बिजनेस स्टैंडर्ड - घरेलू प्रवर्तकों में अपनी हिस्सेदारी बेचने की होड़
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घरेलू प्रवर्तकों में अपनी हिस्सेदारी बेचने की होड़

सुरजीत दास गुप्ता, पीरजादा अबरार और देव चटर्जी / नई दिल्ली/बेंगलूरु/मुंबई March 04, 2019

बड़ी संख्या में भारतीय प्रवर्तक विभिन्न कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी कम कर रहे हैं या पूरी तरह बेच रहे हैं। वे इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो वे बरबाद हो जाएंगे। ऋणदाता राष्ट्रीय कंपनी कानून अपील पंचाट (एनसीएलएटी) का दरवाजा खटखटा सकते हैं जिससे प्रवर्तकों को पैसा, इक्विटी और नियंत्रण सबसे हाथ धोना पड़ेगा।

यह भी संभव है कि ऋणदाता घबराकर प्रवर्तकों के गिरवी शेयरों को बेच दें जैसा कि जी के मामले में देखा गया था। इससे न केवल कंपनी का बाजार पूंजीकरण बुरी तरह प्रभावित होगा बल्कि उसके लिए भविष्य में पैसा जुटाना भी मुश्किल हो जाएगा। इसकी वजह यह है कि कंपनी की कर्ज चुकाने की क्षमता सवालों के घेरे में आ जाएगी। मैक्स समूह के अनलजीत सिंह को समय रहते इसका अहसास हो गया था। उनका कहना है कि वह रैनबैक्सी या विजय माल्या नहीं बनना चाहते थे और यही वजह है कि उन्होंने इससे बाहर निकलने में ही भलाई समझी। 

बेन कैपिटल के प्रबंध निदेशक अमित चंद्रा ने कहा कि कंपनियों को अगले दौर में ले जाने के लिए सोच में क्रांतिकारी बदलाव की जरूरत होती है। उन्होंने कहा, 'प्रवर्तकों को विकल्पों का सामना करना पड़ता है। उनके पास अपनी पूरी हिस्सेदारी बेचने या हिस्सेदारी कम करके अल्पांश शेयरधारक के रूप में साझेदारों के साथ कारोबार चलाने का विकल्प हो सकता है।' निवेशकों का कहना है कि प्रवर्तक निश्चित रूप से इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

रिसर्च प्लेटफॉर्म वीसीसी एज के मुताबिक नियंत्रण सौदों का कुल मूल्य 2017 में 4.8 अरब डॉलर था जो 2018 में 5.9 अरब डॉलर हो गया। फंड मैनेजरों के आंकड़ों के अनुसार 2017 में पांच सबसे बड़े नियंत्रण सौदों में निवेश की राशि 71 करोड़ डॉलर थी जबकि 2018 में केवल केकेआर ने रैम्की इनवॉयरो और मैक्स हॉस्पिटल्स में बहुलांश हिस्सेदारी खरीदने के लिए 1.2 अरब डॉलर खर्च किए।  

कई कंपनियों में हिस्सेदारी खरीदने वाली एक कंपनी के अधिकारी ने कहा, 'प्रवर्तक अपने कारोबार में उन क्षेत्रों का आकलन कर रहे हैं जिनमें दबाव की स्थिति आ सकती है। इस तरह वे आईबीसी में जाने के बजाय बहुलांश हिस्सेदारी छोडऩे का फैसला कर रहे हैं।' कई प्रवर्तकों के अपनी हिस्सेदारी घटाने की वजह पीढ़ीगत बदलाव भी है। कई मामलों में दूसरी पीढ़ी पुराने कारोबार में शामिल होने की इच्छुक नहीं है। अनलजीत सिंह ने माना कि कई कारोबार बेचने के पीछे एक वजह यह भी है कि उनके बच्चों की उनमें दिलचस्पी नहीं है। 

ऐतिहासिक रूप से भारतीय प्रवर्तक बैंकों से उधार लेकर अपने कारोबारी साम्राज्य का विस्तार करते रहे हैं। बैंकों ने भी उन्हें उधार देने में पूरी उदारता दिखाई है। विशेषज्ञों का कहना है कि नियामकों और ऋणदाताओं को यह देखना होगा कि उनका उधार नियंत्रण से बाहर न चला जाए, कर्ज बनाम इक्विटी अनुपात अव्यावहारिक न हो जाए और कर्ज तथा एबिटा अनुपात ऐसी स्थिति में न पहुंच जाए कि कंपनियां कर्ज का भुगतान करने की स्थिति में न रहें। 

भारतीय कंपनियों में ऐसा ही हुआ। लेकिन इस पर कहीं तो लगाम लगनी थी। बैंकों की भारी गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) के कारण भारतीय रिजर्व बैंक ने कर्ज की आसान उपलब्धता बंद कर दी। केंद्रीय बैंक ने 12 फरवरी 2018 के परिपत्र ने कंपनियों की मुश्किलें बढ़ा दी। कुछ कंपनियों ने नियंत्रण खोए बिना अपना कर्ज कम करने का रास्ता निकाल लिया है। उदाहरण के लिए जीएमआर समूह की जीएमआर एयरपोट्र्स में 30 फीसदी हिस्सेदारी बेचने के लिए निवेशकों से बातचीत चल रही है। 

ज़ी के सुभाष चंद्रा भी यही तरकीब आजमा सकते हैं लेकिन उनके पास बहुत कम समय है और उन्हें सितंबर तक अपने कर्ज का भुगतान करना है। एक विश्लेषक ने कहा, 'चंद्रा भी कुछ वित्तीय निवेशकों की पहचान कर सकते थे और कंपनी का नियंत्रण अपने हाथ में रख सकते थे।'
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