बिजनेस स्टैंडर्ड - देश के एनजीओ के लिए चंदे की बढ़ती चुनौती
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देश के एनजीओ के लिए चंदे की बढ़ती चुनौती

रंजीता गणेशन और निकिता पुरी /  March 04, 2019

मुंबई के वाणी रेलवे स्टेशन के बाहर अक्सर युवक-युवतियों का समूह वहां से गुजरते हुए लोगों को रोकता है और उनसे वह समूह सवाल करता है, 'क्या आपके पास पर्यावरण के बारे में बात करने के लिए एक मिनट का वक्त है?' ग्रीनपीस इंडिया के इन सदस्यों को लोग अक्सर विनम्रता से या गुस्से से मना कर देते हैं या फिर कुछ लोग पूरी ईमानदारी से बात भी कर लेते हैं। शिल्पी यादव एक कॉरपोरेट कम्युनिकेशंस पेशेवर हैं और वह पर्यावरण से जुड़े मसलों को लेकर काफी मुखर हैं और इसकी वकालत करने वाले समूह से भी जुड़ी हैं जिस समूह ने 2014 में इनसे एक नियमित डोनर के तौर पर संपर्क किया। दुनिया भर में इस समूह की गतिविधियां मशहूर हैं जिनमें ऊंची इमारतों पर चढ़कर प्रदर्शन करना और कंपनियों और सरकारों को शर्मिंदगी का अहसास कराने के लिए बड़े बैनर लगाना भी शामिल है। ऐसे में यादव को ज्यादा आश्वासन की जरूरत नहीं थी। अब चार साल बाद वह कहती हैं, 'फंड देना एक बात है और किसी इमारत पर चढऩा दूसरी बात है। वे जोखिम लेने के इच्छुक हैं।' उन्होंने मासिक चंदे के जरिये संगठन को कुल 24,000 रुपये का योगदान दिया है। वह कहती हैं, 'उनकी वजहें सरकार को गलत लग सकती हैं लेकिन लोगों के लिए यह गलत नहीं है।'

सरकार ने देश में राजनीतिक रूप से मुखर गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) की कड़ी आलोचना की है। यह आलोचना तब से शुरू हुई है जब से खुफिया ब्यूरो (आईबी) ने जून 2014 में यह रिपोर्ट दी कि इन समूहों को विदेश से मिली रकम का इस्तेमाल विकास परियोजनाओं में बाधा पहुंचाने के लिए होता है। आईबी ने उनके विरोध प्रदर्शन का आकलन किया। ग्रीनपीस इंडिया के अभियान का अहम पहलू यह है कि देश में स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा दिया जाए ताकि वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटा जा सके। 2015 में विदेशी चंदा पाने वाले लाइसेंस को रद्द कर दिया गया था और इसके बैंक खाते पर भी दो महीने के लिए रोक लगा दी गई थी। इसके बैंक खाते में अंतरराष्ट्रीय फंड और 77,786 भारतीयों के चंदे थे। पिछले साल अक्टूबर में फिर से प्रवर्तन निदेशालय ने कथित रूप से नियमों का उल्लंघन करने और विदेशी फंड हासिल करने के लिए गैर-लाभकारी बैंक खाते पर रोक लगा दी। बेंगलूरु उच्च न्यायालय के आदेश के बाद एनजीओ के कर्मचारियों को दो महीने का वेतन मिला। 

संगठन का कहना है कि नागरिकों की तरफ से 350 रुपये और 500 रुपये का मासिक चंदा मिलने की वजह से ही संकट की स्थिति में उनका अस्तित्व बरकरार रहा। ग्रीनपीस इंडिया के जलवायु एवं ऊर्जा के प्रचार प्रबंधक नंदीकेश शिवलिंगम संगठन की विदेशी फंडिंग लाइसेंस रोकने की बात का संदर्भ देते हुए कहा, 'अब 100 फीसदी दान भारतीयों की तरफ से दिया जाता है।' हितों के टकराव की बात को नजरअंदाज करने के लिए वे कंपनियों या सरकार की तरफ से वित्तीय सहायता स्वीकार नहीं करते हैं। हालांकि बार-बार के आरोपों से निजी चंदे पर असर पड़ रहा है जबकि स्थानीय दानदाताओं ने 2014-15 में 17 करोड़ रुपये से ज्यादा का योगदान दिया है। संगठन ने 2016 में निजी लोगों से आधे से थोड़ी अधिक रकम (9.4 करोड़ रुपये) जुटाई, लेकिन शिवलिंगम का उत्साह अप्रत्याशित हलकों से मिले समर्थन की वजह से बढ़ा जब ग्रामीण कर्नाटक के एक किसान 2015 में कानूनी कार्यवाही की खबर सुनकर बेंगलूरु के दफ्तर आए। वह जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण के खिलाफ अपनी लड़ाई के लिए 500 रुपये का योगदान देना चाहते थे। शिवलिंगम कहते हैं, 'हमें उन्हें कहना पड़ा कि हम नकद चंदा नहीं लेते।' यह गैर-लाभकारी संस्था करीब 55,000 भारतीयों से मासिक चंदा लेती है। 

एमनेस्टी इंटरनैशनल इंडिया में भी निजी दानदाताओं पर निर्भरता है जिनके बेंगलूरु दफ्तर में पिछले साल अक्टूबर में कथित तौर पर विदेशी अंशदान (विनियमन) कानून (एफसीआरए) ईडी ने छापा मारा था। इसके बैंक खाते पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसके खाते पर तब तक प्रतिबंध लगा रहा जब तक बेंगलूरु उच्च न्यायालय ने 22 नवंबर को इस पर से प्रतिबंध हटा नहीं लिया। एमनेस्टी इंटरनैशनल इंडिया के कार्यकारी निदेशक आकार पटेल कहते हैं, 'अब यह कुछ खातों तक अपनी पहुंच बना सकती है लेकिन अब भी सभी खातों के लिए यह प्रावधान नहीं है। इस तरह के नियमों की वजह से हमारा काम थोड़ा मुश्किल हो जाता है। इसी वजह से एमनेस्टी कोई समझौता नहीं करती, इसने नोबेल शांति पुरस्कार (1977) भी जीता और छह दशक से इसका अस्तित्व बरकरार है।' यह संगठन मानवाधिकार के लिए प्रचार प्रसार करती है और इसने करीब साढ़े तीन साल पहले सदस्यता मॉडल के लिए एक दफा चंदा देने की गुजारिश की है जहां देश के 14,000 लोग हर महीने औसतन 500 रुपये का योगदान देते हैं। तयशुदा मासिक योगदान और एक बार के चंदे के साथ इसने करीब 60 लाख रुपये प्रतिमाह जुटाए। हैदराबाद के नंदी फाउंडेशन के सीईओ मनोज कुमार का कहना है, 'वे दिन बीत गए कि जब देश के चैरिटी विदेशी चंदे पर निर्भर होते हैं। हालांकि ज्यादातर भारतीय खासतौर पर मध्यम वर्ग अब चंदा देने के लिए तैयार हैं। इस संभावनाओं को जानते हुए कई एनजीओ अपनी गतिविधियों में बदलाव कर रहे हैं।' 

पिछले साल ग्रीनपीस इंडिया ने बेंगलूरु के 'डायरेक्ट डायलॉग इनीशिएटिव' के साथ साझेदारी की थी जिससे चंदा देने वालों को तादाद को अपने साथ बनाए रखने में मदद मिली। एमनेस्टी इंटरनैशनल इंडिया के डेटाबेस में करीब 1,000 लोगों को हर महीने जोड़ा जाता है और संगठन को उम्मीद है कि निकट भविष्य में तादाद 75,000 सदस्य तक हो सकती है। ऑक्सफैम इंडिया की निर्भरता अतिधनाढ्य लोगों के मुकाबले मध्यमवर्ग आमदनी वाले लोगों पर है और इसकी योजना उन नागरिकों को जागरुक बनाने की है जो अपनी पूंजी, अपने वक्त का योगदान दे सकते हैं। देश के अन्य एनजीओ मसलन चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) और अक्षय पात्रा फाउंडेशन भी क्राउडफंडिंग सेवाओं और सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर लोगों तक पहुंच बना रहे हैं।

दान देने का इतिहास आस्था से भी जुड़ा मामला है। पटेल कहते हैं, 'मंदिरों के ट्रस्ट से लेकर अस्पताल बनाने के लिए आगा खान चैरिटी में दान देने की परंपरा भी है। लेकिन औपचारिक और मध्यमवर्ग द्वारा चंदा देने का रुझान अपेक्षाकृत नया है क्योंकि मध्यम वर्ग भी नया ही है। हालांकि अब बिना किसी आस्था के भी दान देने का चलन दुनिया में नया है।' 

फंड जुटाने वाली इनकी टीम अब कॉरपोरेट जगत के कर्मचारियों को लक्षित करती है जो हर महीने अच्छी-खासी रकम का योगदान कर सकते हैं। एमनेस्टी इंटरनैशनल इंडिया का प्रतिनिधित्व करने वाली टीम सड़क के व्यस्त रास्तों, कॉरपोरेट दफ्तरों और टेक पार्क में नजर आ जाती है। यह टीम महिलाओं के खिलाफ हिंसा और कार्यस्थल पर यौन शोषण जैसे मुद्दों पर वर्कशॉप का आयोजन भी करती है। पटेल कहते हैं, 'हमारे यहां चंदा देने वालों में करीब 32 फीसदी औरतें हैं और महिलाएं, पुरुषों के मुकाबले हमसे लंबे समय तक जुड़ी रहती हैं ऐसे में हमारी कोशिश यही होती है कि ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को जोड़ा जा सके।'

ऑक्सफैम इंडिया में करीब 40 फंड जुटाने वाले लोग, नौकरीपेशा और अपना कारोबार करने वाले लोगों से डिजिटल अभियान के जरिये संपर्क करते हैं या फिर उनके दफ्तर में मिलकर या टेलीफोन पर बात कर संपर्क बनाते हैं। 

बीनू जैकब ने डायरेक्ट डायलॉग इनीशिएटिव की शुरुआत 2017 में की ताकि ऐसे एनजीओ को लोगों से चंदा दिलाने में मदद की जा सके। ग्रीनपीस के अलावा वह 'प्लान इंडिया' और 'दि एसोसिएशन ऑफ पीपुल विद डिसैबिलिटी' को भी सेवाएं देते हैं। जैकब कहते हैं, 'ज्यादातर चैरिटी संपन्न वर्ग पर जोर देते हैं लेकिन हमने यह पाया कि मध्यम वर्ग से संपर्क करने पर वे चंदा देने के लिए तैयार होते हैं। अगर लोगों को पता चलता है कि किसी एनजीओ में ऑडिटर है और यह लंबे समय तक काम करेगा तब लोग अपना छोटा लेकिन नियमित योगदान करने को तैयार होते हैं।'

एक फिलैन्थ्रपी एडवाइजर दासरा और एक सलाहकार कंपनी बेन ऐंड कंपनी की 'इंडिया फिलैन्थ्रपी रिपोर्ट 2017' के मुताबिक देश में निजी स्तर पर लोकोपकार से जुड़े कामों की तादाद 2011 के 60 अरब रुपये से छह गुना बढ़कर 2016 में 360 अरब रुपये हो गई। 

गिवइंडिया के सीईओ अतुल सतीजा कहते हैं कि सादगी पूर्ण जीवन बिताने वाले लोगों में भी दान देने के रुझान में ज्यादा अंतर नहीं दिखता। बड़ा आईफोन रखने वालों की तरह ही सस्ते स्मार्टफोन रखने वाले लोग भी दान देने में पीछे नहीं रहते। 

दान देने वाले कई दफा खुद ही किसी एनजीओ की पहचान कर दान देते हैं जबकि कुछ लोग किसी आपदा के वक्त चंदा देते हैं। क्राई में संसाधन विकास की निदेशक वत्सला मैमगेन कहती हैं, 'एक तरफ निजी स्तर पर लोकोपकार का काम करने में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है, वहीं दूसरी तरफ कई लोग ऐसे हैं जो दानदाताओं के पैसे में अपनी हिस्सेदारी चाहते हैं। ऐसे में फंडिंग का लक्ष्य हासिल करना काफी चुनौतीपूर्ण है।'

कई दानदाताओं को यह बात प्रभावित करती हैं कि दासरा और गिवइंडिया जैसी सलाहकार कंपनियां एनजीओ की पृष्ठभूमि की जांच आदि करती हैं। एक प्रबंधक सलाहकार निशांत कटोच गिवइंडिया की वेबसाइट को हर महीने हर महीने 1,500 और 2,000 रुपये का योगदान देते हैं। उनके फंड के इस्तेमाल का ब्योरा उन्हें नियमित तौर पर ईमेल किया जाता है और वह बड़े और छोटे एनजीओ में से चयन सफलतापूर्वक कर पाते हैं। वह कहते हैं, 'इसकी वजह से मैं अपने गृह राज्य हिमाचल प्रदेश में बुजुर्गों, बच्चों और दलितों की मदद कर पाता हूं। सामाजिक कार्यों के लिए कई क्राउडफंडिंग वेबसाइट भी हैं मसलन डोनेटकार्ट डॉट कॉम और गोक्राउडेरा डॉट कॉम।'

सरकार के नीतिगत बदलावों और एनजीओ को लेकर निगरानी पूर्ण रवैये से माहौल में काफी बदलाव हुआ है। वर्ष 2010 में एफसीआरए के तहत 29,700 एनजीओ का पंजीकरण हुआ था और 2014 से ही 14,938 एनजीओ का पंजीकरण रद्द कर दिया गया है। दिसंबर 2017 में गृह राज्य मंत्री किरण रिजीजू के मुताबिक, बड़े एनजीओ के लाइसेंस रद्द होने से एनजीओ की कुल विदेशी फंडिंग 2015-16 के 177 अरब रुपये से कम होकर 2016-17 में 65 अरब रुपये हो गई। 

दासरा के सह संस्थापक देवल सांघवी कहते हैं कि देश में मिल रही फंडिंग की रफ्तार में उस दर से तेजी नहीं आ रही है जिस दर से विदेशी फंड में कमी हो रही है। बेन कैपिटल प्राइवेट इक्विटी के प्रबंध निदेशक अमित चंद्रा का कहना है कि लोगों को वैसे लोगों को पहचानने और उनका समर्थन करने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ेगी जो अच्छा काम कर रहे हैं। 

ग्रीनपीस इंडिया के अभियानों को 2015 में रोक लगनी शुरू हो गई। तीन साल पहले इस गैर लाभकारी संस्था के 30-40 फीसदी कर्मचारियों में भी कटौती करनी पड़ी जिनमें फंड उगाही टीम शामिल है। फंड पर प्रतिबंध लगने की वजह से ही एमनेस्टी इंटरनैशनल इंडिया को अपनी 240 की टीम में से 75 लोगों की छंटनी करनी पड़ी। 

दूसरे नीतिगत बदलावों के तहत वेतन पाने वाले दानदाताओं को धारा 35 एसी के तहत कर छूट 100 फीसदी से कम कर 31 मार्च 2017 को 50 फीसदी कर दी गई। अक्षय पात्रा फाउंडेशन का कहना है कि वेतन से चंदा देने की दर में 70 फीसदी की कमी आई है। ये योगदान कुछ कंपनियों के कर्मचारी सीधे अपने वेतन से करते हैं। नए समर्थकों को जोडऩे के लिए संगठन ने पेटीएम का विकल्प शुरू किया है, जिसके जरिये 5 रुपये तक का योगदान दिया जा सकता है। 

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