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अवैध जमाओं के खिलाफ निवेशकों के हाथ मजबूत बनाता अध्यादेश

संजय कुमार सिंह /  March 03, 2019

पिछले सालों में रोज वैली और सारदा जैसे घोटालों के चलते हजारों निवेशकों को उनकी मेहनत की कमाई से वंचित कर दिया था। अवैध जमाखोरी के खतरे को रोकने के लिए सरकार जुलाई 2018 में गैरकानूनी जमा योजना प्रतिबंध विधेयक संसद में लेकर आई। इस विधेयक को वित्त मामलों की स्थायी समिति को भेज दिया गया था। हाल ही में लोकसभा ने इस विधेयक को पास कर दिया लेकिन यह राज्यसभा में पारित नहीं हो सका। हालांकि कैबिनेट के आग्रह पर राष्ट्रपति ने इस विधेयक को अध्यादेश के तौर पर मंजूरी दे दी है।

गैरकानूनी इकाइयां नहीं ले सकतीं जमा:

वर्तमान में भारत में विभिन्न प्रकार के जमाओं पर निगरानी के लिए नौ नियामकीय संस्थाएं मौजूद हैं। उदाहरण के लिए भारतीय रिजर्व बैंक गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) का नियमन करता है तो वहीं भारतीय प्रतिभूति एवं विनियामक बोर्ड (सेबी) म्युचुअल फंड तथा राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेश की सरकारें चिटफंड आदि को विनियमित करती हैं। अध्यादेश के मुताबिक जमा से जुड़ी सभी योजनाएं संबंधित नियामक के पास पंजीकृत होनी चाहिए। ऐसा नहीं होने पर वित्त उगाही से संबंधित कोई भी योजना गैरकानूनी मानी जाएगी। सिरिल अमरचंद मंगलदास में पार्टनर श्रुति राजन कहती हैं, 'इस अध्यादेश का उद्देश्य गैरकानूनी संस्थाओं को जनता से जमाएं लेने से रोकना है।'

नए कानून के तहत एक सक्षम प्राधिकारी की नियुक्ति की जानी है। अगर पुलिस को किसी भी तरह की गैर-कानूनी जमाएं लेने की सूचना मिलती है तो वह मामले को सक्षम प्राधिकारी के सामने रखेगी। प्राधिकारी के पास जमा स्वीकार करने वाले व्यक्ति की संपत्ति कुर्क करने और जमा की गई राशि लेने का अधिकार होगा। यह अध्यादेश विशेष न्यायालयों की स्थापना का भी प्रावधान करता है। अवैध रूप से जमा स्वीकार करने वाले व्यक्ति या संस्था की संपत्ति कुर्क करने के बाद सक्षम प्राधिकारी इस प्रक्रिया को पूरा करने और संपत्ति बेचने संबंधी अनुमति के लिए संबंधित न्यायालय में जाएगा। सक्षम प्राधिकारी न्यायालय के आदेश के अनुसार निवेशकों के रुपये भी लौटाएगा। ये सभी गतिविधियां एक समयबद्ध तरीके से की जाएंगी। 

तत्काल कार्रवाई की शक्ति:

पहले संबंधित अधिकारियों को जांच प्रक्रिया के तहत पूछताछ से लेकर एक लंबी प्रक्रिया से गुजरना होता था। इसके चलते अवैध तरीके से वित्त उगाही करने वालों को जुटाए गए धन को तितर-बितर करने का समय मिल जाता था। अब सक्षम प्राधिकारी गैरकानूनी तरीके से जमा लेने वालों की जानकारी मिलते ही तत्काल कार्रवाई कर सकता है। प्राधिकारी कारणों की पूछताछ कर सकता है, बैंक खातों की जानकारी ले सकता है और कुर्की के आदेश जारी कर सकता है जिससे संबंधित व्यक्ति आगे किसी भी निवेशक से रकम ना जुटा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि यह अध्यादेश कालेधन पर अंकुश लगाने में सहायक होगा। खेतान ऐंड कंपनी में पार्टनर अभिषेक रस्तोगी कहते हैं, 'काला धन रखने वाले लोग अक्सर अपना पैसा इस तरह की गैरकानूनी जमाओं में लगाते हैं। इन गतिविधियों पर लगाम लगाने से सरकार के कालेधन को समाप्त करने के प्रयासों को बल मिलेगा।' नए कानून के तहत केंद्र सरकार एक पा्रधिकरण का गठन करेगी जो जमाएं स्वीकार करने वाली इकाइयों का एक केंद्रीय डेटाबेस तैयार करेगा। मुंबई स्थित वित्तीय योजनाकार अर्णब पांड्या कहते हैं, 'इससे निवेश करने वाला व्यक्ति आसानी से देख कर पाएगा कि जिस योजना में वह निवेश करने जा रहा है, वह पंजीकृत है अथवा नहीं। फिलहाल इसके सत्यापन की प्रक्रिया काफी जटिल है और जानकार लोग ही इससे संबंधित खोज को अंजाम दे पाते हैं।'

दुरुपयोग का खतरा: 

कुछ विशेषज्ञ इस बात से चिंतित हैं कि नया कानून काफी कठोर साबित हो सकता है। एक कानूनी विशेषज्ञ ने कहा कि पूरी जांच या निष्पक्ष प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही संपत्ति कुर्क या सीज करना और व्यक्ति को सजा देना एक तरह का तानाशाही रवैया हो सकता है। उन्हें भय है कि इस तरह के कानून का इस्तेमाल लोगों को डराने में किया जा सकता है। उन्हें लगता है कि अगर सरकार देश की कानूनी प्रक्रिया को तेज करने की दिशा में कुछ कदम उठाती तो इन उद्देश्यों की पूर्ति में मदद मिलती। 

कुछ प्रावधानों पर स्पष्टता जरूरी:

समय के साथ कुछ दूसरे प्रावधानों पर भी स्पष्टता जरूरी है। अध्यादेश में कहा गया है कि किसी अचल संपत्ति को खरीदने के लिए दिया गया अग्रिम धन जमा के अंतर्गत नहीं आएगा। नांगिया एडवाइजर के निदेशक, संदीप झुनझुनवाला कहते हैं, 'अगर किसी मामले में रियल एस्टेट डेवलपर को दी गई अग्रिम राशि को ग्राहक द्वारा सौदा रद्द करने के चलते बाद में लौटा दिया गया हो? इस अग्रिम को अचल संपत्ति की खरीद के लिए नहीं देखा जा सकता। हालिया प्रावधानों के तहत यह जमा के अंतर्गत आती है। रियल एस्टेट डेवलपर ने खुद को जमा स्वीकार करने वाली इकाई के तौर पर पंजीकृत नहीं किया होगा जिसके चलते वह दोषी घोषित किया जा सकता है और इस कानून के तहत दंड का भागी बन सकता है।'

जागरूक रहें: 

हालांकि इस अध्यादेश के मजबूत प्रावधान निश्चित तौर पर निवारक की तरह काम करेंगे लेकिन निवेशकों को हमेशा सतर्क रहना होगा। पांड्या कहते हैं, 'ऐसी योजनाओं में निवेश ना करें जो बैंक और पोस्ट ऑफिस की दरों से अधिक का रिटर्न देने का वादा करें। ऐसी योजनाओं पर आंख मूदकर भरोसा ना करें चाहे आपके आसपास लोग ऐसा कर रहे हों। चर्चित वित्तीय संस्थानों के साथ ही जुड़ें।' अगर कोई ब्रिक्री एजेंट अधिक आक्रामक होकर बात करे या निश्चित रिटर्न की गारंटी दे तो इससे बचकर रहना चाहिए। 
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