर कमजोर हुए हैं। साल 2004 और 2014 के बीच 10 वर्षों के दौरान हमारी चुनावी स्थिति काफी तेजी से खराब हुई है।

लेकिन दूसरा पैमाना है कि लोकप्रिय संघर्षों के जरिये देश में नीतिगत एजेंडे को प्रभावित करने की क्षमता। आज हरेक पार्टी किसानों की दुर्दशा, उनके अधिकार, बेरोजगारी और युवाओं की समस्या की बात करती है। लेकिन वामपंथी दलों के आंदोलन और संघर्षों के कारण ही ये मुद्दे सामने आए हैं। उस पैमाने पर वामपंथी दल आज भी काफी महत्त्वपूर्ण हैं। इन लोकप्रिय संघर्षों को चुनावी संघर्षों में तब्दील करना पड़ता है।

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