बिजनेस स्टैंडर्ड - तीसरे पक्ष के सामान भी बेच सकता है पोर्ट ट्रस्ट
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तीसरे पक्ष के सामान भी बेच सकता है पोर्ट ट्रस्ट

एम जे एंटनी /  March 03, 2019

अगर किसी सार्वजनिक परिसर से पट्टाधारक को हटाए जाने के बाद भी जमीन पर अनधिकृत रूप से कब्जा बना हुआ है तो फिर संपदा अधिकारी वहां रखी तमाम संपत्तियों की बिक्री करने के लिए स्वतंत्र है, भले ही वह सामान किसी अन्य पक्ष का हो। अधिकारी वहां रखे  सामान की बिक्री कर पट्टïाधारक पर बकाया के रूप में वसूली कर सकता है।

उच्चतम न्यायालय ने कोलकाता बोर्ड बनाम एपीएल इंडिया लिमिटेड मामले में यह फैसला सुनाते हुए कहा है कि सार्वजनिक स्थल (अनधिकृत कब्जा निरसन) अधिनियम में संपदा अधिकारी को इसका अधिकार दिया गया है। इस मामले में बंदरगाह के पास की जमीन को वर्ष 1963 में एक फर्म को पट्टे पर दे दिया गया था। लेकिन 10 साल बाद ही उस कंपनी ने किराया देना बंद कर दिया। इस कानून के तहत कार्रवाई शुरू किए जाने पर पट्टाधारक को 2007 में वह जमीन खाली करने को कहा गया। उस कंपनी ने जमीन खाली भी कर दी लेकिन वहां पर एक और फर्म ने बड़ी संख्या में अपने कंटेनर रखे हुए थे। पोर्ट ट्रस्ट ने कंटेनर हटाने की इजाजत नहीं दी तो कलकत्ता उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई। पोर्ट ट्रस्ट के खिलाफ फैसला आने पर उच्चतम न्यायालय में अपील की गई थी।

शीर्ष अदालत ने कहा है कि इस अधिनियम के तहत पोर्ट ट्रस्ट को ऐसी जगह पर रखे हुए सामान की बिक्री कर अपना बकाया किराया वसूलने का पूरा अधिकार है। अगर बिक्री से हासिल रकम बकाये से अधिक है तो फिर वह हिस्सा उसके हकदार को लौटा दिया जाए। उच्चतम न्यायालय ने यह भी साफ किया है कि यह नियम सभी पक्षों पर लागू होता है जो किरायेदार, लाइसेंसधारक या अन्य पक्ष होने के नाते सार्वजनिक स्थलों पर सामान रखते हैं।

कानून में बदलाव होने पर मुआवजे का अधिकार

उच्चतम न्यायालय ने हरियाणा की बिजली वितरण कंपनी की अपील को खारिज करते हुए अदाणी पावर लिमिटेड को राहत प्रदान की है। उसने उत्तर हरियाणा बिजली बनाम अदाणी पावर लिमिटेड वाद का निपटारा करते हुए क्षतिपूर्ति के सिद्धांत का भी जिक्र किया है। विशेष आर्थिक क्षेत्र अधिनियम, 2005 के तहत अदाणी पावर को विकास का जिम्मा दिया गया था और इस वजह से उसे सीमा शुल्क अधिनियम, केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम और सेवा कर के तहत कई शुल्कों से छूट भी दी गई थी। उसने हरियाणा की बिजली वितरण कंपनियों के साथ बिजली खरीद समझौते (पीपीए) भी किए थे। बाद में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने अदाणी पावर को दी गई रियायतें वापस ले ली जिसके बाद पीपीए के अनुरूप हर्जाना देने को लेकर विवाद खड़ा हो गया। अदाणी ने पीपीए प्रावधानों का हवाला देते हुए नियम बदलने पर मुआवजे की मांग को लेकर केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग का रुख किया। आयोग ने उसकी मांग आंशिक रूप से ही स्वीकार की। मामला अपीलीय पंचाट में जाने पर उसने बिजली कंपनियों के खिलाफ निर्णय दिया। उच्चतम न्यायालय ने बिजली कंपनियों की अपीलें खारिज करते हुए कहा है कि इस मामले में क्षतिपूर्ति का सिद्धांत लागू होता है। इस नियम के मुताबिक अगर नियम में बदलाव होता है तो प्रभावित पक्ष को उतना मुआवजा दिया जाना चाहिए जितना उसे नुकसान हो रहा है।

मध्यस्थता निर्णय में ब्याज के भुगतान का आदेश 

दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि अगर अनुबंध में देरी होने पर ब्याज देने का प्रावधान नहीं किया गया है तो मध्यस्थता अधिकरण इस आशय का आदेश नहीं दे सकता है। टिहरी पनबिजली विकास निगम बनाम जयप्रकाश एसोसिएट्स मामले में न्यायालय ने यह फैसला सुनाया है। निजी कंपनी को टिहरी बांध पर परियोजनाओं के निर्माण में देरी होने पर स्पिलवे बनाने के लिए ठेका मिला था लेकिन समय पर काम पूरा नहीं हो पाया। विवाद बढऩे पर मामला तीन सदस्यीय मध्यस्थता अधिकरण के पास चला गया जिसने जेपी एसोसिएट्स के पक्ष में फैसला सुनाया। इस पर बिजली निगम ने मध्यस्थता एवं मेलमिलाप अधिनियम के तहत उच्च न्यायालय में अपील की। न्यायालय ने अधिकरण की राय से काफी हद तक सहमति जताते हुए कहा है कि अनुबंध में प्रावधान नहीं होने पर अधिकरण बकाया के साथ ब्याज देने का आदेश नहीं दे सकता है। 

सिगरेट ब्रांड को ट्रेडमार्क का इस्तेमाल रोकने का निर्देश 

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने ट्रेडमार्क विवाद में सिगरेट निर्माता कंपनी आईटीसी लिमिटेड के पक्ष में फैसला दिया है। कंपनी के ब्रांड गोल्ड फ्लेक से मिलते-जुलते नाम की सिगरेट बेचने का मामला था। होल लीफ टोबैको वेंचर लिमिटेड फ्लेन ब्रांड की सिगरेट बेच रही थी। इस पर आईटीसी ने ट्रेडमार्क के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए कहा था कि होल लीफ को यह सिगरेट बेचने से रोका जाए। न्यायालय ने उसके दावे से सहमति जताते हुए कहा कि दोनों ही ब्रांड की पैकेजिंग काफी हद तक एक जैसी है। उसने कहा कि अगर होल लीफ कंपनी ने यह लोगो भोलेपन में अपनाया है तब भी उसे इसका इस्तेमाल बंद करना होगा। 

निवेश योजना में मवेशियों के नाम पर धांधली

ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब निवेशकों से बड़ी राशि जुटाने वाली कंपनी के प्रवर्तक को पैसे लौटाने में नाकाम रहने पर ओडिशा उच्च न्यायालय ने जमानत देने से मना कर दिया है। लीना महेश बनाम भारत गणराज्य मामले में न्यायालय ने यह निर्देश दिया है। सीबीआई के आरोपपत्र के मुताबिक इस निवेश कंपनी ने अपना नाम बदलकर खुद को पब्लिक लिमिटेड कंपनी में तब्दील कर दिया था। उसने देश भर में फैली अपनी 300 शाखाओं की मदद से हजारों निवेशकों को बकरियां, भेड़ें और सूअर देकर ऊंचे रिटर्न का लालच दिया था। लेकिन वह कंपनी न तो आरबीआई और ही सेबी के पास पंजीकृत थी और उसने चिटफंड योजना निषेध अधिनियम और दूसरे कानूनों का उल्लंघन किया था। देश के कई बैंकों में उसके करीब 600 खाते थे। इन खातों से आरोपी महिला के पति और अनुषंगी कंपनियों के बीच मोटी रकम का आदान-प्रदान हुआ था। 

कंपनी नहीं कर सकती मानसिक पीड़ा का दावा

भले ही कंपनियां अपने उत्पादों एवं सेवाओं में खामी के चलते दूसरों के सिरदर्द का कारण बन जाती हैं लेकिन वे खुद इस दर्द को महसूस नहीं कर सकती हैं क्योंकि वे कोई जीवित शख्स नहीं होती हैं। ऐसे में कोई भी कंपनी मानसिक पीड़ा से गुजरने के चलते मुआवजे का दावा नहीं कर सकती है। राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने न्यू इंडिया एश्योरेंस बनाम ओसवाल प्लास्टिक इंडस्ट्रीज मामले में फैसला सुनाते हुए यह टिप्पणी की है। पंजाब के राज्य उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया था कि एक दावे के निपटारे में अनियमितता होने से ओसवाल कंपनी को हुई मानसिक पीड़ा के एवज में उसे एक लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए। हालांकि राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने मूल फैसले को बरकरार रखा है लेकिन कंपनी को हुई मानसिक पीड़ा वाले पहलू को हटा दिया है।
Keyword: Supreme Court, Punjab, APL India Limited, Kolkata Board, Lease, License Holder, Compensation, Public Place, PPA, Interest,
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